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संवर गया ज्योति का जीवन (प्रेरक प्रसंग)

Posted On: 13 Dec, 2012 Others में

chandravillaविश्व गुरु बने मेरा भारत

nishamittal

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शकुंतला आज बहुत खुश थी ,दुखियारी शकुंतला के जीवन में दुःख -विषाद का घना अंधकार रहा था ,पता नहीं खुशियों का  उसके जीवन से ३६ का आंकड़ा क्योँ बन गया था. परन्तु आज तो वह उड़ कर ज्योति को गले लगाने के लिए उत्कंठित थी . ज्योति घर पर नहीं थी .शकुंतला की मालकिन मधु जी ने उसका मुहं मीठा करते हुए कहा था, “तेरी ज्योति ने टॉप किया है शकुंतला और उसको नौकरी भी मिल गई है,बच्चों ने नेट पर उसका रिजल्ट देखा है.”शकुंतला के मुहं से शब्द नहीं निकले ,हाँ आसूं, जिनका उससे सगा संबंध था निकल पड़े .मधु जी बोली, अरे आज क्योँ रोती  है पगली, आज तो मुहं माँगी मुराद पूरी हुई है,तेरी तपस्या का फल मिला है.शकुंतला ने मधु जी के पैर पकड़ लिए ,बोली मालकिन सब आपके कारण है,मैंने उसको जन्म दिया है पर उसको यहाँ तक पहुँचाना बस आपके ही कारण हो सका है.मधु जी ने उसको समझाना चाहा ,परन्तु सभी जानते थे कि ये एक असलियत है.

मजबूरी की शिकार शकुंतला का पति शराब का आदि था, दो बच्चे कमाई  कुछ थी नहीं ,स्वयं शकुंतला गाँव की अनपढ़ औरत थी.एक तो  शहर में बस्ती का खराब  माहौल,पति द्वारा  दिन रात मारपीट करना ,बच्चों की भूख और उनके  अँधेरे भविष्य की लाचारी के कारण शकुंतला को लोगों के झूठे बर्तन मांजने और झाडू पोछे  के काम शुरू करने को विवश होना  पड़ा.पति तो उसकी गाढे पसीने की कमाई भी हड़पने को तैयार रहता था,अतः उसकी कमाई से तो रोटी का जुगाड ही मुश्किल से होता था.शकुंतला के स्वप्न अपने बच्चों के विषय में बहुत ऊंचे थे, वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर सम्मानपूर्ण जीवन  जीने के लिए तैयार करना चाहती थी. विशेष रूप से उसकी बेटी ज्योति जो बड़ी हसरत से सभी बच्चों को स्कूल जाते देखती थी और शाम को माँ से अपनी स्कूल जाने की इच्छा जाहिर करती थी.शकुंतला को बहुत जोर पड़ता था.  शकुंतला ने सोचा यदि एक दो घर में और काम शुरू कर दे,तो शायद अपने बच्चों को पढ़ा सके. वह अपने क्रूर और शराबी पति से भी वो बच्चों को दूर रखना चाहती थी.

एक दिन शकुंतला से एक गृह स्वामिनी जिसके घर में वह काम करती थी ,कहा सामने बिल्डिंग वाली को काम के लिए एक महिला की जरूरत है.शकुंतला के पास काम अधिक था, परन्तु बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए वह उनसे बात करने चली गई.मधु जी सरल स्वभाव की लगी उसको .उन्होंने शकुंतला से उसके परिवार के विषय में पूछा तो उसने सब बता दिया.शकुंतला मेहनती ईमानदार तो  थी ही, काम भी सफाई से करती थी.मधु जी भी उसकी चाय आदि का ध्यान रखती,.एक दिन शकुंतला काम करते हुए बहुत उदास थी.मधु जी ने उससे पूछा क्या बात है,तुम्हारी तबियत खराब है,तो उसकी रुलाई फूट पडी .उसने बताया कि उसके पति ने उसको रात बहुत मारा और बेटी पर भी हाथ उठा दिया.शकुंतला को अपनी चोट इतना नहीं दुःख रही थी परन्तु बच्चों का भविष्य उसको अंधकार मय दिख रहा था.मधु जी ने उसको बड़ी कठिनाई से शांत किया.थोड़ी देर विचार कर  शकुंतला से उन्होंने कहा ,तू ज्योति को मुझे दे दे.मैं तेरी बेटी को पढ़ा लिखा कर बड़ा करूंगी.मधु जी के दो बेटे और थे.जो पढ़ाई व जॉब  आदि के करण बहुत दूर थे. “तेरी बेटी मेरे घर में नौकरानी की तरह नहीं रहेगी ,मेरी बेटी की तरह ही रहेगी.”,शकुंतला समझ नहीं पा रही थी ,क्या कहे ,अंततः उसने ‘कल  उत्तर दूँगी  मालकिन” कहकर  शकुंतला  घर  आ गई . वह जानती थी कि,उसका पति  इस बात को नहीं मानेगा ,घर में तूफ़ान मचा देगा ,परन्तु बेटी के भविष्य की सोचकर उसने अपने मन को कडा किया,अपनी बेटी को भी समझाया.ज्योति को भी अपने भाई से बहुत प्यार था ,अपने छोटे हाथों से थोड़े  बहुत काम वह कर देती थी.पढ़ाई की बात कहकर उसने ज्योति को तैयार किया, अगले दिन ज्योति को मधु जी के पास छोड़ आई .शकुंतला को  तसल्ली थी कि ज्योति उसकी नज़रों के सामने ही रहेगी.
ज्योति मधु जी के पास चली गई परन्तु उसके पिता ने घर में भी हंगामा किया और उसकी  माँ को भी  बहुत मारा ,फिर अपने दो चार शराबी साथियों को लेकर उसने मधु जी के घर के बाहर भी शोर गुल किया.परन्तु मधु जी के पति ने अपनी पहुँच के बल पर  पुलिस  को बुला कर उसको बंद करा दिया.ज्योति स्कूल बस में स्कूल जाती ,शकुंतला अपने सारे दुःख भूल गई  बेटी को प्रसन्न देख कर.कुछ समय बाद अपने पति के जेल से छूटने से पहले ही शकुंतला ये घर छोड़ कर दूसरी बस्ती में रहने चली गई.अब उसने बस्ती के ही स्कूल में अपने लड़के को भेज दिया. ज्योति की बुद्धि प्रखर थी.मधु जी के स्नेहपूर्ण व अपनेपन  से वह उनका पूरा कहना मानती .कभी  कभी माँ उससे आकर मिल जाती.ज्योति एक के बाद एक कक्षा उत्तीर्ण  करते हुए आगे बढ़ रही थी. मधु जी उसको बेटी की तरह ही रखती थी,बहुत प्रसन्न थीं वो..कभी कभी मधु जी के बेटे घर आते तो माँ को खुश देख कर उनको भी आनंद मिलता था.
ज्योति ग्रेजुएशन कर चुकी थी और बैंक  प्रतियोगिता परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया था.वही समाचार मधु जी ने शकुंतला को सुनाया  था. सभी बहुत प्रसन्न थे ज्योति का भाई भी पढ़ रहा था.पिता का तो पता  ही नहीं चला कि वो कहाँ गया ,उसके शराबी साथियों में से किसी ने बताया कि शराब के नशे में किसी ट्रक के नीचे आकार उसकी मृत्यु हो गई थी.ज्योति अब बैंक जाती थी .उसकी ट्रेनिंग चल रही थी. ज्योति को आज पहला वेतन मिला था उसने वेतन ला कर मधु जी को थमाया ,बहुत खुश हुई मधु जी परन्तु उन्होंने कहा ,इस पर तेरी माँ का हक है.शकुंतला ने उनके पैर पकड़ लिए और बोली नहीं मैडम मेरे पास रह कर तो ये जीवित भी बचती या नहीं ,शायद इसका बाप इसको बेच ही देता ,इस पर पूरा अधिकार आपका ही है.

girl-child-395x300.gif अब ज्योति की जिंदगी में एक उत्साह था.शकुंतला मन ही मन उसके विवाह के विषय में सोचती थी.मधु जी से कैसे बात करे समझ नहीं पा रही थी.आज बहुत दिन बाद जब वह ज्योति  से मिलने पहुँची तो मधु जी ने स्वयं ही उससे बात प्रारम्भ की .”ज्योति की अब शादी कर देनी चाहिए हमको .उन्होंने शकुंतला से कहा तू ज्योति से बात कर कि उसकी कोई पसंद है क्या?” शकुंतला ने कहा  मैडम शादी उसकी मर्जी से नहीं होगी.परन्तु मधु जी ने उसको समझाया बच्चे बडे हो जाएँ तो उन पर अपनी इच्छा थोपना गलत है.ज्योति से पूछा गया तो उसने स्पष्ट रूप से मना कर दिया और कहा कि उसने इस दृष्टिकोण से कभी सोचा ही नहीं.अंत में मधु जी ने स्वयं ही ये बीडा उठाया और सुयोग्य वर खोज कर ज्योति के विवाह की तिथि सुनिश्चित कर दी .
शादी में कोई कसर  उन्होंने नहीं छोड़ी ,धूम धाम से उन्होंने ज्योति की शादी की.घर, वर सब बहुत अच्छा था. .कन्यादान  भी उन्होंने स्वयं किया , उनकी दोनों बेटों,पति  ने  विवाह में बढ़ चढ कर भाग लिया.शकुंतला से उन्होंने कन्या दान के लिए  कहा तो उसने ,मना कर दिया . ज्योति विदा हो कर दूसरे शहर में चली गई.
किसी ने मधु जी से सवाल किया जब आपने ही ज्योति को पाला तो अपने बेटे से उसकी शादी क्योँ नहीं की.बहुत सुन्दर उत्तर उन्होंने दिया .उन्होंने कहा,”ज्योति की ओर मेरे पुत्र भी किसी अनुचित दृष्टि से न देख सकें अतः उनको मैंने सदा यही संस्कार दिए कि वो बहिन के रूप में सदा उसका सम्मान  और स्नेह करें ,अतः ये  कैसे संभव था.”
ऐसे लोग समाज में बिरले ही होते हैं, और ऐसे कार्यों की जो निस्वार्थ भाव से किये जाएँ जितनी भी सराहना की जाय कम है.कन्यादान की इच्छा  अपनी बेटी  न होने पर  बहुत लोगों के मन में होती है,परन्तु सामर्थ्य  होने पर पहले किसी ;लड़की को सुशिक्षित बनाकर आत्मनिर्भर बनाना और उसका विवाह सम्पन्न करना महान कृत्य है. साथ ही बेटी को बोझ मान कर कन्याभ्रूण को नष्ट करने वालों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है.सबका भाग्य ज्योति जैसा नहीं होता परन्तु यदि हम चाहें तो अपनी परिस्थिति के अनुसार ऐसा कुछ सकारात्मक काम कर हम स्वयं को तथा विषम परिस्थितियों में रह रहे अपने कर्मियों की सहायता कर सकते हैं.
(ये कोई काल्पनिक कथा नहीं वास्तविक घटना है,कथा  का पुट अवश्य प्रदान किया गया है)

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