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चंद्रशेखर ने इस बहादुरी से चुनी अपनी ‘आज़ाद मौत’, इस वजह से कहा जाने लगा ‘आज़ाद’

Posted On: 27 Feb, 2019 Others में

Pratima Jaiswal

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‘मैं आज़ाद ही पैदा हुआ है, आज़ाद जियूंगा और मरूंगा भी आज़ाद’
चंद्रशेखर आज़ाद , एक ऐसा नाम जिन्हें आजादी के मतवालों के रूप में जाना जाता है। भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू पर बनी फिल्मों में हमने चंद्रशेखर आज़ाद की बहादुरी और देश के लिए बलिदान की कहानी देखी है। आज के दिन चंद्रशेखर ने खुद के लिए मौत चुनी थी। आज ही यानि 27 फरवरी, 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद ने ब्रिटिशों से एक मुठभेड़ में कभी अंग्रेजी पकड़ में न आने की शपथ के चलते खुद को गोली मार ली थी। आज बलिदान दिवस पर जानते हैं उनसे जुड़ी खास बातें।

 

 

बचपन में सीखी थी निशानेबाजी
चन्द्रशेखर आज़ाद का जन्म मध्य प्रदेश के भाबरा गांव (अब आज़ाद नगर) में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था। आज़ाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल के समय उत्तर प्रदेश के अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे, फिर जाकर भाबरा गांव बस गए। यहीं चन्द्रशेखर आज़ाद का बचपन बीता।
जैसा बताया गया आज़ाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गांव में बीता था। बचपन में आज़ाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाए थे। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी।

 

 

ऐसे पड़ा था ‘आज़ाद’ नाम
पहली बार गिरफ्तार होने पर उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का स्वर बुलंद किया। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से ‘आज़ाद ‘ पुकारे जाने लगे।
इस घटना का उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है। ‘ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गई। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बांध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह ‘भारत माता की जय!’ चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया।

 

 

ऐसे निभाया वादा, खुद के लिए चुनी मौत
भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फांसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहां से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाए तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फांसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। इसके बाद वे एक रोज अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से बात कर ही रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें घेर लिया। भारी गोलाबारी के बाद जब आजाद के पास अंतिम कारतूस बचा तो उन्होंने खुद को गोली मार ली।
इस तरह उन्होंने ताउम्र अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार नहीं होने का अपना वादा भी पूरा कर लिया। यह दुखद घटना 27 फ़रवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई।…Next

 

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