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आरक्षण की आवश्यकता बनाम आरक्षण की राजनीति

Posted On: 11 Sep, 2012 Others में

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Anil "Pandit Sameer Khan"

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अन्याय है, सरासर अन्याय है कि एक ही समय में देश के विभिन्न प्रान्तों के विभिन्न परिवारों में पैदा हुए होनहार सपूतों के साथ अलग-अलग प्रकार का व्यवहार किया जा रहा है! दलित परिवार में पैदा होने वाले बच्चे मुफ्त सिक्षा पा रहे हैं जबकि सवर्ण परिवार में पैदा होने वाले बच्चों से शुल्क लिया जाता है, दलित परिवार में पैदा होने वाले बच्चों को कॉलेज में दाखिले में आरक्षण दिया जाता है, अन्य पिछड़ा वर्ग को भी आरक्षण दिया जाता है जबकि सवर्ण परिवार में पैदा होने वाले बच्चों को ज्यादा योग्य होने पर भी अच्छे कॉलेजों में दाखिला मिलना मुश्किल हो जाता है! इतना ही नहीं इसके अलावा दलित और पिछड़ा वर्ग के लोगों को नौकरियों में भी आरक्षण दिया जाता है जबकि उनसे योग्य सवर्ण युवाओं को अक्सर नौकरी नहीं मिल पाती! अरे, इतने पर भी चैन कहाँ है अभी तो प्रोन्नति में भी आरक्षण चाहिए!

आखिर क्यों?

क्या इस क्यों का कोई जवाब है किसी के पास?

हो सकता है कि इस क्यों का जवाब हो, लेकिन अगला सवाल ये है कि उस जवाब को सुनने और सुनकर समझने के लिए समाज के किस-किस वर्ग के कितने लोग तैयार है? शायद अंजाम ये होगा कि जिस समुदाय को आरक्षण मिलता है, वह आरक्षण के पक्ष में रहेगा और जिसे नहीं मिलता , वह आरक्षण के विरोध में रहेगा! तो फिर आखिर इन लम्बे चौड़े लेखों को लिखने और दुनिया भर की बहस करने का क्या फायदा?…….फायेदे की चिंता मत करो भईया ! बस अपना कर्म समझते हुए इसे कर डालो…..वैसे भी हमारे और आपके चाहने से होगा क्या? होगा तो वही जो मंत्री जी चाहेंगे!

अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी…….क्योंकि इस आरक्षण का कारण बहुत पुराना है, इसका वृक्ष ज़रूर आज़ादी के आस-पास प्रकट हुआ, लेकिन इसका बीज बहुत पहले बो दिया गया था और यह बीज जिस भूमि पर बोया गया था, वह भूमि हज़ारों साल पहले से तैयार कि जा रही थी! इस भूमि में दलितों के साथ हज़ारों वर्ष तक होने वाले अत्याचारों की अनगिनत कहानियाँ दफ़न है, जिनका अब विस्तार पूर्वक वर्णन करने का कोई औचित्य नहीं…सिर्फ आपको याद दिलाने के लिए वर्णन कर दिया!

सवर्ण वर्ग का दुःख यह है कि उसके अनुसार बाकी सबसे अधिक योग्य होने के बावजूद उसे उसकी योग्यातानुसार शिक्षा और नौकरी नहीं मिल पाती, क्योंकि दलितों और पिछड़ों को इन क्षेत्रों में आरक्षण प्राप्त है! जिसके दम पर वे कम योग्य होने के बावजूद सवर्णों से आगे निकल जाते है ! बिलकुल सत्य बात है यह….चाहे शिक्षा हो या नौकरी का मामला, बहुत से सवर्ण अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों से अधिक योग्य होने के बावजूद भी मनचाहे क्षेत्र में शिक्षा और नौकरी नहीं प्राप्त कर पाते, कारण ये कि अन्य वर्गों को आरक्षण प्राप्त है!…..अच्छा कभी किसी ने ये सोंचा कि आखिर यह सवर्ण वर्ग जिसकी वैसे तो समाज में संख्या 50 प्रतिशत से कम है किन्तु फिर भी उसके लिए आरक्षित 50 प्रतिशत सीटों के भर जाने के उपरान्त भी अन्य वर्गों से अधिक योग्य सवर्ण शिक्षा या नौकरी से वंचित रहते हैं! ऐसा क्यों? सवर्ण वर्ग इतना योग्य कैसे हो गया? क्या वह जन्मजात ही हमेशा से अन्य वर्गों से श्रेष्ठ रहा है…..या सभ्यता एवं समाज में ऐसी व्यवस्था विद्यमान रही है, जिससे सवर्णों को अन्य वर्गों से अधिक विकसित होने का मौका मिला! सभी जानते है अपने भारतीय समाज में प्राचीन काल से शिक्षा प्राप्त करना सिर्फ उच्च वर्ग का अधिकार था! एक विशिस्ट वर्ग को तो शिक्षा ग्रहण करने तथा वेदादि का अध्ययन करने पर उसकी कीमत अपनी जीभ कटवाकर या कानो में पिघला हुआ शीशा डलवाकर चुकानी पड़ती थी! यह विशिष्ट वर्ग सिर्फ गुलामो और जानवरों की तरह जीवन जी सकता था, जिसके कोई अधिकार नहीं थे, सिर्फ कर्तव्य थे, जिसने शायद उस समय कभी भी इंसान होने का एहसास ही नहीं किया होगा! दूसरी तरफ सवर्ण थे जिन्हें शिक्षा ग्रहण करने, शाशन करने, व्यापार करने, शिक्षा देने, धन एकत्रित करने के इत्यादि समस्त प्रकार के अधिकार थे! जिससे सवर्ण वर्ग का अत्यधिक विकास हुआ और आज उसका ही फल है कि सवर्णों में ज़्यादातर की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक, राजनैतिक और बौद्धिक स्थिति बाकी वर्ग के लोगों से अधिक अच्छी है! इसके अलावा भले ही कोई सवर्ण कैसी भी परिस्थिति में हो, गरीबी में हो वह अन्य वर्गों से अधिक पढ़ाई करता है, उसे शिक्षा का महत्व पता है, इसी के दम पर वह अन्य वर्ग के लोगों से अधिक योग्य हो जाता है!

आरक्षण का विरोध करने वालों का अक्सर ये कहना होता है कि आरक्षण को ख़त्म कर देना चाहिए क्योंकि यदि कोई योग्य है तो उसे आगे आने के लिए आरक्षण की ज़रुरत नहीं है तथा ऐसे व्यक्ति को आगे आने से कोई भी परिस्थिति नहीं रोक सकती! वह अपनी मेहनत, लगन, बुद्धि और योग्यता के दम पर एक दिन ज़रूर सफल हो जाएगा!…….सही बात है बिलकुल सही बात है, जो योग्य है उसे आगे आने से कोई नहीं रोक सकता, वह एक दिन ज़रूर सफल होगा! तब फिर यह बताइये कि सवर्ण वर्ग ही सदा से योग्य रहा है, आज भी वही सबसे योग्य है, फिर उसे डर किस बात का है? वह तो एक न एक दिन अपनी योग्यता के दम पर आगे आ ही जाएगा ! ऐसे में जो लोग योग्य नहीं है, समाज की मुख्य धारा में शामिल नहीं हैं, अयोग्य हैं, अशिक्षित है, उन्हें आरक्षण का लाभ लेकर आगे आने दीजिये ताकि एक दिन उनकी भी अधिकतर संख्या आपकी तरह योग्य हो जाए!
अब बात यह उठती है कि क्या वाकई इस आरक्षण का फायदा उस विशिष्ट वर्ग को मिल रहा है, जिसके लिए इसे संविधान द्वारा लागू किया गया था? नहीं….उस स्तर का सुधार नहीं हुआ है जिस स्तर का सुधार होना चाहिए था क्योंकि इसे लागू करने वाली सात्ताधारी दल ने कभी भी इसे पूरी निष्ठां एवं ईमानदारी से लागू करना ही नहीं चाहा, बस इसे एक लौलीपौप बना दिया गया तथा इसे हर बार चुनाव आने से पहले उस वर्ग को के सामने इसे चांटने के लिए रख दिया जाता है जिससे कि यह सम्बंधित है! गौरतलब है की आरक्षण की व्यवस्था को संविधान में डॉ० आंबेडकर द्वारा शुरुवाती 10 -15 वर्षों के लिए ही रखा गया था, क्योंकि उनके अनुसार यदि इस व्यवस्था को सही ढंग से लागू किया जाता तो शुरू के 10 -15 वर्षों में ही असमानता समाप्त हो जाती! किन्तु वह कौंग्रेस जो आजादी के पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा दलितों को दिए जाने वाले विशिस्ट चुनाव के अधिकारों के विरोध में थी तथा जिसके विरोध में गांधी ने आमरण अनशन किया! जिससे डॉ० आंबेडकर तथा दलित समाज ने अपने विशिष्ट चुनाव के अधिकारों का त्याग कर दिया! वही कौंग्रेस बाद में आरक्षण को हनुमान की पूंछ की तरह लंबा करते रहने में ही अपनी भलाई देखने लगी! इससे अधिक इस स्वार्थी दल की क्या पोल खोली जाए! इस व्यवस्था के क्रियान्वयन में इतनी खामियां रही की कभी भी इसका पूरा फायदा उस वर्ग को नहीं मिला जिसके लिए इसकी व्यवस्था की गयी थी! इसी का परिणाम है कि आज़ादी के बाद 65 वर्ष गुजर गए लेकिन आरक्षण की वह व्यवस्था जिसे मात्र 10 -15 वर्षों में समाप्त हो जाना चाहिए था, आज भी बनी हुयी है ! लेकिन यह तो स्पष्ट है कि इसका कुछ फायदा ज़रूर उस वर्ग को मिला है जिसके लिए यह थी! तभी आज बाकी वर्ग की ज़्यादातर जनसँख्या यह कहने लगी है कि अब भेदभाव नहीं रह गया है सभी बराबर हो गए हैं तथा जो आरक्षण है उसका सही फायदा अब उस वर्ग तक नहीं पहुँच रहा है जिसके लिए यह है, इसलिए अब आरक्षण समाप्त कर देना चाहिए!……सही बात है आरक्षण का ज़्यादातर फायदा उस वर्ग को नहीं मिल पा रहा है जिसे यह मिलना चाहिए था! किन्तु फिर भी इस आरक्षण के चलते बहुत से पिछड़े वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचा है! हाँ इस व्यवस्था का कुछ दुरूपयोग भी हुआ है! लेकिन भईया ये कौन सी अनोखी बात है? भारत में तो प्रत्येक क्षेत्र ऐसा ही है जहाँ जो व्यवस्था जिसके लिए की जाती है, उस तक उस वयस्था का मात्र 5 -10 प्रतिशत ही पहुँचता है बाकी सब घपलों और घोटालों या कमीशनखोरी में चला जाता है! अब क्या आप कहेंगे की समस्त योजनायें बंद कर दो क्योंकि उसका सही हक उसके सही हक़दार तक नहीं पहुँच रहा! तब तो समस्त योजनाये रुक जायेंगी! इसलिए आवाज़ तो ज़रूर उठाइये लेकिन जो लोग गलत कर रहे हैं उनके खिलाफ, न की किसी ऐसी विशिष्ट योजना के खिलाफ जिससे कुछ हक़दार लोगों का भला हो रहा, लेकिन उसमे अन्य व्यक्तियों की वजह से खामिया आ गयी हैं, उसमे भी बड़ी लापरवाही शासन की तरफ से ही की जा रही है! आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है जिसमे सरकारी कुप्रबंध की वजह से अव्यवस्था और घोटाले देखने को न मिलते हों…ज़रुरत तो है ज़िम्मेदार लोगों के सामने आने की और शासन की बागडोर ज़िम्मेदार लोगों को सौंपने की! लेकिन यक्ष प्रश्न वो मिलेगा कहाँ? मिलेगा कैसे भईया जब हम सभी बचपन से लेकर बड़े होने तक अपने परिवार से लेकर समाज तक में अपने स्वार्थ को साधने की ही शिक्षा ग्रहण करते हैं ऐसे में हम देश का भला कैसे सोंचेगे?
अब प्रश्न यह है की आखिर पदोन्नति में आरक्षण की आवश्यकता क्या है?
तो इस प्रश्न का जवाब यह है की संविधान के अनुच्छेद 16 (4) क के अनुसार यदि केंद्र सरकार द्वारा सर्वेक्षण करवाए जाने पर इस बात की पुष्टि होती है की उच्च पदों पर अनुसूचित जाती, जनजाति का प्रतिनिधित्व औसत से कम है तो केंद्र सरकार सम्बंधित राज्य और उसके सम्बंधित विभाग में इस वर्ग के लिए पदोन्नति में आरक्षण का कानून पारित कर सकती है! अब नज़र डालते हैं आंकड़ों पर –
*भारत सरकार में 149 सचिव हैं जिनमें एक भी अनुसूचित जाति का नहीं। 108 अतिरिक्त सचिव में केवल दो अनुसूचित जाति के हैं। 477 कनिष्ठ सचिव हैं, जिसमें केवल 31 अनुसूचित जाति के हैं। इस तरह से 590 निदेशकों में से 17 इस वर्ग से हैं।
*शिक्षा जगत में स्थिति और भी खराब है। कुल 1864 प्रोफेसरों में से 14 अनुसूचित जाति और 11 जनजाति के हैं। इस तरह से रीडर के पद पर 38 अनुसूचित जाति के और 23 जनजाति के हैं, जबकि कुल संख्या है 3533। प्रवक्ता के पद पर भी स्थिति आरक्षण के अनुपात में दयनीय है। कुल 6688 प्रवक्ताओं में से 372 अनुसूचित जाति के और 223 जनजाति के हैं।
*इसके अलावा लगभग प्रत्येक विभाग में औसतन आधे से ज्यादा अनुसूचित जाति-जनजाति के पद रिक्त है तथा पिछड़ा वर्ग की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है !
अगला प्रश्न यह की क्या इस आरक्षण की वजह से भारत से योग्यता और श्रेष्ठता धीरे-धीरे समाप्त होती चली जा रही है? इस बात का तो समर्थन बिलकुल भी नहीं किया जा सकता क्योंकि बहुत बड़े-बड़े महान लोगों का कहना है की सोना आग में तप कर ही और निखरता है…..यानि हर वह योग्य व्यक्ति जो निरंतर संघर्षरत है वह एक दिन ज़रूर अपना और अपने देश का नाम रौशन करेगा! इसके अलावा वह समुदाय जो अभी सोना नहीं है, उसे ज़रुरत है ऐसी व्यवस्था की, ऐसे सहारे की जिसके माध्यम से वह पहले योग्य लोगों की श्रेणी में आ सके!….सोना नहीं तो कम से चांदी से ही अपनी तुलना कर सके, उसके बाद वह भी संघर्ष करके अपनी क्षमता, अपनी योग्यता दिखाएगा ! एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा! बस ज़रुरत है की समाज की वह दोमुही मानसिकता ख़त्म हो जाए जो एक तरफ तो प्रत्येक मनुष्य के बराबर होने की दुहाई देती है, दूसरी तरफ कुछ विशिष्ट वर्ग के लोगों को सिर्फ जन्म के आधार पर नीचा समझती है, उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने का, अच्छी नौकरी करने का, उच्च पदों पर आसीन होने का अधिकारी नहीं समझती ! इसी विचारधारा के चलते आज भी बहुसंख्यक विभागों में इस विशिष्ट वर्ग के लोग उच्च पदों तक नहीं पहुँच पाते! यह सिर्फ कोरी बात नहीं एक सूचना के अधिकार में प्राप्त की गयी जानकारी है! अब ऐसी वर्ग को बराबरी का मौका मिलना ही चाहिए! समाज में बराबरी होनी ही चाहिए, समानता का व्यवहार होना ही चाहिए, लेकिन समानता का व्यवहार किये जाने से पहले सभी को समान सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक स्तर पर लाना बहुत आवश्यक है! असमान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना असमानता है तथा समान लोगों के साथ असमान व्यवहार किया जाना भी असमानता है! अब या तो सब लोग जाति-पाति का आडम्बर त्याग कर समान हो जाएँ या असमान वर्ग को आरक्षण के माध्यम से आपके बराबर योग्य हो जाने का मौका दें! अब आप एक ही साथ चित और पट नहीं ले सकते ! या तो आप श्रेष्ठ हैं या तो आप समान हैं ! अब आप ही तय करें की आप क्या हैं?

(प्रतिक्रिया देने वालों से आग्रह है कृपया अधूरी प्रतिक्रिया न दें, सबसे लाजिमी प्रश्न है की क्या तथाकथित श्रेष्ठ वर्ग जाति-पाति को त्याग कर समान होना चाहता है? जिसका जवाब ऐसे वर्ग के लोगों को देना चाहिए तथा ऐसा वर्ग जिसे आरक्षण मिलता है, उसे जवाब देना चाहिए की क्या वह ऐसा होने पर आरक्षण का त्याग करने को तैयार है?)

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