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कौन कहता है कि हमारा देश आजाद है

Posted On: 29 Jan, 2011 Others में

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parmodrisalia

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कहने को तो हम कुछ भी कह सकते हैं। फिर सोचता हूं हमारे पास कहने के लिए है क्या। आज भी किसी नेता को भाषण देते देखता हूं तो मन में अजीब सी टीस उठती हैं। जाहिर सी बात है कि नेता और भाषण का जिक्र हुआ है तो जूतों का भी होना संभव है। यहां मैंने जूतों का जिक्र इसलिए छेड़ा है क्योंकि आमतौर पर नेता की भाषणबाजी में जूतों ने काफी अच्छी तरह से नेता लोगों की खातिरदारी की है। आप से झूठ नहीं बोलूंगा। मेरा भी मन कभी-कभी नहीं बहुत बार किया है ऐसे काम के लिए। खासकर उन मौकों पर जब किसी ने मेरे पूर्वजों के बारे में कुछ अनाप-शनाप बका। आखिर वो कौन होते हैं मेरे पूर्वजों के बारे में कहने वाले। यहां पूर्वजों से मतलब है भारत माता की रक्षा में बलिदान देने वालों से है। जिनका रक्त मेरे शरीर में आज भी उबाला मारता है।

आज भ्रष्टाचार ने अपने देश को फिर से गुलाम बना दिया है। यकीन नहीं होता तो गौरफरमाईएगा, महाराष्ट्र में जिस तरह से तेल के माफियाओं ने जिले के उच्च अधिकारी को जिंदा जलाकर मार दिया। उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहीं देश के उन नेताओं की काली नजर देश को अपने कब्जे में लेने की है। नहीं तो सामान्य व्यक्ति की इतनी हिम्मत की वो ये कारनामा कर दे। हां हिम्मत होती तो आप जैसे कुर्सी वालों को नहीं गिरा देते। समान्य व्यक्ति किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकता। इसमें जरूर किसी स्थानीय अधिकारी या कहीं अन्य से समर्थन मिला है। समझ न आने वाली बात तो यह है कि कोई भी इस तरह का दुस्साहस करने की हिम्मत कैसे जुटा लेता है ?

आज भ्रष्टाचार देश के पूरे तंत्र को अपनी गुलामी की जंजीरों में जकड़ने में लगा हुआ है और अभी भी पूरे देश के किसी भी राजनैतिक दल ने केवल बातें करने के स्थान पर कोई ठोस कार्य योजना बनाने की तरफ सोचना भी नहीं शुरू नहीं किया है और बिना सार्थक विचार विमर्श किये आखिर कैसे इतने बड़े मुद्दे पर सख्त कानून बनाये जा सकते हैं ? आज अगर देश में कुछ गड़बड़ है तो वह हमारा तंत्र। देश के नेताओं और अधिकारियों का नैतिक पतन क्या देश पर कंलक नहीं है? जब सत्ता में इनको बैठाया जाता है तो यही समझ कर कि अमन और शान्ति बनी रहेगी। लेकिन हुआ क्या सब उलट? ऐसे में बली का बकरा कौन बनता है? आम जनता!

अब तो मीडिया वालों की भी शर्म मर चुकी है। इसे लोकतन्त्र का चैथा सतम्भ कहे या खम्बा समझ नहीं आता। वैसे खम्बा कहना भी गलत होगा। क्योंकि खम्बा, सीधा तो खड़ा रहता है लेकिन आज मीडिया तो बिना पिन्दे का लौटा बन चुका है। जिसे जिधर मरजी पुकारों चला आता है। अभी तक समझ नहीं आया कि मीरा राडिया मीडिया की या मीडिया मीरा राडिया का। ऐसे हालात में अगर कोई रवीश कुमार(एनडीटीवी इंडिया) जैसे पत्रकार मीडिया का स्तर ऊंचा करना चाहते है तो कई बंदीशे लगा दी जाती है। यहां रवीश कुमार का जिक्र इस लिए किया गया क्योंकि मैंने अभी तक पत्रकारिता के क्षेत्र में उन जैसा साहसी और निडर पत्रकार नहीं देखा है। हां ऐसे बहुत से पत्रकार हुए है जिन्होंने अपने देश के लिए अपनी कलम और जुबान ही नही अपितु जान भी सौंपी है। आज भी प्रिंट और इलेक्टॉनिक मैं ऐसे पत्रकार हैं जो सच्चाई को अपना हथियार मानते है।

देश के घोटालों का जिक्र करना वर्जित है। ऐसे में यहां कोई ऐसी बात नहीं करूंगा। सरकार नंे कहा है कि अभी कुछ दिन शांत बैठे रहे फिर मिल कर राज करेंगे। लेकिन मेरा ईमान इतना गिरा हुआ नहीं है कि चंद काजग के टुकड़ों से नीलाम हो जाएगा। अब फैसला आपका आना है कि आप गुलाम बने रहना चाहते हो या आजाद रह कर देश सेवा।

भ्रष्टाचार के खिलाफ मिल कर आवाज उठाए।
जय हिन्द।।
लेखक Parmod RISALIA भड़ास4मीडिया के संपादक हैं।

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