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नास्तिकजी का आस्तिकतावादी आडम्बर : एक आतंकवादी दर्शन

Posted On: 22 Aug, 2012 Others में

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प्रकाश चन्द्र पाठक

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नास्तिकजी का आस्तिकतावादी आडम्बर : एक आतंकवादी दर्शन
आतंकवादियों की कई श्रेणियां है. कुछ तो धन संपदा से परिपूर्ण स्वयं भी होते है. तथा वे जिस संगठन से जुड़े रहते है. उनके पास भी अथाह संपदा रहती है. किन्तु वे आतंकवादी मात्र इसलिए बन जाते है क़ि वे मानसिक रोगी होते है. तथा उन्हें दूसरो को तकलीफ पहुंचाने में आनंद मिलता है. कुछ दरिद्र होते है. पहले वे कुछ रोजी रोजगार की तलाश में भटकते है. जब नहीं सफलता मिलती है. तो चोरी और लूटपाट करते है. जब प्रशासन एवं समाज के द्वारा उन्हें दण्डित किया जाता है तो वे छद्म आतंकवादी बन जाते है. और बेमौत मारे जाते है. कुछ एक संगठन ऐसे होते है. जो इन सबसे त्रस्त हो जाते है. तथा कोई दूसरा उपाय ढूँढते है. और तब उनके मन में यह खतरनाक उपाय आता है क़ि लोगो के मूल नीति निर्देशक तत्वों को विखंडित किया जाय. इससे उनकी मानसिकता भंग होगी. लोग अपने मूल राह से भटक जायेगें. फिर नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक एवं आध्यात्मिक पतन होगा. और विनाश लीला शुरू हो जायेगी. ऐसे आतंक वादियों का गिरोह आज भारत में जड़ जमा चुका है. लोगो की चली आ रही परम्पराओं में अपने कुतर्को के बल पर खोट निकाल कर उन्हें उससे दूर करना. फिर उसके बाद उसके विपरीत आचरण करने की शिक्षा देना और अंत में उस व्यक्ति को अपने परिवार, समाज, धर्म, आचरण और अंत में समस्त मानवता से ही अलग करना उनका मुख्य उद्देश्य बन जाता है. ऐसे लोगो को का एक संगठन है. जिसके सदस्यों को इन सब कामो के लिए निश्चित वेतन मान मिलता रहता है. जिस तरह से आतंक वादी संगठन गरीबो, लाचारो एवं त्रस्त लोगो को धन का लालच देकर उन्हें अपने संगठन में सम्मिलित कर लेते है. तथा उन्हें कहते है क़ि तुम गरीबी में ही मर जाओगे. और उसके बाद तुम्हारे बाल बच्चे भीख ही माँगते रह जायेगें. इससे अच्छा है क़ि आतंक वादी बन जाओ. तुम्हें इतना रुपया दे दिया जा रहा है. अगर मर भी जाओगे तो तुम्हारे बाल बच्चे खाने वगैर तो नहीं मरेगें. और यदि जीवित बच गए तो और अच्छा. इस प्रकार ये संगठन अपने सदस्य बनाते है. ठीक इसी प्रकार ऐसे संगठन कुछ पढ़े लिखे मनोरोगियों को अपने संगठन में शामिल कर लेते है. तथा उन्हें एक निश्चित मानदेय देते रहते है. और उन एजेंटो यह ज़िम्मेदारी दे देते है क़ि तुम हिन्दू धर्मशास्त्रों में अपने कुतर्को के सहारे खोट खोजो या अगर खोट नहीं हो तो बनाओ. और लोगो के सम्मुख रखो. तथा उन्हें अपने मूल धर्म एवं संस्कृति से भटकाओ. तुम जितने आदमियों को भटकाओगे, तुम्हें प्रति व्यक्ति इतना मानदेय दिया जाएगा. ऐसे भटके हुए लोग अपने बीबी बच्चो के साथ परिवार, समाज एवं राष्ट्र के लिए घातक हो जाते है. तथा ये उग्र मानसिक रोगी एजेंट अत्यंत खतरनाक किश्म के आतंकवादी होते है. जो आज भारत के कोने कोने में फैले हुए है. तथा लोगो को ठगों, पाखंडियो, ज्योतिषियों एवं पुजारियों से दूर रहने एवं उनसे घृणा करने की सलाह देते रहते है.
जैसे सूर्य तो एक निर्जीव ग्रह है. वह क्यों गुस्सा करेगा? वह किसी का क्या बिगाड़ सकता है? यह सब पंडितो का पाखण्ड है. लोगो को लूटने का धंधा है. देखो आज विज्ञान चन्द्रमा एवं मंगल ग्रह पर जा रहा है. वहां से फोटो ला रहा है. वह कोई देवी या देवता नहीं है. वह कोई व्यक्ति नहीं है. इस प्रकार लोगो के मन में ग्रह, ज्योतिष एवं ज्योतिषियों के प्रति घृणा एवं अविश्वास की भावना भरी जा रही है.
लेकिन ऐसे आतंकवादियों को अब सावधान हो जाना चाहिए क़ि अब लोग जागरूक हो गए है. उन्हें विज्ञान की भी जानकारी हो गयी है. उन्हें यह अच्छी तरह से पता हो गया है क़ि सूर्य परावैगनी किरणों (Ultra Violet Rays) को उत्सर्जित करने का एक अखंड स्रोत है. जो विविध आकार प्रकार के सतह वाले तथा विविध जटिल रासायनिक यौगिको से बने पृष्ठ एवं सतह वाले ग्रहों से टकराकर एवं परावर्तित होकर ट्रांसरेप्टेंसी, मेटाफ्रेगोलिन, सिंक्रिक ट्रांकार्न आदि किरणों के रूप में धरती एवं अन्य ग्रहों एवं उपग्रहों पर पड़ती है. सूर्य की परावैगनी या अल्ट्रावाईलेट किरण जब मंगल के अवतल सतह (Concave Layer) से टकराकर परावर्तित होती है तो उसे शास्त्रों में मृदालिक कहा गया है. तथा आधुनिक विज्ञान उसे ही मेंटाफ्रेंगोलिन नाम से पुकारता है. यह किरण चमड़े पर पड़ने से चमड़ी का कैंसर उत्पन्न करती है. और यह सर्व विदित है क़ि चर्म रोग से सम्बंधित समस्त बाधाओं की शान्ति हेतु सूर्य की उपासना का निर्देश ज्योतिष आदि धर्म ग्रंथो में दिया गया है. आज के आधुनिक विज्ञान में सूर्य चिकित्सा की प्रधानता किस बात का द्योतक है?
यह तथ्य एक छोटा बच्चा भी जान गया है क़ि चन्द्रमा अपनी अद्भुत चुम्बकीय शक्ति से समुद्र के जल को ऊपर खींच लेता है. जिससे समुद्र में ज्वार-भाटा आता है. इसीलिए मछुवारे पूर्णिमा को समुद्र में मछली मारने के लिए प्रवेश नहीं करते है. और ऐसे आतंकवादियों को यह जानकर आश्चर्य होगा क़ि ज्योतिष में चन्द्रमा को जल तत्त्व प्रधान ग्रह कहा गया है.
अभी यह कह कर ये आतंकवादी लोगो को गुमराह नहीं कर सकते क़ि ग्रह कुछ नहीं होते है. या इनमें कोई शक्ति नहीं होती है. या इनका मानव जीवन से क्या लेना देना?
अभी लोगो ने यह प्रत्यक्ष देख लिया है क़ि आधुनिक विज्ञान के द्वारा प्रवर्धित एवं परिपोषित मौसम विज्ञान की भविष्यवाणी नब्बे प्रतिशत गलत निकली है. जैसे अगले तीन दिनों में दिल्ली और उसके आस-पास के इलाको में मानसून प्रवेश कर जाएगा. तथा झमाझम वारिस होगी. और दो दिन बाद जब बारिस नहीं हुई तो यह कह कर टाल दिया जाता है क़ि मानसून का रुख पश्चिम दिशा की तरफ पलट जाने से अभी दिल्ली वासियों को बारिस के लिए अभी कुछ दिन और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी. भूगर्भ विज्ञान का अनुमान केवल कुछ हद तक सही निकला है. वह भी घटना घटने के बाद. जैसे भूकंप की तीव्रता रेक्टर स्केल पर पांच मापी गयी. अरे मूरख, भूकंप की तीव्रता मापने से क्या फ़ायदा? उसके आने का अनुमान क्यों नहीं बताते हो जिससे जान माल के नुकसान से बचा जा सके. लेकिन ऐसे आतंकवादी इन पर ऊंगली नहीं उठाते है. और उनकी इस चाल को लोग बखूबी समझ गए है. क़ि क्या कारण है क़ि आधुनिक विज्ञान की असफलता पर ये लोग चुप्पी साध ले रहे है. ये लोग आज अच्छी तरह समझ गए है क़ि आज चिकित्सालयों में बड़े बड़े डिग्री धारी चिकित्सको की नासमझी, लापरवाही एवं अज्ञान के कारण कितने मरीजो को जान से हाथ धोना पड़ रहा है. फिल्म अभिनेता आमीर खान के सर्वेक्षण के समय चिकित्सालयों की जो स्थिति भारतीय जनता के सम्मुख प्रस्तुत हुई उसे समस्त संसार ने दूर दर्शन पर देखा. लेकिन इस पर ये आतंक वादी कभी कोई टिप्पड़ी नहीं किये क़ि यह एक अधूरा, अध्कचरा या पाखंडी विज्ञान है. और जिस ज्योतिष विज्ञान के सिद्धांतो पर ये विज्ञानी नित नए आविष्कार कर विकशित होने का दावा कर रहे है, उसकी आलोचना कर रहे है. जब ग्रह आदि का इतना ज्ञान आधुनिक विज्ञान के पास नहीं था उसके हजारो वर्ष पूर्व ही ज्योतिष ने इन ग्रहों की गति माप ली थी. जिसे विज्ञान अपने आधुनिक संयंत्रो को बनाने के बाद ही सफल हो सका है. क्या आज का पढ़ा लिखा मानव समुदाय इस तथ्य से अपरिचित है? कदापि नहीं.
सबको यह मालूम हो चुका है क़ि ये आतंकवादी विदेशी आतंकवादी संगठन से जुड़े है. तथा अपने संगठन की नीति के अनुसार हिन्दू धर्मग्रंथो, रीति-रिवाज, धार्मिक कृत्यों एवं एवं पंडितो के प्रति हिन्दुओ के मन ज़हर घोलने का काम कर रहे है.
इन आतंक वादियों को यह भलीभांति जान लेना चाहिए क़ि आज विज्ञान उन्नति कर के इस ज्योतिष को ही प्रमाणित करता चला जा रहा है. आज श्वास काश, दमा, क्षय आदि श्वशन तंत्र की व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को जब चन्द्र-राहू से पीड़ित होने के कारण अगरु, तगरु, गूगल तथा लोबान के समानुपाती मात्रा का हवन करने के लिए कहा जाता है तो यह सब वैज्ञानिकों को विदित हो चुका है क़ि इस योग से उत्सर्जित होनी वाला धुवां लैरिंगटिस एवं फैरिंगटिस सिस्टम के समस्त डिफेक्ट को धीरे धीरे दूर कर देता है.
किन्तु ठीक भी है. बेचारा कुत्ता भी भले ही जूठन ही क्यों न खाए, अपने मालिक के लिए वफादार तो बना ही रहेगा. अब अगर ऐसा कोई मनोरोगी एजेंट किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य बन ही चुका है तो यह स्वाभाविक ही है क़ि उनके कहे अनुसार करे. चाहे सच्चाई कुछ भी हो.
जैसे, इनका कहना है क़ि ग्रह बेचारे तो इतनी दूर अंतरिक्ष में स्थिर है. वे अपनी कक्षा में दिन रात घूम रहे है. तथा प्रकाश फैला रहे है. उनका मनुष्यो से क्या लेना देना? हवन या झाड-फूंक से कही उनकी संचार गति पर कोई प्रभाव पड़ने वाला है क्या? यह सब ढोंग है. ज्योतिषियों का पाखण्ड है. पंडितो द्वारा की जाने वाली ठगी है. इस प्रकार धार्मिक एवं श्रद्धालु हिन्दुओ के अंतस्थल पर यह स्थाई रूप से बिठाने की कोशिश करते है क़ि उनका धर्म, उनके पवित्र ग्रन्थ, उनकी रीतियाँ, परम्पराएं एवं हिन्दू आचार संहिता आदि सब पाखण्ड एवं झूठे है. परिणाम स्वरुप उस धार्मिक श्रद्धालु की पहले तो अपने परिवार के लोगो से घ्रिणा होने लगती है. जो इन सबके अनुयायी होते है. उसके बाद अपने पितरो एवं बुजुर्गो पर घ्रिणा उत्पन्न होती है. क़ि कैसे ये पाखंडी नियमो का पालन करते रहे. धीरे धीरे वे समस्त हिदू समाज एवं धर्म के विद्रोही हो जाते है. कारण यह है क़ि किसी भी व्यक्ति के सामने यदि एक ही बात बार बार दुहराई जाय. रात दिन सोते जागते उनको एक ही पाठ पढ़ाया जाय तो उनकी भी जुबां पर वही बात बैठ जाती है. जैसे संस्कृत भाषा न जानने वाला या न पढ़ पाने वाला भी रोज रोज आरती सुनकर उसे कंठस्थ कर लेता है. जब क़ि उस आरती को लिख दिया जाय तो भले उसे न पढ़ पाय. और ये आतंक वादी इसी नियम के सहारे अपने नापाक मंसूबे को अंजाम देते है.
यद्यपि इन सबका ठोस आधार है. जिसका इसी मंच पर अपने अनेक लेखो में परम विद्वान पंडित आर. के. राय ने स्पष्टि करण भी दिया है. kintu क्षण भर के लिए इसे हम यदि एक निष्प्रभावी क्रिया कलाप ही मान लेते है तो ज़रा इसके फायदे देखिये.
पूजा पाठ या यज्ञ-हवन के नाम पर साफ़ सफाई तो होती है. कुछ लोग इसी सहारे एक स्थान पर एकत्र तो होते है. लोगो का मिलना जुलना तो होता है. सब को एक दूसरे का दुःख सुख बांटने का अवसर तो मिलता है. वातावरण तो विविध सुगन्धित पदार्थो के धूम से सुगन्धित होता है. और यही इन आतंक वादियों को मंज़ूर नहीं है. सदियों से चली अ रही सामाजिक समरसता एवं सुख शान्ति इन्हें हज़म नहीं होती है.
आप ज़रा स्वयं देखें, जब से आधुनिक सामाजिक सुधार का डंका बजा है. हिन्दू धर्म के क्रिया कलापों में मीन-मेष निकालना शुरू हुआ तब से दंगा-फसाद, मार-काट, उंच-नीच का भेद और सामाजिक मूल्यों का पतन अति शीघ्रता पूर्वक हुआ है. आप आंकड़ा देखें तो पता चलेगा क़ि पिछले पचास वर्षो में बारह सौ प्रतिशत ज्यादा दंगे  फसाद एवं धार्मिक उन्माद फैले है.
यहाँ पर मै एक छोटा सा नमूना प्रस्तुत करना चाहूंगा-
ग्रामीण इलाको में जब गठिया या आमवात या समलबाई आदि होती है तो ओझा जी अरंडी एवं धतूरे के पत्ते से संक्रमित स्थान पर नियमित रूप से प्रातः काल झाड़ते है. पता नहीं इन आतंकवादियों को इस तथ्य का ज्ञान है या नहीं क़ि धतूरे एवं अरंडी के पत्ते में फेनोडीन क्लोराइड एवं सेल्यूडीन ब्रोमाइड होता है. जो बहुत ही प्रभावकारी अनाल्जेसिक एवं स्टीम्यूलेटर होता है. तथा बार बार संक्रमित स्थान पर घुमाने फिराने से क्लोटोरायिज्ड वेंस  प्रसारित हो जाती है. और इस क्रिया को नियमित रूप से दुहराने से यह रोग स्थाई रूप से शांत भी हो जाता है. किन्तु यदि रोग पुराना हुआ तो यह आजीवन करना पड़ सकता है. बड़े अफसोस की बात है क़ि लोग आज कल के चिकित्सालयों में इन व्याधियो के निराकरण के लिए चक्कर लगाते है. बहुत दिनों तक घूम फिर कर जब निराश हो जाते है तो उसके बाद फिर ओझाजी एवं ज्योतिषी जी की शरण में आते है. इस चिकित्सालय के चक्कर लगाने के दौरान आम जनता पता नहीं कितना पैसा एवं समय बर्बाद कर देती है. किन्तु उन्हें कोई दोष देने वाला नहीं है. यदि चिकित्सक जी ने हज़ार रुपये भी फीस मांग दी तो उसमे कोई बारगेनिंग नहीं हो सकती. चाहे आप उस चिकित्सक के पास सर्दी ज़ुकाम की ही दवा लेने क्यों न जाय, फीस हज़ार रुपये ही देनी पड़ेगी. यदि प्रमाण चाहिए तो इलाहाबाद के बैरहना चुंगी स्थित गायत्री हास्पीटल में ज़ुकाम की दवा लेने जाईये आप को पता लग जाएगा. लोग देकर चले आते है. तो वह देना वैध है. यह शोषण उचित एवं विधान सम्मत है. चाहे बीमारी ठीक हो या न हो, दवा की भारी भरकम कीमत तथा चिकित्सक जी की भारी भरकम फीस तो देनी ही है. उसमें कोई गुन्जाईस नहीं है. किन्तु यदि किसी ओझा जी ने कुछ मांग दिया तो वह ठग हो गए.  आधुनिक चिकित्सक ने इलाज़ किया. रोग ठीक हो या न हो, फीस देनी ही देनी है. किन्तु यदि ओझाजी ने कुछ ले लिया तो ये आतंकवादी सीधे सादे  लोगो को बरगलाकर आसमान सिर पर उठा लेते है. तथा भोलीभाली जनता इनके कुचक्र में फंस जाती है.
शरीर पर चोट पहुंचाने वाले आतंकवादी इतने खतरनाक नहीं है जितने खतरनाक ये मनोविकार पैदा कर हिन्दू धर्म एवं धार्मिक ज्ञान को दूषित करने का प्रयत्न करने वाले पढ़े लिखे मानसिक रोगी एजेंट आतंकवादी है. यदि इनसे जनता सावधान नहीं हुई तो धर्म तो जाएगा ही, धन, परिवार एवं नैतिकता सबका सर्वनाश हो जाएगा.
ध्यान रहे, ऐसे आतांकवादियों का न तो कोई धर्म होता है और न ही कोई ईमान, न इनका कोई परिवार होता है और न ही कोई समाज. न तो इनके ह्रदय में दया होती है न ही इंसानियत के प्रति लगाव. इनका एक ही आदर्श होता है लोगो के ध्यान को भंग कर एक नए कुचक्र एवं षडयंत्र का शिकार बनाकर इनके अन्तः करण का दोहन एवं धार्मिक विषाक्तिकरण. इनका धर्म लोगो की तन्मयता और लय भंग कर उन्हें बरगलाना, बिना किसी नीती एवं आचार विचार या सिद्धांत वाले संगठन की स्थापना एवं अधर्म, अनीति एवं अनाचार की स्थापना.
ऐसे मानसिक रोगी एवं विकृत मनोमष्तिष्क वाले पढ़े लिखे तथाकथित कुतर्कियो से सावधान रहे. ऐसे ही लोग छद्म रूप धारण कर के लोगो को उनके धर्म से भटका देते है. तथा धीरे धीरे उनका धर्म, इज्ज़त, शान्ति एवं सुख सब कुछ छीन लेते है. ये विदेशी आतंकवादी संगठनो के सदस्य है. इन्हें किसी देश या समाज से कुछ नहीं लेना देना. देखने में ये बड़े सीधे, पढ़े-लिखे एवं लोगो के परम हितैषी जान पड़ते है. प्रथम दृष्टया इनके कुतर्क बड़े अचूक लगते है. जिससे लोग आसानी से इनके शिकार बन जाते है. और विदेशी आतंकवादी संगठन ऐसे ही एजेंटो को अपने संगठन में शामिल कर अपने उद्देश्य पूर्ती में आगे बढ़ रहे है. इनका मूल उद्देश्य है हिन्दुओं को उनके हिन्दू धर्म से भटकाना. ये हिन्दू बन कर हिन्दुओ के दिल दिमाग को दूषित कर रहे है. इन्हें सच्चाई से कुछ भी नहीं लेना देना. सदियों से चली आ रही परम्पराओं को अपने कुतर्को द्वारा उसकी वास्तविकता को तोड़ मरोड़ कर लोगो के सम्मुख रख कर उनके दिनचर्या में खलल डालना, एक दूसरे के प्रति वर्षो से चले आ रहे सम्बन्ध में ज़हर के बीज बो कर परस्पर असमानता की भावना जागृत करना. उनके दिन रात का चैन छीन कर दिमाग में यह कीड़ा भर देना क़ि आज तक तुम्हें ठगा जाता रहा है. अब जागो और अपना अधिकार मांगो. लेकिन यह नहीं बताया जाता है जिस चीज की मांग तुम कर रहे हो उसके लिए कितनी चीजो का बलिदान दे रहे हो. पूरी बस चुरा लो और एक नट दान कर दो. सब कुछ लुटाकर थोथे सामाजिक सुधार एवं तुच्छ अधिकार की मांग करना कितनी बुद्धिमता है?
जनता सावधान ! ये आतंक वादी शस्त्रधारी नहीं बल्कि शास्त्रधारी है. इनकी लच्छेदार भाषा बड़ी लुभावनी होती है. किन्तु हकीकत यह है क़ि इनका वास्तविकता से कुछ भी लेना देना नहीं है. ये सिर्फ बातो के धनी है. ऐसे आतंकवादी दिल के बहुत ही कमजोर होते है. इसीलिए ये लोगो की कमजोर नस दबाते है. किन्तु जब जान जायेगें क़ि जनता जाग रूक है. उस स्थान पर कदापि कदम नहीं रखेगें.
(इस लेख में अधिकाँश तथ्यों को प्रमाण के तौर पर पंडित आर. के. राय के द्वारा संग्रहीत विविध लेखो से लिया गया है. ऐसे महानुभाव को चरण स्पर्श)
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