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मंदिरों पर हुए अत्याचार भारत के पतन के कारण बने. भाग 2

Posted On: 3 Jul, 2012 Others में

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प्रकाश चन्द्र पाठक

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मंदिरों पर हुए अत्याचार भारत के पतन के कारण बने. भाग 2
भारत के सब मंदिरों को छोड़ हम हिदुओं की प्रसिद्ध तीर्थ स्थली काशी की तरफ रुख करते है. मंदिरों में संचित संपदा किस तरह लोक कल्याण कारी एवम जन समुदाय के हितार्थ खर्च होती थी. इसका एक जवलंत उदाहरण देखा जा सकता है.
काशी के तत्कालीन राजा महाराजा आदित्य नारायण सिंह हुआ करते थे. उनके राज्य में वाराणसी में संकट मोचन मंदिर के निकट थोड़ी दूरी पर जंगल में एक शिव मंदिर हुआ करता था. एक ब्राह्मण की उस पर नज़र पडी. उसने उसकी साफ़ सफाई की. तथा श्रद्धा वश कुछ फूल पत्ते उस शिव लिंग पर चढ़ाए. वह ब्राह्मण देवता अब दिन भर अपना कार्य निपटाने के बाद सुबह शाम उस शिवलिंग की सेवा कर दिया करते थे. धीरे धीरे कुछ लोगो की नज़र उधर गयी. कुछ चढ़ावा उस शिवलिंग पर आने लगा. ब्राह्मण देवता उसे एकत्र कर के एक छप्पर वही पर डाल दिए. धीरे धीरे लोगो का वहां आना जाना शुरू हुआ. उस ब्राह्मण देवता ने अब वहां पर कुछ शिक्षा दीक्षा देनी शुरू कर दी. काशी के कुछ धनाढ्य सेठ महाजन कुछ आर्थिक मदद कर उस मंदिर में भोजन पानी की भी व्यवस्था कर दिए. अभी उस मंदिर का रूप एवं आकार बढ़ने लगा. तब यह ब्राह्मण देवता काशी से बाहर जाकर राजाओं, बादशाहों एवं सुल्तानों से दान, भिक्षा एवं सहायता के नाम पर धन एकत्रित करने लगे.
इसी बीच वह फैजाबाद के तत्कालीन सुलतान के दरबार में इस मंदिर सह शिक्षण संस्थान के लिए सहायता मांगने पहुंचे. हिन्दुओं एवं हिन्दू शिक्षण संस्थानों से स्वाभाविक शत्रुता के कारण उस सुलतान को उस ब्राह्मण की बेईज़ती करने की सूझी. उसने अपने पाँव की एक जूती उस ब्राह्मण देवता की तरफ उछाल दी. ब्राह्मण देवता उस जूती को बहुत सम्हाल कर रख लिए. तथा फिर बोले-
“हे आलम पनाह! एक जूती तो आप ने दे दी. अब दूसरी जूती आप के किसी काम की नहीं रही. यदि उसे भी दे देते तो बहुत मेहर बानी होती.”
और गुस्से में सुलतान ने दूसरी जूती भी उस ब्राह्मण की तरफ उछाल दी. ब्राह्मण देवता ने दोनों जूतियों को सम्हाल कर कपडे में लपेट कर रख लिया. और दरबार से बाहर चले आये.
दूसरे दिन उन्होंने पूरे शहर में ढिंढोरा पिटवाया क़ि आज शाम को सुलतान के जूती की नीलामी होने जा रही है. जो सबसे ज्यादा बोली लगाएगा उसे जूती दे दी जायेगी. इसकी खबर सुलतान के दरबार में पहुँची. अब सबने सुलतान से कहा क़ि हे बादशाह! यह तो बहुत अनर्थ हो गया. बादशाह ने पूछा क़ि क्या हो गया? दरबारियों ने काहा क़ि यदि किसी ने आप की जूती की कीमत एक पैसे लगा दी तो आप की क्या इज्ज़त रह जायेगी. बहुत बेईज्ज़ती होगी. सुलतान ने तत्काल उस ब्राह्मण को बुलवाया. उसने जूतियाँ वापस करने को कहा. ब्राह्मण ने कहा क़ि हे आलम पनाह! आप के मज़हब में भी लिखा गया है क़ि ज़कात की गयी चीज वापस नहीं लेते. सुलतान ने कहा क़ि हे ब्राह्मण उस जूती के बदले में तुम्हें हम दश हजार रुपया दे रहे है. तुम जूतियाँ वापस कर दो. और वह ब्राह्मण देवता दश हजार रुपया लेकर अपने मंदिर में वापस आ गए. तथा उस मंदिर का विस्तार होने लगा. अब वह ब्राह्मण देवता भारत के अन्य राज्यों में भी घूम घूम कर दान मांगना शुरू किये. कही नकद पैसा मिला. कही ज़मीन दान में मिली. अंत में वह ब्राह्मण देवता काशी नरेश महाराजा रामनगर के यहाँ पहुंचे. तथा ज़मीन की मांग किये. राजा ने उस मंदिर के इर्द गिर्द के सत्ताईस गाँव खाली कराकर उन्हें कर्मनाशा नदी के तट पर बसाया. और उस स्थान पर जो मंदिर बना वही आज विश्व के महानतम शिक्षण संस्थान एवं एशिया महाद्वीप के प्रथम स्थान प्राप्त विशालकाय विश्वविद्यालय “काशी हिन्दू विश्व विद्यालय” BHU के नाम से प्रसिद्ध है. तथा वही ब्राह्मण देवता पंडित महामना मदन मोहन मालवीय थे.
किन्तु यह सत्य नहीं है. कारण यह है क़ि इसका उल्लेख किसी मुस्लिम साहित्य या विदेशी साहित्य में नहीं आया है. इसलिए यह यह सब एक कोरी कल्पना है. तहा सर्वथा अविश्वसनीय है. इस कथा का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है. यह केवल कहने, सुनाने के लिए है. क्योकि यह केवल एक हिन्दू कथा है. किसी आयत, हदिश या शरीयत में इसका विवरण नहीं दिया गया है.
वैसे आज भी इस अलौकिक शिक्षण संस्थान के प्रांगन में भव्य भवन में भगवान भोले नाथ आदि शिक्षक के रूप में विराज मान है. जिसे कोई भी देख सकता है. सिर्फ अंधे को यह अलौकिक छटा दिखाई नहीं देगी. क्योकि उसने तो मंदिर को सदा “स्विस बैंक” के रूप में देखा है.

“जाकी रही भावना जैसी.
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.

पाठक

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