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मंदिरों पर हुए अत्याचार भारत के पतन का कारण बने.

Posted On: 3 Jul, 2012 Others में

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प्रकाश चन्द्र पाठक

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मंदिर आदि काल से ज्ञान के श्रोत रहे है.
हमें यह भली भाँती यह ज्ञात है क़ि प्राचीन काल में राजाओं के यहाँ हर प्रकार के भोग विलास की सामग्री एवं संसाधन होने के बावजूद भी वे अपने राज कुमारो को पढ़ने एवं शिक्षा प्राप्त करने के लिए जंगलो एवं वीरानो में बने विविध ऋषियों के आश्रमों में भेजा करते थे. किसी भी आश्रम में निश्चित रूप से एक यज्ञशाला या धर्म स्थल होता ही था. वहां पर उन शिक्षार्थियों को धार्मिक, नैतिक, राजनीतिक, चारित्रिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं सदाचार की गहन एवं पूर्ण शिक्षा दी जाती थी. वहां पर चाहे राज कुमार हो या सामान्य शिष्य सबके लिये समान दंड एवं पुरस्कार की व्यवस्था होती थी. वहां की शिक्षा इतनी कठोर, अनुशासित एवं संयमित होती थी क़ि चाहे वह राज कुमार ही क्यों न हो उसे वही के परिवेश में रहना पड़ता था. वही का भोजन ग्रहण करना पड़ता था. वही का वेश धारण करना पड़ता था. और इतने कठोर अनुशासन में आस्था, लगन एवं तल्लीनता से शिक्षा प्राप्त कर राज कुमार सफल राजा बनते थे. और राजा तथा सामंत लोग इन ऋषियों के आश्रमों एवं मंदिरों को धन संपदा आदि दान में दिया करते थे. जिनका उपयोग गुरुकुल या आश्रम के शिक्षक शिक्षार्थियों के लिए विविध अध्ययन संयंत्र एवं संसाधन जुटाने में लगाते थे.
आश्रम में चलने वाले निरंतर भंडारे के द्वारा कितने ही गरीब एवं निरीह लोगो का प्रति पालन होता था. लगातार यज्ञादि तथा व्रत पर्व के अवसरों पर हजारो लाखो लोगो को भोजन मिलता था. यदि इन मंदिरों एवं आश्रमों को दान नहीं मिलता तो इनका व्यय कहाँ से संतुलित होता?
दंडकारण्य में ऋषि विश्वामित्र द्वारा समस्त राक्षस समुदाय को एकत्रित कर अपने आश्रम में जो शिक्षा दी जाती थी उसका व्यय भी तो इन्ही दान आदि के द्वारा ही चलता था.
दुर्वाशा ऋषि के पास एक चलता फिरता विश्व विद्यालय हुआ करता था. जिसमें दश हजार शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे. उनका व्यय भार भी इन दान आदि से प्राप्त धन के द्वारा ही चलता था.
कही किसी के द्वारा सताए जाने पर लोग इन्ही आश्रमों में ही शरण पाते थे. इन्ही मंदिरों में इनके रहने एवं खाने पीने की व्यवस्था होती थी. ये मंदिर वास्तव में केवल समर्थो के लिए ही नहीं, बल्कि गरीब, निरीह, असहाय, लाचार, बीमार एवं निराश सबकी शरण स्थली हुआ करती थी.
किन्तु इसे कौन मानेगा? क्योकि यह तो हिन्दू धर्म ग्रंथो में लिखा गया है. इसे हिन्दुस्तान के लोगो ने लिखा है. हिन्दुओ ने लिखा है. इसे प्रामाणिक तब माना जाता जब यह किसी विदेशी मुसलमान या ईसाई द्वारा लिखा गया होता. क्योकि मुस्लिम किताबें प्रामाणिक, विश्वसनीय एवं शुद्ध होती है. क्योकि विदेशी लेखक विद्वान, तपोनिष्ठ, ईमानदार एवं निष्पक्ष निर्णय देने वाले होते थे. इसलिए उनके द्वारा लिखी बातो में किसी प्रकार के संदेह की कोई गुन्जाईस ही नहीं रह जाती. हिन्दुस्तान या भारत में नालंदा, सौराष्ट्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आदि में केवल मूरख, अनपढ़ एवं जाहिल लोग हुआ करते थे. यहाँ विद्वानों की भारी कमी थी. इसीलिए विदेशी लोगो के द्वारा लिखी बातें प्रामाणिक होती थी. शुद्ध आचार, विचार, व्यवहार एवं पूर्णज्ञान वाले विदेशी मुसलमानों के द्वारा सदा ही प्रामाणिक बातें लिखी जाती थी.
रामचरितमानस एक कथा है. जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं. किन्तु जरथस्तु एक प्रामाणिक ग्रन्थ है जो यहूदियों द्वारा लिखी गयी. महाभारत एक कोरी कल्पना है जो मनोरंजन के लिए वेद व्यास ने रचा. इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है क्योकि इसका उल्लेख किसी आयत, हदिश या शरीयत में नहीं हुआ है.
आज भी यदि देखें तो अनेक ऐसे मंदिर है जहां निःशुल्क शिक्षण व्यवस्था है. किन्तु वहां पर कुरआन, बाइबिल एवं अन्य धर्मो की शिक्षा नहीं दी जाती है. और मात्र इसीलिए यह मंदिर स्विस बैंक है.
अंधे एवं बहरे को क्या समझाया जाय? प्रत्यक्ष जो चीज अभी आज भी दिखाई दे रही है उसे इनकार कर अपने अंधत्व एवं बधिरता का प्रदर्शन यदि कोई करता है तो उसको क्या नाम दिया जा सकता है? आज भी उत्तरप्रदेश के गोरख नाथ का मंदिर जिसकी संपदा से देश विदेश में नाम मात्र की कीमत पर अनेक साहित्य, उपनिषद् दर्शन आदि की पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती है.
यदि मंदिरों में संपदा एकत्र नहीं की जाय तो यह सब व्यय कहाँ से किया जाएगा? महाराजा हर्ष वर्धन प्रत्येक वर्ष माघ के महीने में प्रयाग की तपोभूमि पर अपना सारा अर्जित धन बाँट जाते थे. पांडू पुत्र कर्ण प्रत्येक दिन एक लाख मन सोना दान किया करते थे.
किन्तु यह सब बकवास है. कारण यह है क़ि इनका उल्लेख किसी विदेशी साहित्य में नहीं किया गया है. ये सब बातें सिर्फ भारतीय पुस्तकों में ही मिलती है. और चूंकि ये सब भारतीय पुस्तकों में लिखी बातें है, इसीलिए ये अविश्वसनीय है.
ज़रा देखें, कुसतुनतुनिया से जोजीला दर्रा लांघते एक मुग़ल शाशक उमर शेख मिर्ज़ा भारत आया. वह कितने मंदिरों को लूट कर वापस गया? या उसका बेटा ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर मंदिरों को लूट कर क्यों नहीं अपने वतन को वापस चला गया? या उसका बेटा हुमायूं भी मंदिरों को लूट कर वापस जा सकता था. उसके बाद भी हुमायूं का बेटा ज़लालुद्दीन मुहम्मद अक़बर मंदिरों को लूट कर कुसतुनतुनिया वापस जा सकता था. उसका बेटा औरंगजेब क्यों नहीं वापस चला गया? उसे तो बस मथुरा का मंदिर तोड़ना था. काशी का विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करना था. या प्रयाग स्थित अक्षयवट को जला कर समाप्त करना था. ज़रा इन बुद्धि हीनो से कोई पूछे क़ि कोहिनूर हीरा किस मंदिर की संपदा थी. ? उसके बाद वर्ष 1600 में अंग्रेजो ने कलकत्ता में ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव रखी. और वर्ष 1947 तक भारत में ही रह गए. उन्हें इतने दिन यहाँ रहने की क्या ज़रुरत थी? मंदिरों एवं मठो को लूट कर वापस चला जाना था.
भारतीय मंदिर अत्यंत समृद्ध ज्ञान संपदा के केंद्र हुआ करते थे. जहां विविध न्याय, नीति, ज्ञान, वैराग्य, साहित्य एवं वेद वेदांतो की शिक्षा प्रदान की जाती थी. इस बौद्धिक संपदा को तहस नहस करना तथा इनका अपहरण करना ही उनका मुख्य उद्देश्य था. यहाँ की अत्यंत उच्च जीवन शैली पूरे विश्व की सरमौर थी. यहाँ की बौद्धिक संपदा ही थी जिसके बल पर स्वामी विवेका नन्द विदेश में जाकर ज्ञान का डंका बजा आये. और मालूम है, उन्हें यह प्रारम्भिक शिक्षा कहाँ से मिली थी? उस प्रसिद्ध आनदमठ से जिस के ऊपर बंकिम चन्द्र चटर्जी ने उपन्यास लिख डाला.
भारत पहले भी सोने की चिड़िया था. आज भी सोने की चिड़िया है. अंतर मात्र इतना है क़ि प्राचीन काल में इसका बसेरा मंदिरों एवं मठो में होता था. जहां पर इसका प्रयोग एवं उपयोग शिक्षा देने एवं गरीबो की सहायता करने में होता था. और आज विविध मंत्री, शाशक एवं सरकारी खजाने रूपी लूट का माल खपाने वाले गोदाम के यहाँ भरी पडी है. जहां व्यभिचार, अत्याचार, विषय-वासना तथा अन्य अनैतिक कार्यो को अंजाम देने में प्रयुक्त होती है. जब से मंदिरों की संपदा को सार्वजनिक कर उनका सरकारी करण किया गया, वह सारी संपदा सरकारी खजाने में पहुँच कर चोर उचक्कों बलात्कारियो एवं हत्यारों के उपयोग की वस्तु बन गयी. तथा नीति, धर्म, ज्ञान, विज्ञान एवं न्याय आदि की शिक्षा का प्रायः लोप सा हो गया. आज शिक्षण संस्थान कुत्सित राजनीति, बलवा, हड़ताल, कुकर्म गुंडागर्दी एवं एयासी के केंद्र बनकर रह गए है.
ये सारे विदेशी मात्र मंदिरों को ही यदि लूटने आये थे तो फिर नालंदा विश्वविद्यालय को जलाने की क्या जरूरत थी? इस महानतम एवं प्राचीन ज्ञानशाला को नष्ट करने से उन्हें कौन सा खजाना हासिल हो गया?
विदेशी आक्रमणकारी भारत की सुख शान्ति से ईर्ष्या करते थे. यहाँ की जमा पूंजी आध्यात्म, ज्ञान एवं मनमोहक मधुर जीवन उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाती थी. वसुधैव कुटुम्बकम कुरआन शरीफ या बाइबिल का उपदेश नहीं है. मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अतिथि देवो भव, ये सब शिक्षाएं किसी विदेशी साहित्य की नहीं अपितु भारतीय ज्ञान संपदा है. जिसकी पढ़ाई कैब्रिज, आक्सफोर्ड या वेलिंग्टन यूनिवर्सिटी में नहीं होती थी. या जब ये उपदेश दिए जाते थे तब भारत में आज कुकुर मुत्तो की तरह फैले इतने सारे विश्व विद्यालय नहीं होते थे. बल्कि इनकी शिक्षा मंदिरों एवं मठो में ही दी जाती थी.
पता नहीं कुछ लोग दो आँखों से युक्त होने के बावजूद भी एक ही तरफ एक ही पहलू को क्यों देखते है? कौवा भी एक ही आँख वाला जानवर होता है. फिर भी वह दोनों तरफ देखता रहता है. किन्तु जो दो आँखों वाला है वह तो इन एक आँखों वाले जानवर से भी गया गुज़रा है जिसका ख़याल मंदिरों एवं मठो के बारे में इतना गया गुजरा है.
सारी जनता से सरकारी टैक्स ,फीस एवं लेवी के रूप में पैसा शोषित कर एयासी का जीवन जीने वाले तथा नितांत व्यक्तिगत स्वार्थ में अनर्गल व्यय करने वाले सामाजिक एवं दार्शनिक कहलाने का ढोंग पीट रहे है. तथा किसी के दान पर स्वयं एवं कुछ असहाय एवं गरीबो की सहायता करने हेतु धन संग्रह करने वाले लुटेरे एवं सामाजिक शोषक हो गए.
क्या कभी सुना है क़ि गुरुकुल में शिक्षा देने के लिए कोई फीस ली जाती थी.? क्या मात्र धन संपदा ही गुरुकुल में शिक्षा देने का माप दंड हुआ करता था? यदि ऐसा था तो कृष्ण एवं सुदामा दोनों एक ही गुरुकुल में कैसे शिक्षा ग्रहण करते थे.?
किन्तु यह तो एक दन्त कथा है. क्योकि यह किसी विदेशी या मुस्लिम ग्रन्थ में नहीं बताई गयी है. यदि किसी विदेशी साहित्य में इसका उल्लेख होता तो अवश्य यह सत्य घटना होती.
तात्पर्य यह क़ि यदि किसी विदेशी साहित्य, गैर हिन्दू साहित्य या मुस्लिम या ईसाई साहित्य में कोई बात कही गयी है. तो वह सत्य, प्रामाणिक एवं विश्वसनीय है. किन्तु यदि किसी भारतीय, या हिन्दू साहित्य में किसी घटना का ज़िक्र है तो वह मात्र एक कपोल कल्पना या दन्त कथा है. जिसका वास्तविकता से कुछ भी लेना देना नहीं है.
क्या होगा इस देश का जहां ऐसे अंधे बहरे, कूप मंडूक, मूरख लोग समाज सुधारक, नेता एवं दार्शनिक कहलाने लगेगें?
विदेशियों ने तो सिर्फ धन लूटा किन्तु ये ऐसे समाज सुधारक तो नीति, धर्म, सदाचार, न्याय एवं चरित्र सबका समूल ही उत्खनन कर रहे है. अंतर सिर्फ इतना है क़ि विदेशी विदेशियों के रूप में डंका पीट कर लूटते थे. तथा फिर उस धन का संग्रह हो जाता था. किन्तु ये समाज सुधारक जौ के कीड़े की तरह सीधे सादे लोगो के ह्रदय में घुस कर अन्दर से खोखला कर रहे है जिनका पुनर्संग्रह बहुत ही कठिन है.
पाठक

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