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लड़कियों की आज़ादी या बर्बादी

Posted On: 14 Jul, 2012 Others में

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प्रकाश चन्द्र पाठक

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लड़कियों की आज़ादी या बर्बादी
लड़कियों की आज़ादी एक ऐसा मुद्दा बन गया है जो आज एक तपते हुए गर्म तवे का रूप धारण कर चुका है. और इस पर क्या समाज सेवी, क्या महिला आयोग, क्या राज नीतिक दल और क्या टूट पूंजिहे विचारक सभी अपने अपने अनेक तरह के आटे की रोटियाँ सेंकते चले जा रहे है. किताबी फिलास्फां के हवाई उड़ान में मजे से उड़ते हुए किसी को धरातलीय वास्तविकता की तरफ देखने की रूचि नहीं है. क्योकि यदि सतही सच्चाई की तरफ देखेगें तो यह एक सठियाई हुई पुरातन विचार धारा हो जायेगी.
क्या प्राचीन काल में बेटियों के आठ हाथ पैर होते थे? या क्या प्राचीन काल में लड़कियां सुन्दर नहीं होती थीं? क्या प्राचीन काल में रावण, दुशासन और हिरण्यकश्यप नहीं होते थे? या क्या प्राचीन काल के माता-पिता या अभिभावक अपनी बेटियों के शील, आचरण, इज्ज़त तथा मान मर्यादा के प्रति लापरवाह थे?
लड़कियों की आज़ादी को आज किस रूप में परिभाषित करने के लिए हो हल्ला हो रहा है? क्या पढ़ाई या शिक्षा दीक्षा की दिशा में उनकी आज़ादी छिनी जा रही है? क्या नौकरी के क्षत्र में उन्हें आज़ादी नहीं दी जा रही है? आज लड़कियों की आज़ादी का मतलब है उन्हें स्वच्छंद रूप से लड़को के साथ विचरण करने की आज़ादी. उन्हें लड़को के समान आचरण करने की आज़ादी.
क्या आधुनिक साजो सामान से सुसज्जित पार्टी में जाने की इजाज़त मिल जाने से उनकी गुलामी समाप्त हो जायेगी? क्या लड़को के साथ हंसी ठिठोली करने से लड़कियां आज़ाद कहलायेगीं?
लडके अपनी पार्टी करते है. उसमें वे एक दूसरे के साथ कैसी भाषा, इशारा, हरक़त आदि करते है. वे अपनी प्रकृति, बनावट, परिवेश एवं चर्या के अनुसार अपनी पार्टी मनाते है. क्या उनके साथ लड़कियों को पार्टी में शरीक होना तथा वही हरक़तें करना एवं करवाना ही आज़ादी है? आज कल की पार्टी में क्या होता है, इससे कौन परिचित नहीं है? क्या रात के अँधेरे में ही एक जवान लड़की की पार्टी परवान चढ़ती है?
क्या अँग प्रत्यंग को बखूबी दर्शाने वाले वस्त्र पहनने की इजाज़त लड़कियों को देना ही उनकी आज़ादी है? तो यदि वस्त्र पहनने का तात्पर्य अँग प्रदर्शन ही है तो फिर वस्त्रो की क्या आवश्यकता? निर्वस्त्र ही रहे. और ज्यादा अच्छी तरह से अंगो की नुमाईस हो जायेगी.
यदि पुरातन विचार धारा को छोड़ ही दिया जाय तो आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ही लड़कियां लड़को के किन किन कामो की बराबरी करेगीं? कौन कौन से काम लड़कियां लड़को के समान करेगीं?
जब कभी कोई नदी अपनी सीमा तोड़ती है तो बाढ़ ही आती है. और सिवाय नुकसान के कुछ भी हाथ नहीं लगता. पेट खाना खाने के लिए होता है. वह कोई गोदाम नहीं है जिसमें कूड़ा कबाड़ भर दिए जाय. टोपी पैर में नहीं बल्कि सिर पर शोभा पाती है. सबकी अपनी सीमा होती है. लड़कियों को अपनी प्रकृति, स्वभाव तथा चर्या को ध्यान में रखते हुए स्वयं अपनी सीमा निर्धारित करनी चाहिए.
लड़कियों को उस क्षत्र में परचम लहराना चाहिए जिसमें उनकी प्रकृति उनका साथ दे.
लड़कियां सदैव लड़को से आगे रह सकती है. किन्तु अपने क्षेत्र में ही उन्हें आगे बढ़ना चाहिए. हम एक ही उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करते है.
झांसी की रानी लक्ष्मी बाई कोई पार्टी रात के अँधेरे में अटेंड नहीं करती थी. उन्हें किसी कैबरे या पाश्चात्य नृत्य शैली का ज्ञान नहीं था. वह किसी पर पुरुष के साथ कमर में हाथ डाल कर “डांस” नहीं किया करती थी. लेकिन किसी मनचले या छिछोरे की हिम्मत नहीं थी जो उनकी तरफ बदनियति की नज़र डाल सके. और स्वतन्त्रता की लड़ाई में उन्होंने अंग्रेजो के छक्के छुडा दिए.
उनके ऊपर सख्त परम्परागत अनुशासन था. उनका आवास अन्तःपुर में ही होता था. उनके ब्वाय फ्रेंड नहीं हुआ करते थे. और तो और उन्हें अपनी मर्जी के मुताबिक़ अपना जीवन साथी भी चुनने की इजाज़त नहीं थी.
कारण यह था क़ि उन्हें अपने माता-पिता, अभिभावक पर भरोसा था. उन्हें ज्ञात था क़ि उनके माता पिता कभी भी उनकी बुराई नहीं चाहेगें. वह जो भी करेगें उसमें उनका सुख मय संसार ही होगा. आज लड़कियों को अपने मा बाप पर भरोसा नहीं रहा. उन्हें अपने जीवन साथी चुनने की स्वतन्त्रता चाहिए. मा बाप के अनुभव, विचार, भाव या सोच की कोई महत्ता नहीं है. उनके आदर्श एवं प्रतिबन्ध आज कल के लडके लड़कियों के लिए बेमानी है.
आज कल की लड़कियों को आज़ादी कुल खान दान की इज्ज़त, मान मर्यादा, शिक्षा, सदाचार एवं नैतिकता के उत्थान के क्षत्र में नहीं, बल्कि पार्टी, पिकनिक, ड्रेस एवं “फास्ट फ़ूड” के क्षत्र में चाहिए.
क्या लड़कियां लड़कियों को अपना फ्रेड नहीं बना सकतीं? क्या आवश्यक है क़ि लड़की का फ्रेड लड़का ही होगा?
ज़रा सच्चे मन से अपने दिल पर हाथ रख कर यह बताइये क़ि एक लड़की का फ्रेंड लड़का किस लिए होगा? शिक्षा के क्षेत्र में तो किसी सीमा तक मै मान सकता हूँ. हालाकि तार्किक रूप से यह भी मानने के योग्य नहीं है. क्योकि शिक्षा के भी क्षेत्र में लड़कियां लड़कियों से ही सहयोग लें तो अच्छा है. किन्तु इसके अलावा यदि कोई लड़की किसी लडके को फ्रेंड बनाती है तो किस उद्देश्य की पूर्ती के लिए? दिन की पार्टी में वह कौन सा मजा है जो नहीं मिलता है. और रात की पार्टी में मिलना शुरू हो जाता है?
अभिभावकों या माता पिता ने इस तरह के व्यवहार के लिए यदि अपनी लड़कियों को प्रतिबंधित किया था तो उसके पीछे क्या कारण था? क्या वे चाहते थे क़ि उसकी बेटी उन्नति या विकाश न करे? क्या कोई भी मा बाप यह चाहेगा क़ि उसकी बेटी का यश न बढे?
थोथे आदर्शो को छोड़ कर देखें. क्या लडके ही बलात्कार कर रहे है? क्या लड़कियां बलात्कार नहीं कर रही है? अंतर सिर्फ इतना है क़ि लडके सड़क पर बलात्कार कर रहे है. तथा लड़कियां बार, रेस्टुरेंट एवं मसाज़ पार्लर में बलात्कार कर रही है. उनका अच्छा खासा जीवन बर्बाद कर रही है.
यदि पानी अपनी नाली को ध्यान में रखते हुए बहे तो अपने गंतव्य तक पहुँच जाएगा. और जब उसे नाली के मेंड या नाली की सीमा का ध्यान नहीं रहेगा तो पानी तो इधर उधर बहेगा ही.
आज देखिये. लड़कियां लड़को के वस्त्र धारण कर अपने आप को ज्यादा “एडवांस” समझती है. लडके लड़कियों की तरह लम्बे बाल रख कर अपने आप को ज्यादा सभ्य समझते है. लड़कियां बाल लड़को की तरह कटवाकर अपने आप को ज्यादा पढी लिखी समझती है.
इन पुरातन सामजिक मान मर्यादाओं को धता बता कर तथा उन सीमाओं को तोड़ कर ही क्या सामाजिक उन्नति एवं समरसता या लड़कियों की आज़ादी को परवान चढ़ाया जा सकता है?
चाहे कितना भी हो हल्ला सरकार, समाज सुधारक एवं एवं दार्शनिक कर लें, एक लम्बे अनुभव के बाद स्थापित सामाजिक प्रतिबंधो, सीमाओं, एवं मर्यादाओं को लांघने के बाद समाज, सम्बन्ध, उन्नति एवं आदर्श सदाचार आदि की कल्पना कोरी कल्पना ही होगी. इससे और ज्यादा व्यभिचार, अनाचार, अत्याचार आदि को ही बढ़ावा मिलेगा.
यद्यपि मुझे यह अच्छी तरह ज्ञात है क़ि सबके मन में छिपे हुए ऐसे भाव है क़ि लड़कियों का ऐसा व्यवहार निम्न स्तरीय है. किन्तु थोथे सामजिक स्तर को बनाए रखने के लिए तथा कोई यह न कहे क़ि यह तो पुरातन पंथी है, सब के साथ सुर में सुर मिलाकर हल्ला कर रहे है क़ि लड़कियों के साथ अत्याचार हो रहा है. उनकी आज़ादी छिनी जा रही है. किन्तु जब डरे मन से अपनी लड़की की तरफ देखते है तो यह हो हल्ला गायब हो जाता है. फिर उन्हें नसीहत देना शुरू कर देते है. तथा पूछना शुरू कर देते है क़ि इतनी देर कहाँ थी? क्या कर रही थी? स्कूल छूटे तो इतना देर हो गया? फलाने लडके के साथ क्या कर रही थी?
लड़कियों को आज़ादी देने की तथा उन्हें लड़को की तरह समानता देने की बात करने वाले कौन ऐसे महाशय है जो अपनी जवान लड़की के साथ एक ही बिस्तर पर सोते है? जवान लडके के साथ तो बे हिचक सो सकते है. जवान लड़की के साथ सोने में क्यों हिचकते है? यदि लडके लड़की में में कोई अंतर नहीं है. दोनों को समान अवसर मिलना चाहिए. दोनों के प्रति समान दृष्टि रखनी चाहिए.
यह सब पाखण्ड भरी दार्शनिक बातें किताबो में ही अच्छी लगती है. या फिर चुनावी अखाड़ो में भाषण देने के लिए ही अच्छी लगती है. या फिर महिला आयोग एवं पुरुष आयोग नामक संस्थाओं की दूकान चलाने के लिए ही उपयुक्त है. वास्तविकता से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है.
लड़कियां यदि चाहे तो उनका स्तर लड़को से सदा ही ऊपर रह सकता है. वे आज भी पूज्या है. आज भी नवरात्री के अवसर पर उनके पैरो को धोकर तथा अपने घरो में उनके पैरो के जल को छिड़क कर पवित्र करने की प्रथा कायम रह सकती है. लेकिन यह उनके ऊपर निर्भर है क़ि वे जनक नंदिनी एवं श्री राम की भार्या के रूप में मर्यादित एवं सीमित होकर रावण के द्वारा हर लिए जाने के बाद भी उनकी तरह माता के रूप में प्रतिष्ठित होना चाहती है या खुली आज़ादी पायी एवं स्वच्छंदता पूर्वक किसी भी पर पुरुष को “ब्वाय फ्रेंड” के रूप में स्वीकार करने वाली शूर्पनखा के रूप में तिरस्कार पाना चाहती है जिसने पहले राम को “प्रोपोज” कर फ्रेंड बनाना चाहा. असफल होने पर लक्षम्ण को ‘प्रोपोज’ कर “फ्रेंड” बनाना चाहा. और परिणाम स्वरुप अपनी नाक कटवानी पडा.
मै इसी जागरण मंच पर एक ब्लॉग पढ़ा हूँ जिसे श्री सतीश मित्तल जी ने लिखा है “जिसका काम उसी को साजे. और करे तो जूता बाजे” . क्या यहाँ सटीक नहीं बैठता? एक डाक्टर को दवाओं से ही मतलब रखना चाहिए. यदि वह कानून की धाराओं के चक्कर में पडेगा तो पूरा संविधान ही बदलना पडेगा. जैसा आज के क़ानून निर्मात्री सभा (संसद एवं विधान सभा) के सदस्य करते है. जिन्हें यह तक नहीं मालूम क़ि संविधान किसी पान की दूकान पर मिलाने वाला पान मसाला है या फसलो में डाली जाने वाली खाद.
लड़कियां यदि खुद सुरक्षित एवं सम्मानित रहना नहीं चाहेगी तो कोई दूसरा कुछ नहीं कर सकता सिवाय इसे सियासत की अपनी रोटी पकाने के. उन्हें माता-पिता, समाज एवं परम्परा को अंगीकार करना ही पडेगा. ‘फ्रेंड” के बजाय ‘ब्रदर” बनाना पडेगा. ‘पार्टी” के बजाय ‘पूजा’ एवं धार्मिक कृत्यों में रूचि लेना होगा. “फंसी ड्रेस” के स्थान पर परम्परागत वस्त्र धारण करना पडेगा. और आचरण लड़को की तरह नहीं बल्कि लड़कियों की तरह करना होगा. केवल लड़को को दोष देने से ‘”आज़ादी” एवं उन्नति नहीं मिल सकती.
पाठक

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