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वृद्धावस्था : एक वरदान!!

Posted On: 14 Nov, 2012 Others में

सपाटबयानीमेरे विचार - प्रतिक्रिया

pitamberthakwani

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आज हर व्यक्ति इस बढ़ती उम्र की वास्तविकता से परिचित है! और यह स्थिति कैसे भी आपको कोई भी छूट नहीं दे सकती! हम जानते है की इस पड़ाव तक पहुंचते -पहुंचते हमारा कितना न अनुभव हो जाता है?, हर क्षेत्र में! हम बहुत ही अनुभवी कहलाते है यह हमारा इल्म है और यही हमारा खजाना है! जिसे कोई माहिर से माहिर चोर भी चुरा नहीं सकता! हमें बेकार में लगता है की हमारे इस अनमोल खजाने का कोई लाभ नहीं लेता, अरे नहीं लेता है तो न सही! हम अपनी इस धरोहर के साथ खुश रहे,यही अपने को खुश रखने का तरीका है!
याद रहे की घर में सबसे ज्यादा बच्चे ही आपको प्यार करते है, क्यूंकि उन्हें किसी तरह की समझ नहीं होती,अपने पापा/डैडी और मम्मी से भी आप को ज्यादा प्यार करते है, आप न तो उन्हें डांटते है और ना ही पीटते है! क्या यह बेटे के पारिवार में रहने का इनाम नहीं है?
अपने बेटे बहुओं के साथ रहकर जो आनंद है उसका तो कोई जवाब ही नहीं है! इनके साथ भी हमें अपने को उनके अनुसार हे ढालने का प्रयास करना होगा! उनके किसी काम में दखल न दे,और न ही उनके किसी कार्य में कोई कमी निकाल कर उन्हें व्यथित करें, बस आप को सभी पसंद करेंगे! इसके अलावा ‘नोन, मौन और कौन’ वाले सिद्धांत को अपना कर आप खुश रह सकते हैं!
लोग कहते है की जवानी के समय से ही वर्जिस करके फिट रहने की कोशिश करते रहो, पर देखा गया है की यह सही होकर भी अपने हाथ में नहीं है! वर्जिसी पहलवान भी एक आयु के बाद धराशाही हो जाते है! हम बस इतना चाहते है की बड़ी आयु में अपने से ही सब कुछ कर सके और चलते- फिरते किसी की मोहताजी न रहे! अपनी इच्छाए कम करते हुए, बच्चों के कार्यों में बाधां न डालते हुने घर में रहे! आपका सम्मान बना रहेगा!
मौत तो अवश्यम्भावी है उससे डर कैसा? हालांकि मैं यह बात कर तो गया पर मुझे भी डर तो लगता ही है! इसे कम करने के लिए हमें अपने जीवन में मोह को कम करते-करते निर्मोही बनना होगा जो की अतिं कठिन कार्य है, यही डर के कारणों में से एक कारण है! और जो जितना धनी होगा वह उतना ही मौत से ज्यादा डरेगा! इसका मतलब यह नहीं है की गरीब जिसके पास खाने को नहीं है, वह मौत से नहीं डरता ?,मौत से तो सभी डरते है, मरना क्या कोई चाहेगा? नहीं मरना कोई नहीं चाहेगा! इस दुनिया में वह भाग्यशाली है जो अंतिम आयु तक ठीक-ठाक रहते है, इसके लिए जरूरी और कठिन कार्य करना होगा, वह है की अपना चटोरापन त्यागकर संयम से रहें, खान-पान का विशेष ध्यान रखना ही स्वस्थ रहने का मूल मन्त्र है! बीमार होकर आप न तो कोई काम कर सकते है और वरदान के रूप मे प्राप्त अपने अनुभव की सम्पति को किसी के साथ शेयर नहीं कर सकते! स्वस्थ रहने पर आप किसी पर बोझ भी नहीं होते!
यह बात भले ही हमारे बस में है नहीं, पर जहा तक हो सके हम इस दिशा में प्रयास करें! तो सत्य से मुख न मोड़ते हुए अपनी इस ‘थाती’ के साथ इसे वरदान मान कर चले! खुश रहने का इसके अलावा और कोई रास्ता है ही नहीं! बाकी तो आप इस बात में विश्वास ही रखें की—-
“होई वही जो राम रच राखा”

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