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तथाकथित संतो के पंडालों की भीड़ :एक व्यंग्य विचार

Posted On: 11 Nov, 2012 Others में

सपाटबयानीमेरे विचार - प्रतिक्रिया

pitamberthakwani

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आजकल क्या यह व्यापार फायदे का नही है की गेरुए वस्त्र या फिर भक सफ़ेद वस्त्र पहनो और प्रवचन देने का काम शरू कर दो! ‘हिंग लगे न फिटकरी रंग चोखा आये!’और कमाए धन से आने वाली ३-४ पीढीया बिना किसी काम किये आनंद से रहेंगी! उनका भविष्य ही सुधर जाएगा! टी वी चैनलों पर इन प्रवाचको की भीड़ जो हम देखते है या दिखाई देती है, क्या वास्तव में ही होती है या की यह कैमराओं का कमाल है? हर संत और प्रवाचको के पडालों में इतनी भीड़ देखकर हैरानी होती है की इतने सारे चेले?,या कहे इतने सारे बेवकूफ? क्या न आमदनी होती होगी? फिर इतने अनुयायी और शिष्य हो तो आपको किसी काम के लिए कहीं जाने की न तो जरूरत है और न ही कुछ करने की!
अब आप यदि चुनाव भी लड़ने का मन बनाते है तो आप की जीत भी होगी ही, ,कारण की आप को कुछ करना नहीं है ,आपके चेले ही सब करते रहेंगे! आप झूठ पाल महाराज बन कर प्रवचन भी करते रहे और एम्. पी बन गए तो अपने क्षेत्र की विकास- राशि से अपना विकास कर सकते है! और तो और आप अपने बेटे की शादी में एक करोड़ खर्च कर बड़े-बड़े लोगो से सम्बन्ध बना कर फिर अगले चुनाव के लिए अपनी टिकट बुक करा सकते है!
आप दादा कामदेव बनकर दवाईया बेचकर लाभ कमाते रहे और भोग- गुरु बनकर योग भी सिखाने का नाटक करते रहे! बड़े-बड़े नेता आपके पैर छूकर आशीर्वाद लेंगे! ताकि आप उनकी आलोचना न कर सकें!! क्या न मजा है इस व्यवसाय में?
अब कहाँ तक कहें, आप श्री श्री शशि शंकर बन कर आप ‘आर्ट आफ मेकिंग फूल’ का नारा देकर अपना उल्लू सीधा कर सकते है! भ्रान्तिकारी जैन मुनि करुण महासागर बन कर लोगो को अपनी तुकबंदी वाली भाषा से मोहित कर डराते रहे, ताकि आपको कोई चैलेन्ज न कर सके! इस कार्य में आपको केवल मिडिल तक की शिक्षा ही चाहीये! जब आपका सिक्का चल उठेगा तो मजाल हैकि आप पर कोई उंगली भी उठा सके? सभी जैनी लोग आपको बचाने के लिए जो तैयार हो जायेंगे! है न मजा इस व्यवसाय का?
आप को कोई भी कुछ कह ही नहीं सकता, यदि बाबू निरासाराम बन कर अपने प्रदेश के मुख्य मंत्री को धमका भी सकते है और आप किसी भी पत्रकार को सरे आम थप्पड़ भी मार सकते है चाहे आप के आश्रम से बच्चो के कंकाल ही क्यों न निकले हो? कहने का मतलब यह है की आप इन गेरुओ और भक सफ़ेद कपड़ो की आड़ में चाहे काले कारनामे क्यों न करते रहें? इतने बड़े रुतवे के साथ-साथ तमाम आश्रमों की जमीन के स्वामी और काला धन, जिस पर कोई आयकर भी दिया नहीं होता है! सब का सब आप अकेले का! और आश्रमों के नीचे अपनी चेलीयो के संग रासलीला करके करेक्टर ढीला भी होने से बचे रह सकते है,यदि आप प्रवाचक बन जाते है तो , बस जरूरत है आपको चोला बदने की!
गुरु माँ दुखी मूर्ति और कुधान्शु जी महाराज बन कर अपनी लटों को लटकाते हुए आ जाये मंच पर और प्रवचन के समय ऐसे गंभीर बन जाए जैसे किआपका पूरा ध्यान ही परमपिता परमेशवर की ओर ही है और हो जाईये शुरू! बस मजा ही मजा है! बच्चों को विदेशो में पढ़ाईये, आप महंगी कारो में घूमीये, सोने की चैन और हीरो वाली घडिया पहन कर लोगो को बनाईये उल्लू,, वह भी बिना किसी मेहनत के? और क्या चाहिये आपको? बस थोड़ा अमल जी महाराज की तरह आपको कुछ ऐसा करना होगा की लोग खुद ही कही भी रह कर आपके खातों में पुशपम पत्रं जमा कराते रहे! बस आपको अपने बैंक के खाते का नम्बर देना भर होगा यहाँ पर तो भाषण भी नहीं देना है, केवल चतुराई से हाथ घुमाकार कभी कुच्छ और कभी कुच्छ हवा में लहराते हुए निकाल कर दिखाने भर का नाटक करना होगा,जो की आप कर ही पाएंगे! तो मेरी मानिए और इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाईये और अपने पडालो की भीड़ देखकर क्या ना फूले समायेंगे आप!

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