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मानव 'मन-1' और उसके स्वरुप का 'मन-2' !

Posted On: 15 Nov, 2012 Others में

सपाटबयानीमेरे विचार - प्रतिक्रिया

pitamberthakwani

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हम सब इस बात से वाकिफ है कि नहीं, पर हर वो व्यक्ति जो संवेदनशील है,थोड़ा बहुत और भी कुछ सोचता है , इस बात से भली-भाति वाकिफ होगा कि मानव मन के भीतर एक और मन भी होता है! एक ‘मानव’ मन और एक उसके ‘स्वरुप’ का मन! यहाँ सुविधा के लिए मानव के मन को ‘मन-१’ और उसके स्वरुप के मन को ‘मन-२’ का नाम दे रहा हूँ! जब वह मानव के स्वरुप में होता है तब वह ‘मन-१’ के अनुसार ,और जब वह किसी अन्य स्वरूप के रूप में होता है, तब वह उस स्वरुप के ‘मन-२’ के अनुसार आचरण करता है! उसी मन के अनुसार वह परिवर्तित हालात में अपने स्वरूप के अनुसार व्यवहार करता है! कहने का अर्थ यह है कि वह अपने स्वरुप से कभी भी धोखा नहीं करता ! यही तो मानव को कुदरत की अनुपम देन है! यह उसके बस में भी नहीं रहता? वह चाह कर भी उस मन से गद्दारी नहीं कर सकता, जिस मन का स्वरुप लिए हुए होता है!
इस बात को समझाने के लिए एक उद्धाहरण देकर समझाना चाहूँगा! मान ले की आप एक नौकरी करते है और उसमे आप अपने कार्य को जैसे भी चाहते है कर रहे है और करते-करते आप एक नौकर के कर्तव्य का पालन जैसे भी है ,कर रहे है! यहाँ आपके नौकर के रूप में आपका एक ‘मन-१’ है! और जब कभी आपको समाज में कोई अन्य भूमिका निभानी पड़ जाए तो आप उसे भी निभाते है! जैसे आपको समाज में किसी झगड़े को निपटाने के काम के लिए नियुक्त किया जाता है तो आप मुखिया या निर्णायक की भूमिका में आ जाते है, तब आपका स्वरुप निर्णायक वाला हो जाता है,और आपका वही ‘मन-१’ इस स्वरुप के साथ बदलकर मुखिया/निर्णायक वाला ‘मन-२’ बन जाता है! याद रहे आप वही आदमी/मानव है! क्योंकि आप अब दूसरे स्वरुप में आ गए है इसलिए आप निर्णायक के रूप में अपना धर्म निभाते समय न्याय पर ही ध्यान केन्द्रित करेंगे,आप किसी प्रकार का पक्षपात नहीं करेंगे, क्योंकि ऐसा करने को आपका दूसरा ‘मन-२’ इसकी अनुमति नहीं दे सकता! और यदि आप ऐसा करते भी है तो आप अपने निर्णायक वाली भूमिका से न्याय नहीं कर पाते है, ऐसी अवस्था में भविष्य में कोई भी निर्णायक पर विश्वास ही नहीं करेगा! आपका प्रयास होगा की किसी प्रकार की गलती न हो न्याय करने में! यही अर्थ है, मानव मन के भीतर एक और मन के होने का !
एक और उद्धाहरण– एक आदमी जो डाक्टर है अपने दुशमन के इलाज पर भी दुश्मनी नहीं कर सकता! क्योंकि उसके ‘मन-१’ से मरीज की दुशमनी है, अब जब की वही डाक्टरके रूप में जब ‘मन-२’ वाला हो जाता है! तो उसके लिए वही दुश्मन न होकर मरीज होता है और तब डाक्टर का ‘मन-२’ यदि ऐसा करेगा तो उसका यह ‘मन-२’ उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं देगा और कभी नहीं देगा! क्योंकि ऐसा करने से समाज मे डाक्टरों से विश्वास ही उठ जाएगा!
अंत में पता नही क्यों मै चाहता हूँ की आप ब्लोगर्स मेरी यह बात समझे और जीवन के परम आनंद को भोगे! यदि इस बात और विचार को मै आप तक नहीं पहुंचा सका तो मेरा पूरा परिश्रम ही व्यर्थ जाएगा!अतः आपसे निवेदन करते हुए अनुरोध है की इसे दो-तीन और चार बार पढ़कर, समझे और जीवन में उतारे! फिर भी कोई दिक्कत हो तो डाक्टर राजेंदर यादव जी की कहानी ‘कलाकार’ पढ़े और जरूर पढ़े! यह बहुत ही सुकून देगी!

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