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"बाबा जी का जीवन"...................१.

Posted On: 9 Jun, 2014 Others में

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pkdubey

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प्रत्येक इंसान यही चाहता है -उसकी अगली पीढ़ी सुखी और खुशी रहे. शायद चोर ,डकैत भी यही चाहता उसका लड़का मंत्री बने.पर चाहने से कुछ नहीं होता.कर्मो का लेखा -जोखा बहुत अमिट है. भीष्मपितामह महाभारत में शर शैया पर लेटे हुए थे,तो प्रभु से प्रश्न कर दिया- मुझे अपने पिछले १०० जन्म याद हैं,मैंने ऐसा कोई पाप नहीं किया,तो फिर मुझे ऐसा दंड किसलिए मिला. प्रभु ने कहा -मेरी कृपा से और ७ पिछले जन्मों को देखो,तब देखने से ज्ञात हुआ, एक जन्म में एक दुमुँही को मारकर कटीली झाड़ियों में फ़ेंक दिया था.यह उसी का प्रतिफल था.
पर आजकल ये सब कौन मानता.हम बहुत एडवांस हो गए.
आजकल हर घर में महाभारत चल रहा है -सगे भाइयों में कलह बढ़ती जा रही है,एक दूसरे की जान लेने की भी नौबत आ जाती है. हमारे बाबा जी दो भाई और दो बहन थे,एक बहन जी ख़त्म हो चुकी.उनके पिता जी का स्वर्गवास ४० वर्ष की उम्र में हो गया था,छोटे बाबा(बाबा जी के भाई ) जब २- ३ साल के थे. मरते वक्त मेरे परदादी ने अपने पति से कहा,तुम तो बीच में छोड़कर जा रहे, ये बच्चे कैसे पलेंगे. हमारे परबाबा ने अपने छोटे भाई श्री जोरावर दुबे की तरफ इशारा कर के कहा,यही पार लगा देंगे.इन्ही का भरोसा है अब. श्री जोरावर दुबे जी(बूढ़े बाबा ) ने मसौदा शुगर मील(पहले ठठिया(बिल्हौर ,कानपुर),फिर फैज़ाबाद में नौकरी की,और अपने भाई के परिवार को पाला.पहले लोग नौकरी को इतना महत्त्व नहीं देते थे,खेती -व्यापार को अच्छा मानते थे.और कुछ भाई के अंतिम शब्द ,इसलिए बूढ़े बाबा ने शादी भी नहीं की. बाबा जी बचपन से ही गंभीर और शांत हो गए,परिस्थितियां इंसान को समय से पहले काबिल बना देती हैं. बाबा जी का बचपन ननिहाल( ग्राम -नूरपुर,पोस्ट -कैथावा,जनपद -औरैया) में बीता,मामा जी (श्री तेजराम तिवारी) ने पढाया.फिर highscool फ़ैजाबाद से किया. उस वक्त नौकरी आराम से मिल जाती थी.स्कूल में अध्यापक वगैरह हो सकते थे,लेकिन कोई बताने वाला ही नहीं था -नौकरी करोगे तो क्या होगा,नहीं करोगे तो क्या.दादी जी कहती- कहीं नौकरी कर लो.किसी स्कूल में पढ़ाने लगो,तो कहते हम दूसरे की तावेदारी नहीं करेंगे,अपने खेत में काम करेंगे.दोनों भाइयों और परिवार में अच्छा स्नेह था. पर जब परिवार बढ़ता है,तब अपना -पराया होने लगता है.बाबा जी कहते मुझे कभी यह नहीं लगता था कि-राजबहादुर (छोटे भाई ) और हमारा बटवारा भी होगा.पर बटवारे कि नौबत तब आयी,जब दोनों लोगो के नाती हो गए. अभी भी दोनों लोग खाली समय में पास -पास बैठते,अपनी बात-चीत करते.एक अच्छा आदर्श है उनका जीवन हमारे लिए और इसीलिये लिख भी रहा हूँ ताकि अगली पीढ़ियों को भी कुछ सीख मिले.

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