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"हमारी मनोवृत्ति और हमारे धर्मशास्त्र"

Posted On: 16 Jun, 2014 Others में

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pkdubey

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महाभारत की एक सूक्ति -धर्मः मतिभ्यः उद्ग्रथः-धर्म की उत्पत्ति मति से हुयी.हमारी बुद्धि,शाश्त्र के प्रत्येक शब्द से सहमत नहीं होती. कुछ लोग तो शाश्त्र पर विश्वास ही नहीं करते. अलग -अलग धर्मग्रन्थ अलग -अलग मत प्रतिपादित करते हैं. देवीभागवत पढ़ो ,तो देवी ही सर्वोपरि है.श्री मद्भागवत में, श्री कृष्ण सर्वोपरि हैं.रामायण और रामचरितमानस में राम ही सर्वोपरि,राम में करोड़ों दुर्गा की शक्ति है. ऐसे ही शिवपुराण ,विष्णुपुराण ,ब्रह्म पुराण आदि सभी में अपने इष्ट की महत्ता प्रतिपादित है.
मेरा यह मानना है- यदि आप श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की जीवनी पढ़ रहे हैं ,तो श्री मनमोहन सिंह जी के बारे में एक शब्द भी नहीं पा सकते हैं,या हो सकता है कही पर श्री मनमोहन सिंह जी की भी चर्चा थोड़ी -बहुत आयी हो ,यदि उस सरकार के अंतर्गत कुछ कार्य किया हो.वैसे ही यह धर्म शाश्त्र हैं ,इन पर तर्क -वितर्क करना अनुचित है ,कुतर्क तो कदापि नहीं.
हमारे बाबा जी भगवान के बारे में दो भिन्न इंसान से दो प्रकार से बात करते हैं,ऐसा मैंने एक बार सुना.वो कहते- “जैसी वीमारी ,वैसा इलाज चाहिए”. एक बार एक इंसान से कहा -करता तो सब भगवान ही है,इंसान तो मात्र बहाना है. दूसरा इंसान कुछ दिन बाद मिला तो कहा -इंसान ही सब कुछ करता है ,पर यह कहने में कोई खर्च अथवा हर्ज नहीं है कि -सब कुछ भगवान की कृपा से ही हो रहा है.
हमारे राष्ट्र में एक मनीषी चिंतन है ,उसमे धर्म शाश्त्र में वर्णित सभी पात्रों को इंसान के मनोभावों से जोड़कर दिखाया जाता है. जैसे -राम ,ज्ञान है,लक्ष्मण-वैराग्य,सीता -भक्ति,हनुमान -ब्रह्मचर्य आदि -आदि. ऐसी ही श्री मद्भागवत में धृतराष्ट्र-मानसिक दिवालियापन है,गान्धारी- जानते और देखते हुए भी अनजान बनकर रहना है,दुर्योधन -अधार्मिकता है ,अर्जुन -पराक्रम,युधिष्ठिर-सत्य आदि.
रामचरितमानस में बाबा तुलसी ने लिखा –
सम प्रकाश तम पाँख दुहु,नाम भेद बिधि कीन्ह,
शशि शोषक पोषक समझ ,जग जस अपजस दीन्ह..
अर्थ -दोनों पक्षों(शुक्ल और कृष्ण ) में चन्द्रमा समान प्रकाश करता है,एक में रात्रि प्रारम्भ होते ही और दूसरे में रात्रि समापन होने की ओर. लेकिन एक में चन्द्र घटता है और दूसरे में बढ़ता है. घटने ,बढ़ने के अनुसार संसार ने कृष्ण और शुक्ल पक्ष नाम और यश -अपयश चन्द्र को दिया.
इंग्लिश में एक कहावत भी है –
EVERY SAINT HAD A PAST AND EVERY SINNER HAS A FUTURE.
अर्थ -प्रत्येक संत का कुछ भूत है और प्रत्येक पापी का एक भविष्य है. तात्पर्य -संत से भी अपने विगत जीवन में अनेक गलतियां हुयी होंगी और पापी भी अपना भविष्य सुधार सकता है, यदि वह चाहे तो.
हमारे बाबा जी कहते -साधू बनने के लिए तो बहुत अधिक शिक्षा चाहिए,अनपढ़ इंसान,साधू शब्द को भी दूषित कर सकता है.
अतः हमें ,अपनी मनोवृत्तियों को राम और युधिष्ठिर की ओर उन्मुख रखना चाहिए,न कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन की ओर………………………………………………
विश्व का कल्याण हो ,प्राणियों में सद्भावना हो. इसी मंगल कामना के साथ,आप सब का शुभकाँक्षी -प्रवीण कुमार दुबे.

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