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हम किस ओर जा रहे हैं ?

Posted On: 28 Mar, 2014 Others में

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pkdubey

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आज हमारे देश में ही नहीं ,अपितु पूरे विश्व में बहुत ज्वलंत मुद्दे हैं .लेकिन हम पूरा विस्व तो एकदम सुधार नहीं सकते ,पूरा देश भी नहीं .शायद एक गॉँव या एक परिवार भी नहीं क्योकि सब अपनी धुन में मस्त हैं ,कौन किसकी सुनता हैं .बेटा बाप कि नहीं सुनता ,तो बाप बेटे की भी नहीं .बेटी माँ कि नहीं सुनती ,तो माँ बेटी की भी नहीं .भाई ,भाई की नहीं सुनना चाहता. कोई किसी की सुनने के लिए नहीं ,सब अपने मन की करने के लिए पैदा हुए हैं .सही भी है -शायद यही सच्ची आज़ादी का पूर्ण अर्थ हो .परन्तु हम विचार तो कर सकते हैं -क्या सही ,क्या गलत.विचार करने से हमारी आज़ादी भंग नहीं होगी और हमारा बौद्धिक विकास भी होगा .
मैंने भी कुछ विचार किया.अपने आसपास के समाज में घटती घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शी बनकर हमारे मन में कुछ विचार उठे .विचार प्रस्तुत हैं –
१).हमारे देश में बहुत से लोग सुबह उठकर समाचार पत्र पढ़ते हैं – मुख्य पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक एक- दो अच्छी ख़बरों के अलावा हम करप्शन ,हत्या,बलात्कार ,दहेज़ हत्या ,पारिवारिक कलह से हत्या इत्यादि अनेक समाचार अपने मन में भर लेते हैं .(बड़े शहरों में तो ५० से १०० पृष्ठों तक के समाचार पत्र वितरित किये जाते हैं ).
क्या यह सम्भव है कि हमें नित्य एक “ज्ञान पत्र ” मिले ,जिसके प्रथम पृष्ठ पर -अध्यात्म हो ,द्वित्य पृष्ठ पर-धर्मं ,त्रितय पर -कर्म ,चतुर्थ पर -समाज ,पंचम पर-विज्ञानं ,छठे पर- कला आदि-आदि .ताकि इस देश में सद्विचार फूले -फलें.आत्म उत्थान का मार्ग प्रशस्त हो .
२).इस देश के मंदिरों(अन्य धार्मिक संस्थाओं में भी ,अपने -अपने धर्मं के आधार पर अन्य नामों से परिचय पाने वाले ) में पुजारी हैं -जिनका पेट ५ से १० इंच तक बाहर निकला है और बाहर भिखारी हैं -जिनमे किसा का हाथ टूटा,किसी के पैर नहीं ,तो कोई नेत्र विहीन ,कोई अपने दो-चार बच्चे लेकर बैठा हुआ है. इस देश का भगवान् अमीर है और जनता गरीब .जो पत्र ,पुष्प ,फल और जल से पूर्ण संतुष्ट हो सकता है -उसके पास लाखों-करोङ का भंडार है .जिसे हमने दीन दयाल,दीन बंधू ,गरीब नवाज़ ,दरिद्र नारायण कहा उसके दरबार में भूख -प्यास से तड़पते लोग पड़े रहते हैं .और उसके बगल में एक या दो- चार पुजारी खड़े रहते हैं .पुजारी होना बुरी बात नहीं.मेरे दादे -परदादे भी पुजारी थे .मैं भी पुजारी बनना चाहता हूँ ,पर मानवता का पुजारी ,दीन -दुखियों का पुजारी .भगवान् के मूर्ती के पास एकत्रित पैसों को गरीबों के उत्थान के लिए उपयोग में लाया जाये .
हद तो तब हो गयी ,जब एक बार मैंने एक मंदिर में एक पुजारी को दिन के २-३ बजे के करीब एक छोटी सी कन्या के प्रसाद मांगने पर भी देने से मना करते हुए देखा .पुजारी जी बोले शाम को मिलेगा ,आरती के बाद और मंदिर के गर्भगृह में भगवान् के पास नारियल, मिष्ठान्न समुचित मात्रा में एकत्रित था.
३).हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया -सत्य नारायण कि कथा करवाओ या कोई दूसरा पूजा पाठ हो ,यज्ञ करो तो उसके अवशिष्ठ-फूल ,विभूति इत्यादि को किसी शुभ दिन बहते जल में प्रवाहित कर दो.
हम साथ में दो -चार पॉलिथीन भी वरुण देवता को समर्पित कर देते हैं .भगवान् खुश हुए या नहीं ये तो मैं नहीं कह सकता ,पर जल चार पॉलिथीन से दूषित अवश्य हुआ.लेकिन हमें क्या -हम तो आजकल मिनरल वाटर कि ओर अग्रसर हैं .इस देश के कथाकारों,प्रवचन कारों को चाहिए कि वो भगवान् के साथ-साथ प्रदूषण पर भी व्याख्यान दे .जल देवता का भी हम सब ध्यान रखें. तभी हमारा भविष्य अच्छा हो सकता है. नहीं तो तरस जाओगे एक- एक बूँद पानी के लिए.बिन पानी सब सून ………………………………………………………..

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