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मैं सस्यहीन बीहड़ धरती आ प्रेम सुधा बरसा जाओ ....

Posted On: 16 Aug, 2014 Others में

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विनय राज मिश्र 'कविराज'

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मैं सस्यहीन बीहड़ धरती
आ प्रेम सुधा बरसा जाओ .
ये भींगी आँख उनीदी हैं
गा लोरी मधुर सुला जाओ .
क्षत हुवा जुदाई से इतना
अब करीब तुम आ जाओ .
विरह वेदना से ये तन
अब हुवा सूखकर ज्यों काँटा
अब बहुत हुयी देखा-देखी
बस बाँहों में तुम आ जाओ .
उर-व्योम में केवल नीरवता है
आ अधरों के विहग उड़ा जाओ .
तुम बिन हुवा मैं प्राणरहित
आ मुझमे सांसे भर जाओ .
जीवन में तन्हा चलते-चलते
अब मैं हुवा निढ़ाल प्रिये.
आ जाओ नर्म हाथों से
मुझको तुम सहला जाओ .
मैं तेरे तन-मन का
सबसे बड़ा लुटेरा हूँ.
आजीवन कैद रहूँ तुझ संग
कुछ ऐसी दफ़ा लगा जाओ .
मैं सस्यहीन बीहड़ धरती
आ प्रेम सुधा बरसा जाओ .

विनय राज मिश्र ‘कविराज’

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