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वो आवारगी इश्क़-ए-हुजूर थी...

Posted On: 11 Mar, 2015 Others में

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विनय राज मिश्र 'कविराज'

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वो आवारगी इश्क़-ए-हुजूर थी |
मैं था ही एक पागल वो बेकसूर थी ||
तन्हा रहूँ मैं कैसे वो कितनी दूर थी ?
दिल के हर एक कोने में वो हुजूर थी ||
मैंने ही कम पी थी मादक हुजूर थी |
कोई सुरा-ए-जाम नहीं वो एक शुरूर थी ||
होती न इश्क़ की कोई बात आधी आधी ये ख्वाहिश जरूर थी |
मैं ही ठहरा रहा था एक प्यासा, वो निर्झरणी मेरे हुजूर थी |
मैं ही निकला कोई कंकड़ ये हकीकत ज़रूर थी |
उसने समझा मुझे मनका वो खुद कोहिनूर थी ||
अभी थामा न था कि आँचल ये हशरत हुजूर थी |
खुद सौंपा था उसने मुझको वो एक मीठी शरारत जरूर थी ||
लगे जिसे पाकर मौत भी ज़िन्दगी वो ज़न्नत की हूर थी |
मेरा रब ही मुझसे था रूठा वो क़यामत हुजूर थी ||
बोल दे आज भी कोई शख्स बेमाफ़िक उसके, वो बेकसूर थी |
मैं जिन्दा हूँ जिसकी धड़कनों की धुन सुन के, वो मेरा गुरूर, मेरी हुजूर थी ||
अब भी रहता है एक स्पन्दन उसका लबों पे मेरे, दिल-ए-राहत ज़रूर थी |
मैं उसका हूँ परिंदा ‘विनय’ उसकी बाहें मेरी अनन्त दिशायें हुजूर थी ||

रचनाकार- विनय राज मिश्र ‘कविराज’

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