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ऐ भाई, क्यूँ गुस्सा दिलाते हो दुलरुआ दामाद को!

Posted On: 3 Nov, 2014 Politics में

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हमारे घर में जन्म से ही बेटी को महत्तवपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है. ‘घर की इज्जत’, ‘मर्यादा’ और ‘शान’ आदि आदि शब्दों से ही घर में उसके स्थान और अहमियत का पता चल जाता है. शादी के बाद तो बेटी का सम्मान और भी बढ़ जाता है और निस्संदेह इससे भी अधिक सम्मान दामाद को दिया जाता रहा है!


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बात तब की है जब ‘भारत निर्माण’ नहीं हुआ था. गाँवों में शौचालय नहीं होने के कारण लोग खेतों या बाँसों के झुरमुट में शौच के लिए जाते थे. नए-नवेले दामाद के पास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं होता था. लेकिन हमारी परंपरा में दामाद अतिथि समझे जाते रहा है इसलिए उसके साले ससुराल के खेतों में भी उन्हें शाही अनुभव कराने को पाँव टिकाये रहते थे. शौच के लिए जाते वक्त दामाद का पानी भरा लोटा साला अपने साथ रखता था और शौच से निवृत्त होने के बाद वो लोटा फिर से दामाद के शौच से निवृत्त होने का इंतज़ार कर रहे साले के हाथों में आ जाता था.


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पर अब लगता है कि इस परंपरा पर कीचड़ उछाला जा रहा है. इसे समझने के लिए आप हाल में ही हुई एक ‘मीडिया हो-हल्ला’ का उदाहरण ले सकते हैं. विधर्मियों ने अब हमारे राष्ट्रीय दामाद पर भी कीचड़ फेंक दिया. कीचड़ भी ऐसा कि स्वच्छ भारत अभियान भी उसका कुछ ना बिगाड़ सके.


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माना कि वो कीचड़ उन्हीं के खेत का था. यह भी मान लिया कि प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की बात को अनसुना करते हुए उन्होंने अपनी खेत साफ नहीं करवाई. लेकिन ऐसा थोड़ी होता है. उस पत्रकार को भी समझना चाहिए कि इतने सारे खेत साफ करवाने में समय और पैसा लगता है. वो भी तब जब पूरी खेत कोई प्रतिद्वंदी बड़ी तेजी से चुगता जा रहा हो. अब जब अपनी खेत खिसकती जा रही हो तो भला गुस्सा किसे नहीं आएगा! वो ठहरे दामाद, वो भी राष्ट्रीय! लाज़िमी है, गुस्सा तो आएगा ही जब सालों से अपूछ उस खेत के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई लगातार सवाल पूछे जा रहा हो!


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लेकिन, ये मीडिया वाले कहाँ समझते किसी की स्थिति, किसी के मन की वेदना को! इन्हें तो चाहिए बस…..


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