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Bipin Chandra Pal - बंगाल पुनर्जागरण के मुख्य वास्तुकार बिपिन चंद्र पाल

Posted On: 2 Dec, 2011 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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bipin chandra palबिपिन चंद्र पाल का जीवन परिचय

भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रतिष्ठित नेता और बंगाल पुनर्जागरण के मुख्य वास्तुकार बिपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर, 1858 को आज के बांग्लादेश में हुआ था. संपन्न हिंदू वैष्णव परिवार से संबंधित बिपिन चंद्र पाल एक राष्ट्रभक्त होने के साथ-साथ एक उत्कृष्ट वक्ता, लेखक और आलोचक भी थे.  बिपिन चंद्र पाल के पिता एक पारसी विद्वान थे. बहुत छोटी आयु में ही बिपिन चंद्र पाल ब्रह्म समाज के सदस्य बन गए थे. ब्रह्म समाज के अन्य सदस्यों की तरह बिपिन चंद्र पाल भी सामाजिक बुराइयों और रुढ़िवादी मानसिकता का विरोध करने लगे थे. चौदह वर्ष की आयु में ही बिपिन चंद्र पाल जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव के विरुद्ध अपनी आवाज उठाने लगे थे. कुछ ही समय बाद उन्होंने अपने से ऊंची जाति वाली विधवा से विवाह संपन्न किया, जिसके कारण उन्हें अपने परिवार से अलग होना पड़ा. बिपिन चंद्र पाल के पुत्र बंबई टॉकीज के संस्थापकों में से एक थे.


बिपिन चंद्र पाल का कॅरियर

महात्मा गांधी के राजनीति में आने से पहले वर्ष 1905 में लाल बाल पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) पहला ऐसा क्रांतिकारी गुट था जिसने बंगाल विभाजन के समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उपद्रव छेड़ा था. वर्ष 1907 में जब बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए गए उस समय बिपिन चंद्र पाल भी इंग्लैंड चले गए और वहां जाकर इंडिया हाउस के साथ जुड़ गए तथा स्वराज नामक पत्रिका की स्थापना की. मदनलाल ढींगरा ने जब कर्जन वायली की हत्या की तब स्वराज के प्रकाशन पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया जिसकी वजह से बिपिन चंद्र पाल को मानसिक और आर्थिक रूप से काफी नुकसान पहुंचा. इस घटना के बाद कुछ समय के लिए उन्होंने अपने उग्रवादी और राष्ट्रवादी क्रियाकलापों को विराम दे दिया. उन्होंने मनुष्य के सामाजिक और मानसिक विकास के प्रति ध्यान देना शुरू किया. बिपिन चंद्र पाल का सोचना था कि विभिन्न राष्ट्रों में एक-दूसरे के प्रति सद्भावना का विकास तभी संभव है जब लोगों में सामाजिक विकास को बल दिया जाए. बिपिन चंद्र पाल पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गांधी और गांधी धर्म पर गहरी चोट की थी. प्रारंभ से ही बिपिन चंद्र पाल महात्मा गांधी के प्रति विरोध जाहिर करते रहे थे. वर्ष 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सम्मेलन में उन्होंने यह कहकर अपना विरोध सार्वजनिक किया कि महात्मा गांधी के विचार तार्किक ना होकर जादू पर आधारित हैं. बिपिन चंद्र पाल गांधी जी के घोर विरोधी थे. उन्होंने गांधी जी को संबोधित करते हुए कहा भी था कि आप सिर्फ जादू पर भरोसा करते हैं इसीलिए तर्क आपको समझ नहीं आते. जनता के मस्तिष्क में आप फिजूल की बातें भर देते हैं तभी वह हकीकत और तर्कों को सहन नहीं कर पाती. आप मंत्रों पर विचार करते हैं लेकिन मैं कोई साधु नहीं हूं इसीलिए ऐसा कुछ नहीं दे सकता. जब मैं पूरे सच को जानता हूं तो उसे आधा-अधूरा बताकर जन मानस को भटकाता नहीं हूं. लीयो टॉल्सटॉय से गांधी जी की तुलना करते हुए बिपिन चंद्र पाल का कहना था कि टॉल्स्टॉय एक ईमानदार अराजक दार्शनिक थे, जबकि गांधी जी एक कैथोलिक अनियंत्रित शासक के रूप में कार्य कर रहे हैं.


बिपिन चंद्र पाल का निधन

20 मई 1932 को बिपिन चंद्र पाल का निधन हो गया.


लाल बाल पाल की तिकड़ी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मौलिक विरोध प्रदर्शन किया. अंग्रेजी कपड़ा और उनके द्वारा बनाई गई वस्तुओं का दहन और बहिष्कार करना उनकी मुख्य गतिविधियां थीं. इसके अलावा फैक्ट्रियों में तालाबंदी और हड़ताल के द्वारा भी उन्होंने ब्रिटिश व्यवसाय को नुकसान पहुंचाने जैसे सफल प्रयास किए थे. बिपिन चंद्र पाल कई प्रतिष्ठित और चर्चित बंगाली नेताओं के संपर्क में आए. ब्रह्म समाज में रहते हुए बिपिन चंद्र पाल केशव चंद्र और सिबनाथ शास्त्री के बेहद करीबी बन गए थे.


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