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वो 3 गोलियां जिसने पूरे देश को रूला दिया, बापू की मौत के बाद ऐसा था देश का हाल

Posted On: 2 Oct, 2018 Politics में

Pratima Jaiswal

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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दंगे होते हैं तो देश जलता है। नेताओं के घोटाले के बाद देश जलता है। जातिवाद, धर्मवाद और अधिकारों का हनन, न जाने कितनी बार देश जला है।
उस रोज भी मानवता जल गई थी, जब महात्मा गांधी नाथूराम गोडसे ने गोली मारी थी। 30 जनवरी 1948 को शाम पांच बजकर पंद्रह मिनट पर जब गांधी लगभग भागते हुए बिरला हाउस के प्रार्थना स्थल की तरफ़ बढ़ रहे थे, तो उनके स्टाफ़ के एक सदस्य गुरबचन सिंह ने अपनी घड़ी की तरफ़ देखते हुए कहा था, ‘बापू आज आपको थोड़ी देर हो गई।’ गांधी ने चलते-चलते ही हंसते हुए जवाब दिया था, ‘जो लोग देर करते हैं उन्हें सजा मिलती है।’ दो मिनट बाद ही नाथूराम गोडसे ने अपनी बेरेटा पिस्टल की तीन गोलियां महात्मा गांधी के सीने में उतार दी। The Life of Mahatma Gandhi किताब में बापू की मौत के बाद देश का क्या मंजर था, इस बारे में कुछ ऐसे किस्से लिखे हुए हैं, जिसे पढ़कर महात्मा गांधी की हत्या से उपजे दुख और गुस्से का अंदाजा लगाया जा सकता है।

 

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हाथ जोड़ने के बाद गोडसे ने मारा गांधी को

नाथूराम गोडसे ने गांधी जी पर तीन गोलियां चलाने से पहले उन्हें नमस्कार किया था। अदालत में जब गोडसे से पूछा गया कि उसने महात्मा गांधी को क्यों मारा? तो उसने शांत स्वर में जवाब दिया ‘गांधी जी ने देश की जो सेवा की है, उसका मैं आदर करता हूँ। उनपर गोली चलाने से पूर्व मैं उनके सम्मान में इसीलिए नतमस्तक हुआ था किंतु जनता को धोखा देकर पूज्य मातृभूमि के विभाजन का अधिकार किसी बड़े से बड़े महात्मा को भी नहीं है। गांधी चाहते तो विभाजन रोक सकते थे लेकिन उन्होंने इस ओर देखकर भी चुप्पी साधे रखी’। 15 नवम्बर 1949 को नाथूराम गोडसे को फांसी दे दी गई।

 

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बापू अब नहीं रहे, सुनने के बाद उमड़ पड़ी थी भीड़

सैकड़ों लोगों ने गांधी की मौत के गम में अपने सिर मुंडवा लिया था। उनका कहना था कि उनके पिता उनसे दूर चले गए है। देश से पिता का साया उठ गया है। राजधानी और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के हजारों लोग अपना देसी घी लेकर श्मशान स्थल पर पहुंच गए थे। इनकी चाहत थी कि जो घी वे लेकर आए हैं, उसी से गांधी की अंत्येष्टि हो जाए। शव यात्रा बिड़ला हाउस से जनपथ, कनाट प्लेस, आईटीओ होते हुए राजघाट पहुंची थी। शववाहन पर पंडित नेहरू और सरदार पटेल बैठे थे। दोनों भावहीन थे। उस समय के अखबार की खबरों के मुताबिक कहीं से किसी भी तरह की बातचीत की आवाज नहीं आ रही थी। सभी लोग मौन खड़े थे। इस रोज देश के लोग जल नहीं रहे थे बल्कि सुलग रहे थे।.Next

 

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