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नेहरू सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाला आदर्शवादी नेता

Posted On: 7 Sep, 2013 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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गांधी-नेहरू परिवार की हैसियत को हर कोई जानता है. कांग्रेस पार्टी का हर नेता शुरू से ही इस परिवार की आवाभगत करता आ रहा है. आज भी कांग्रेस पार्टी में तो क्या यूपीए के सहयोगी दलों में भी किसी की जुर्रत नहीं है कि इस परिवार के बारे में कोई कुछ कहे, लेकिन इन्हीं के परिवार के एक प्रमुख सदस्य रहे फिरोज गांधी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता.


एक आदर्शवादी नेता

फिरोज गांधी को आदर्शवादी राजनीतिज्ञ माना जाता था. उनकी सोच बहुत कम मामलों में पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू से मिलती थी. इसलिए कई मौको पर नेहरू सरकार की निंदा भी की. आजादी के बाद बहुत से व्यावसायिक घराने, राजनेताओं के साथ मिलकर अनियमितताएं कर रहे थे उस समय फिरोज गांधी ने ही इनकी कारगुजारियों को जनता के सामने उजागर किया. 1956 में फिरोज गांधी ने तब देश के सबसे अमीर लोगों में एक रामकिशन डालमिया का घपला उजागर किया जो सरकार के बहुत करीब थे. डालमिया को दो साल की जेल हुई. इसके फौरन बाद 1958 में फिरोज ने चर्चित हरिदास मूंदड़ा घोटाला उजागर किया जिसके बाद नेहरू सरकार की काफी किरकिरी हुई. आजादी के बाद फिरोज गांधी ने 1952 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली से चुनाव लड़ा औ जीत भी हासिल की.


आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका

12 सितम्बर, 1912 को तत्कालीने बॉम्बे के एक पारसी परिवार में जन्में फिरोज गांधी ने 1930 में अपनी पढ़ाई त्याग दिया और अपने आप को आजादी की लड़ाई में झोंक दिया. 1930 में वह लाल बहादुर शास्त्री के साथ जेल भी गए. उसी दौरान वे जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के करीब आए. अगस्त 1942 में महाधिवेशन के तुरन्त बाद भारत छोड़ो आन्दोलन के तहत इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया लेकिन दोनों गिरफ्तारी से बच निकले. 10 सितम्बर, 1942 को दोनों को गिरफ्तार कर इलाहाबाद की नैनी जेल भेज दिया गया. फिरोज को 1 वर्ष के कठोर दंड व 200 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गयी.


इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी की प्रेम गाथा

कहते हैं कि फिरोज और इंदिरा की मुलाकात मार्च, 1930 में हुई थी जब आजादी की लड़ाई के क्रम में एक कॉलेज के सामने धरना दे रही कमला नेहरू बेहोश हो गई थीं और फिरोज गांधी ने उनकी देखभाल की थी. संयोग से यह सिलसिला काफी आगे तक गया. इलाहाबाद में रहने के दौरान फिरोज गांधी के रिश्ते नेहरू परिवार से बेहद मधुर हो गए थे. वे अक्सर आनंद भवन आते जाते थे. यहीं से उनकी निकटता इंदिरा गांधी की तरफ बढ़ने लगी. 1942 में दोनों ने शादी कर ली. उनसे दो बेटे हुए राजीव गांधी और संजय गांधी.

पिता की मर्जी के विरुद्ध जाकर इंदिरा गांधी ने फिरोज गांधी से प्रेम-विवाह किया था लेकिन महात्मा गांधी के हस्तक्षेप बाद पिता नेहरू ने इस शादी को अपनी स्वीकृति दे दी. इसके तत्काल बाद भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ जिसमें पति-पत्नी ने जेल भी काटी. हालांकि बाद के दौर में दोनों के बीच यह रिश्ता जटिल हो गया. फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी दोनों अपनी निजी जिंदगी में संतुलन नहीं बैठा पाए. दो दशक से परवान चढ़ा प्रेम धीरे-धीरे छिन्न-भिन्न हो गया. 1949 में इंदिरा गांधी अपने बच्चों को लेकर पिता का घर संभालने चली आईं जबकि फिरोज लखनऊ में बने रहे. यहीं से उन्होंने नेहरू सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया और कई बड़े घोटालों को उजागर किया.

बाद के वर्षों में फिरोज गांधी की तबीयत खराब होने लगी. उस दौरान उनकी देखभाल के लिए इंदिरा गांधी मौजूद थीं. 8 सितंबर, 1960 को दिल के दौरे के कारण फिरोज चल बसे.

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