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Former Acting President B.D Jatti - बी.डी. जट्टी

Posted On: 17 Sep, 2011 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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b.d.jattiबसप्पा दनप्पा जट्टी का जीवन परिचय

भारत के पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति बसप्पा दनप्पा जट्टी (बी.डी. जट्टी) का जन्म 10 सितंबर, 1922 को जमखंडी तालुक, बीजापुर (कर्नाटक) में हुआ था. तत्कालीन बंबई विश्वविद्यालय से संबद्ध राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर से कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद बसप्पा दनप्पा जट्टी ने बहुत कम समय के लिए अपने गृहनगर जमखंडी में वकील के तौर पर प्रैक्टिस की.


बसप्पा दनप्पा जट्टी का व्यक्तित्व

बी.डी जट्टी एक बेहद नम्र स्वभाव के व्यक्ति और कानून के अच्छे ज्ञाता थे. जरूरत मंदों की सहायता करने के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले बी.डी जट्टी धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे.



बसप्पा दनप्पा जट्टी का राजनैतिक सफर

वर्ष 1940 में जमखंडी नगर-निगम के सदस्य के तौर पर बसप्पा दनप्पा जट्टी ने अपने राजनैतिक कॅरियर की शुरूआत की. कुछ ही समय बाद जमखंडी से ही वह विधान सभा सदस्य भी चुने गए. जमखंडी राज्य को जब मुंबई में विलीन किया गया तब बसप्पा दनप्पा जट्टी मुंबई विधानसभा के सदस्य के तौर पर नामित किए गए. सप्ताह के भीतर ही वह तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.जी. खेर के संसदीय सचिव नियुक्त हुए. इस पद पर वह दो वर्ष तक रहे. इसके बाद वर्ष 1952 के आम चुनावों में जीत दर्ज करने के बाद बी.डी. जट्टी को स्वास्थ्य और श्रम विभाग में बतौर उप-मंत्री नियुक्त किया गया. जट्टी मैसूर विधान सभा के सदस्य और भूमि सुधार समिति के अध्यक्ष भी रहे. 1958 में वह मैसूर के मुख्यमंत्री बने. जमखंडी निर्वाचन क्षेत्र से तीसरी बार जीतने के बाद वह वित्त मंत्री तथा चौथे कार्यकाल के दौरान वह खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री बनाए गए. वर्ष 1968 में पुद्दुचेरी के राज्यपाल बनने के साथ ही बसप्पा दनप्पा का राष्ट्रीय राजनीति में आगमन हुआ. वर्ष 1973 में वह उडीसा के राज्यपाल भी बने. 1974 में बी.डी. जट्टी को उपराष्ट्रपति घोषित किया गया. इस पद पर वह 1980 तक रहे. राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के पश्चात बी.डी. जट्टी को कार्यकारी राष्ट्रपति का पद प्रदान किया गया.


बसप्पा दनप्पा जट्टी का निधन

7 जून, 2002 को बसप्पा दनप्पा जट्टी का निधन हो गया.


नगर निगम चुनावों में जीतने के बाद बसप्पा दनप्पा जट्टी ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. राजनैतिक पदों के अलावा वह बसव समिति, जो बारहवीं सदी के संत और दार्शनिक बसव के विचारों और वचनों का प्रचार-प्रसार करती है, के संस्थापक भी रहे.

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