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Former President V.V.Giri - वराहगिरी वेंकटगिरी

Posted On: 9 Aug, 2011 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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v.v giriवी.वी गिरी का जीवन परिचय

वी.वी. गिरी के नाम से विख्यात भारत के चौथे राष्ट्रपति वराहगिरी वेंकटगिरी का जन्म 10 अगस्त, 1894 को बेहरामपुर, ओड़िशा में हुआ था. इनका संबंध एक तेलुगु भाषी ब्राह्मण परिवार से था. वी.वी. गिरी के पिता वी.वी. जोगिआह पंतुलु, बेहरामपुर के एक लोकप्रिय वकील और स्थानीय बार काउंसिल के नेता भी थे. वी.वी. गिरी की प्रारंभिक शिक्षा इनके गृहनगर बेहरामपुर में ही संपन्न हुई. इसके बाद यह डब्लिन यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई करने के लिए आयरलैंड चले गए. वहां वह डी वलेरा जैसे प्रसिद्ध ब्रिटिश विद्रोही के संपर्क में आने और उनसे प्रभावित होने के बाद आयरलैंड की स्वतंत्रता के लिए चल रहे सिन फीन आंदोलन से जुड़ गए. परिणामस्वरूप आयरलैंड से उन्हें निष्कासित कर दिया गया. प्रथम विश्व युद्ध के समय सन 1916 में वी.वी. गिरी वापस भारत लौट आए. भारत लौटने के तुरंत बाद वह श्रमिक आंदोलन से जुड़ गए. इतना ही नहीं रेलवे कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से उन्होंने बंगाल-नागपुर रेलवे एसोसिएशन की भी स्थापना की.


वी.वी. गिरी का व्यक्तित्व

वी.वी. गिरी अपने विद्यार्थी जीवन से ही देश और देश के बाहर चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों का हिस्सा बनना शुरू हो गए थे. उनका व्यक्तित्व बेहद गंभीर इंसान का था. वह एक अच्छे लेखक और कुशल वक्ता थे. उन्होंने अपने जीवन काल में श्रमिकों और मजदूरों के हितों के लिए कार्य किया.


वी.वी. गिरी का राजनैतिक सफर

सन 1916 में भारत लौटने के बाद वह श्रमिक और मजदूरों के चल रहे आंदोलन का हिस्सा बन गए थे. हालांकि उनका राजनैतिक सफर आयरलैंड में पढ़ाई के दौरान ही शुरू हो गया था. लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बन वह पूर्ण रूप से स्वतंत्रता के लिए सक्रिय हो गए थे. वी.वी. गिरी अखिल भारतीय रेलवे कर्मचारी संघ और अखिल भारतीय व्यापार संघ (कॉग्रेस) के अध्यक्ष भी रहे. सन 1934 में वह इम्पीरियल विधानसभा के भी सदस्य नियुक्त हुए. सन 1937 में मद्रास आम चुनावों में वी.वी. गिरी को कॉग्रेस प्रत्याशी के रूप में बोबली में स्थानीय राजा के विरुद्ध उतारा गया, जिसमें उन्हें विजय प्राप्त हुई. सन 1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी में कॉग्रेस पार्टी के लिए बनाए गए श्रम एवं उद्योग मंत्रालय में मंत्री नियुक्त किए गए. सन 1942 में जब क़ॉग्रेस ने इस मंत्रालय से इस्तीफा दे दिया, तो वी.वी. गिरी भी वापस श्रमिकों के लिए चल रहे आंदोलनों में लौट आए. अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए, अंग्रेजों द्वारा इन्हें जेल भेज दिया गया. 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद वह सिलोन में भारत के उच्चायुक्त नियुक्त किए गए. सन 1952 में वह पाठापटनम सीट से लोकसभा का चुनाव जीत संसद पहुंचे. सन 1954 तक वह श्रम मंत्री के तौर पर अपनी सेवाएं देते रहे वी.वी. गिरी उत्तर प्रदेश, केरला, मैसूर में राज्यपाल भी नियुक्त किए गए. वी.वी. गिरी सन 1967 में ज़ाकिर हुसैन के काल में भारत के उप राष्ट्रपति भी रह चुके हैं. इसके अलावा जब ज़ाकिर हुसैन के निधन के समय भारत के राष्ट्रपति का पद खाली रह गया था, तो वराहगिरी वेंकटगिरी को कार्यवाहक राष्ट्रपति का स्थान दिया गया. सन 1969 में जब राष्ट्रपति के चुनाव आए तो इन्दिरा गांधी के समर्थन से वी.वी. गिरी देश के चौथे राष्ट्रपति बनाए गए.


वी.वी. गिरी को दिए गए सम्मान

वराहगिरी वेंकटगिरी को श्रमिकों के उत्थान और देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया.


वी.वी. गिरी का निधन

85 वर्ष की आयु में वराहगिरी वेंकटगिरी का 23 जून, 1980 को मद्रास में निधन हो गया.

वी.वी गिरी एक अच्छे वक्ता होने के साथ-साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे. उनमें लेखन क्षमता भी बहुत अधिक और उच्च कोटि की थी. वी.वी. गिरी ने औद्योगिक संबंध और भारतीय उद्योगों में श्रमिकों की समस्याएं जैसी किताबें भी लिखी थीं.


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