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Aruna Asaf Ali - ग्रांड ओल्ड लेडी अरुणा आसफ अली

Posted On: 22 Dec, 2011 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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aruna asaf aliअरुणा आसफ अली का जीवन-परिचय

भारत के स्वाधीनता संग्राम की ग्रांड ओल्ड लेडी और भारत छोड़ो आंदोलन के समय मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में भारतीय राष्ट्रीय कांग़्रेस का झंडा फहराने वाली अरुणा आसफ अली का जन्म 16 जुलाई, 1909 को तत्कालीन ब्रिटिश पंजाब के अधीन कालका के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था. अरुणा आसफ अली की शिक्षा-दीक्षा लाहौर और नैनीताल में संपन्न हुई थी. स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद अरुणा आसफ अली गोखले मेमोरियल स्कूल, कलकत्ता में शिक्षक के तौर पर कार्य करने लगीं. अरुणा ने अपने से 23 वर्ष बड़े और गैर ब्राह्मण समुदाय से संबंधित आसफ अली, जो इलाहाबाद में कांग्रेस पार्टी के नेता थे, से परिवार वालों के विरुद्ध जाकर प्रेम विवाह किया.


स्वतंत्रता आंदोलन में शुरुआती भूमिका

आसफ अली से विवाह करने के पश्चात अरुणा सक्रिय तौर पर स्वाधीनता संग्राम से जुड़ गईं. नमक सत्याग्रह के दौरान होने वाली सार्वजनिक सभाओं में भाग लेने के कारण अरुणा आसफ अली को गिरफ्तार कर लिया गया. वर्ष 1931 में गांधी-इर्विन समझौते जिसके अंतर्गत सभी राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाना था, के बाद भी अरुणा आसफ अली को मुक्त नहीं किया गया. अरुणा आसफ अली के साथ होने वाले इस भेद-भाव से आहत होकर उनकी अन्य महिला साथियों ने भी जेल से बाहर निकलने से मना कर दिया. महात्मा गांधी के दखल देने के बाद अरुणा आसफ अली को जेल से रिहा किया गया. वर्ष 1932 में तिहाड़ जेल में बंदी होने के कारण उन्होंने राजनैतिक कैदियों के साथ बुरा बर्ताव करने के विरोध में भूख हड़ताल की. उनके प्रयासों द्वारा तिहाड़ जेल के कैदियों की दशा में तो सुधार हुआ लेकिन अरुणा आसफ अली को अंबाला की जेल में एकांत कारावास की सजा दी गई. जेल से बाहर आने के बाद अरुणा राजनैतिक तौर पर ज्यादा सक्रिय नहीं रहीं.


भारत छोड़ो आंदोलन

8 अगस्त, 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बंबई सत्र के दौरान अंग्रेजों को भारत से बाहर करने का संकल्प लिया गया. अंग्रेजी सरकार ने अपने विरुद्ध भारतीय नेताओं को असफल करने के लिए कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू किया. शेष सत्र की अध्यक्षता अरुणा आसफ अली ने की. उन्होंने बंबई के ग्वालिया टैंक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्वज फहराकर भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत की. अरुणा को भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका के रूप में याद किया जाता है. कोई स्थिर नेतृत्व ना होने के बावजूद देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ कड़े विरोध प्रदर्शन हुए जो यह स्पष्ट कर रहे थे कि अब भारतवासियों को गुलाम बना कर नहीं रखा जा सकता.


इसी दौरान अरुणा आसफ अली को गिरफ्तार करने का निर्देश जारी कर दिया गया. गिरफ्तारी से बचने के लिए अरुणा भूमिगत रहने लगीं. अंग्रेजों ने उनकी सारी संपत्ति अपने अधीन कर उसे बेच दिया. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर वह इंकलाब नामक मासिक समाचार पत्र का संपादन भी करती रहीं. अंग्रेजी सरकार ने अरुणा आसफ अली की सूचना देने पर 5,000 का इनाम रखा. इस बीच अरुणा आसफ अली की तबीयत भी बहुत बिगड़ गई थी. महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखकर आत्मसमर्पण करने और आत्मसमर्पण के एवज में मिलने वाली धनराशि को हरिजन अभियान के लिए उपयोग करने को कहा. वर्ष 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया तब अरुणा आसफ अली ने स्वयं को आत्मसमर्पित किया.


स्वाधीनता के पश्चात अरुणा आसफ अली

अरुणा आसफ अली कांग्रेस पार्टी से संबंधित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सदस्या थीं. वर्ष 1948 में अरुणा आसफ अली ने कांग्रेस पार्टी छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली. कुछ समय बाद अरुणा आसफ अली कम्यूनिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं. वर्ष 1953 में पति आसफ अली के निधन के पश्चात अरुणा आसफ अली मानसिक और भावनात्मक रूप से बहुत कमजोर हो गई थीं. वर्ष 1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली मेयर बनीं. जयप्रकाश नारायण के साथ मिलकर उन्होंने दैनिक समाचार पत्र पैट्रियाट और साप्ताहिक समाचार पत्र लिंक का प्रकाशन किया. जवाहर लाल नेहरू, बीजू पटनायक आदि से संबंधित होने के कारण जल्द ही दोनों समाचार पत्रों को स्थापित पहचान मिल गई. लेकिन अंदरूनी राजनीति से आहत होकर उन्होंने कुछ ही समय में प्रकाशन का काम छोड़ दिया. 1964 में दोबारा कांग्रेस में शामिल होने के बाद भी वह सक्रिय राजनीति से दूर रहीं. अरुणा आसफ अली इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी के करीबियों में से एक थीं. 29 जुलाई, 1996 को अरुणा आसफ अली का निधन हो गया.

वर्ष 1975 में अरुणा आसफ अली को शांति और सौहार्द के क्षेत्र में लेनिन प्राइज और 1991 में अंतरराष्ट्रीय ज्ञान के लिए जवाहरलाल नेहरू पुरुस्कार से नवाजा गया. 1992 में उन्हें पद्म विभूषण और 1997 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत-रत्न से सम्मानित किया गया.


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