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राजीव गांधी की जिंदगी पर भारी पड़ गया उनका यह फैसला, उस भयानक दिन की कहानी

Posted On: 21 May, 2019 Politics में

Pratima Jaiswal

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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कहते राजनीति की कुर्सी कांटो से भरी हुई है। इसपर बैठते ही कौन-सा कांटा आपको चुभ जाए, कहा नहीं जा सकता।
भारत रत्न और देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की आज जयंती है। देश के छठवें और सबसे युवा प्रधानमंत्री थे राजीव सिर्फ, जो 40 वर्ष की उम्र में पीएम बन गए थे। राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। 21 मई 1991 को आम चुनाव में प्रचार के दौरान तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक भयंकर बम विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई। राजीव गांधी के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ‘On the Brink of Death’ किताब में विस्तार से बताया गया है।

 

 

राजनीति में आने से पहले पायलट थे राजीव
उनकी शुरुआती देहरादून के दून स्कूल में हुई थी। इसके बाद 1961 में वह लंदन गये और वहां के इम्पीरियल कॉलेज और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की थी। राजीव गांधी की कभी राजनीति में आने की दिलचस्पी नहीं थी। राजनीति में आने से पहले वो एक एयरलाइन में पायलेट की नौकरी करते थे। आपातकाल के बाद जब इंदिरा गांधी को सत्ता छोड़नी पड़ी थी, तब कुछ समय के लिए राजीव परिवार के साथ विदेश में रहने चले गए थे। लेकिन 1980 में अपने छोटे भाई संजय गांधी की एक हवाई जहाज दुर्घटना में मौत के बाद मां इंदिरा को सहयोग देने के लिए उन्हें साल 1982 में राजनीति में उतरना पड़ा।  वो अमेठी से लोकसभा का चुनाव जीतकर सांसद बने और 31 अक्टूबर 1984 को मां इंदिरा गांधी की हत्या किए जाने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस की पूरी बागडोर उन्हीं के कंधों पर डाल दी। 1981 में हुए आम चुनावों में सबसे अधिक बहुमत पाकर प्रधानमंत्री बने रहे।

 

 

कई बेहतरीन फैसले करने वाले राजीव की जिंदगी पर भारी पड़ गया एक फैसला
राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कई बेहतरीन फैसले लिए। आईटी क्रांति की नीव राजीव गांधी ने ही रखी, मतदान उम्र सीमा 18 साल की और ईवीएम मशीनों की शुरुआत की और पंचायती राज के लिए विशेष प्रयास किए करने जैसे कई फैसले राजीव के कार्यकाल में लिए गए लेकिन उनके द्वारा लिया गया एक फैसला उनकी जिंदगी के लिए खतरा बन गया। श्रीलंका में लम्बे अरसे से जातीय संघर्ष चल रहा था। सिंहली और तमिलों के बीच तनावपूर्ण स्थिति थी। 1987 में भारत और श्रीलंका के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत भारतीय सेना श्रीलंका में हस्तक्षेप करने पहुंची थी। समझौते के तहत एक भारतीय शांति रक्षा सेना बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य श्रीलंका की सेना और लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) जैसे उग्रवादी संगठनों के बीच चल रहे सिविल वार को खत्म करना था।

 

 

उस दौरान लिट्टे चाहता था कि भारतीय सेना वापस चली जाए, क्योंकि वह हमारी सेना के श्रीलंका में जाने की वजह से अलग देश की मांग नहीं कर पा रहा था। राजीव के फैसले ने लिट्टे के मंसूबों का कामयाब नहीं होने दिया। इसी फैसले से नाराज होकर लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या करने की साजिश रच दी।

 

 

इतना भयानक था हादसा 
21 मई, 1991 की रात दस बज कर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक ऐसी घटना घटी, जिसे एक काले दिन के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। लगभग तीस साल की एक नाटी और गहरे सवाले रंग और गठीली लड़की चंदन का एक हार ले कर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरफ बढ़ी। जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए झुकी, कानों को बहरा कर देने वाला धमाका हुआ। श्रीपेरंबदूर में उस भयंकर धमाके के समय तमिलनाडु कांग्रेस के तीनों चोटी के नेता जी के मूपनार, जयंती नटराजन और राममूर्ति मौजूद थे। जब धुआं छटा तो राजीव गांधी की तलाश शुरू हुई। उनके शरीर का एक हिस्सा औंधे मुंह पड़ा हुआ था।
नीना गोपाल की लिखी किताब The Assasination of Rajiv Gandhi के मुताबिक राजीव गांधी का शरीर कई हिस्सों में कटकर यहां-वहां पड़ा हुआ था। धमाका इतना भयानक था कि राजीव के शरीर के हिस्सों को तलाशने के लिए घंटो मेहनत करनी पड़ी थी…Next

 

 

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