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मोदी लहर का इस कांग्रेसी नेता पर नहीं पड़ा कोई असर, 52 साल से हैं विधायक

Posted On: 17 Mar, 2017 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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बचपन में देश के प्रधानमंत्री कौन है, मुख्यमंत्री कौन है टाइप सवाल पूछे जाते थे, जिसे रट लिया करते थे, लेकिन निगम पार्षद और विधायक ऐसे पद रहे, जिनपर न ज्यादा कोई ध्यान देता था और न ही इनपर कोई सवाल आते थे, क्योंकि हर इलाके के विधायक-पार्षद अलग होते हैं. बचपन छोड़िए, बड़े होने के बाद भी ज्यादातर लोगों को अपने या आसपास के विधायकों की जानकारी नहीं होती, लेकिन केरल के जिला है कोट्टयम. जहां है पाला नाम की जगह. यहां पर करिन्कोजक्कल मणि मणि जो 52 सालों से यहां के विधायक हैं. कितनी सरकारें आई और गई लेकिन मणि 52 सालों से यहां की राजनीति पर काबिज हैं. इस तरह मणि के नाम 13 बार पलाई/पाला से जीतने का विश्व रिकॉर्ड है.


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ऐसे शुरू हुई थी पारी

मणि को प्यार से दो बार मणि कहा जाता है.  मणि के राजनीति सफर की बात करें तो, 1960 में कोट्टयम के कांग्रेस जिलाध्यक्ष बने. कहते हैं कि उनके कॅरियर को इस बात से खूब मदद मिली कि उनकी शादी पीटी चाको की बहन से हुई थी. पीटी चाको तब केरल में बड़े नेता थे. लेकिन मणि सही मायने में आगे तभी बढ़े जब पीटी चाको की छांव से बाहर निकले.


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ससुर के देंहात के बाद चमक गया राजनीतिक कॅरियर

साल 1964 था. पीटी चाको केरल के गृहमंत्री थे. उन पर इल्जाम लगा कि वे अपनी पार्टी की एक कार्यकर्ता के साथ छुट्टियां बिताने निकले थे. उन दिनों भी राजनेताओं के निजी जीवन पर खूब कोहराम मचाया जाता था. इसे एक मुद्दा बना लिया गया और पीटी चाको को इस्तीफा देना पड़ा. कुछ समय बाद चाको का देहांत हो गया. इस पर केरल में कांग्रेस दो भागों में बंट गई. चाको के समर्थकों ने ‘केरला प्रदेश कांग्रेस समुधारणा समिति’ नाम से अलग पार्टी बना ली. इसी का नाम बाद में बदलकर ‘केरला कांग्रेस’ कर दिया गया.


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कभी चुनाव लड़ने के लिए नहीं थे पैसे

उस वक्त मणि कांग्रेस में ही बने रहे. इसीलिए उन्हें धक्का पहुंचा जब 1965 के चुनावों में उन्हें कांग्रेस से टिकट नहीं मिला. मणि तब तक रुके जब तक उन्हें चुनाव लड़ने के लिए एक फाइनेंसर नहीं मिल गया. उसकी व्यवस्था होते ही वे केरला कांग्रेस में चले गए. पार्टी ने उन्हें पलई से टिकट भी दे दिया. तब पाला को पलई कहते थे. चुनाव हुए और मणि जीत गए.


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ये है जीत का फॉर्मूला

84 साल की उम्र पार कर चुके मणि को इलाके के अधिकतर लोगों के नाम याद है. वो आम इंसान की तरह ही सबसे मिलते-जुलते हैं. उन्होंने इलाके में कई योजनाएं चलाई है, जिससे लोगों की जरूरतें पूरी हो सके. इन योजनाओं में सबसे निराली योजना है ‘कारुण्या बेनेवॉलेंट फंड.’ इसके तहत केरल की सरकार एक लॉटरी स्कीम चलाती है ‘कारुण्या लॉटरी’ नाम से. इससे जमा हुए पैसों से गरीब परिवार के लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए 2 लाख तक की मदद दी जाती है.


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‘बार स्कैम’ में आया था नाम लेकिन 2 महीने में ही मिल गई क्लीन चिट

मणि का नाम 5 करोड़ की रिश्वतखोरी में भी आ चुका है. केरल में बंद पड़े 418 बार को फिर से खुलवाने के लिए मणि ने 5 करोड़ की घूस की मांग की थी, ऐसा आरोप एक होटल मालिक ने लगाया था. लेकिन मणि को जांच में 2 महीने बाद ही क्लीन चिट मिल गई.


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राजनीति में अक्सर डर, दंबगई या परिवारवाद के कारण कोई नेता सत्ता में काबिज रहता है, लेकिन मणि के काम को देखते हुए ये आसानी से कहा जा सकता है मणि जनता के नेता हैं, इसलिए इन्हें जीतने के लिए कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ती…Next



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