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कर्नाटक में बज गया चुनावी बिगुल, ऐसा है यहां का सियासी गणित

Posted On: 27 Mar, 2018 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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कर्नाटक में विधानसभा चुनाव का बिगुल गज गया। निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को विधानसभा चुनाव की तारीख का एलान किया। इसके अनुसार कर्नाटक में 12 मई को मतदान होगा और 15 मई को वोटों की गिनती। चुनाव आयोग के मुताबिक, 17 अप्रैल 2018 को अधिसूचना जारी होगी। उम्मीदवार 27 अप्रैल तक नाम वापस ले सकेंगे। चुनाव की तारीख के एलान के साथ ही कर्नाटक में तत्काल प्रभाव से आचार संहिता लागू हो गई है। कर्नाटक का चुनाव देश की दोनों बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के लिए काफी अहम है। कांग्रेस ने यहां अपनी सत्‍ता बचाने और भाजपा ने सत्‍ता में वापसी के लिए ताकत झोंक दी है। आइये आपको यहां के राजनीति गणित के बारे में बताते हैं।

 

 

भाजपा-कांग्रेस के अलावा जेडीएस भी मैदान में

कर्नाटक विधानसभा चुनाव की घोषणा भले ही आज हुई हो, लेकिन सूबे की सत्‍ता पर काबिज होने के लिए राजनीतिक पार्टियां रणभूमि में पहले से ही उतर चुकी हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस अपना किला बचाने में जुटी है, तो बीएस येदियुरप्पा को सीएम फेस बनाकर भाजपा भी ताकत झोंके हुए है। वहीं, जेडीएस बसपा के साथ गठबंधन कर सत्ता की बाजी जीतने के लिए जद्दोजहद कर रही है।

 

2013 के चुनाव में ऐसा रहा परिणाम

कर्नाटक में कुल 225 विधानसभा सीटें हैं, लेकिन 224 सीटों के लिए चुनाव होता है। एक सीट पर एंग्लो-इंडियन समुदाय से सदस्य मनोनीत होता है। 2013 के विधानसभा चुनाव में राज्य की कुल 224 सीटों में से कांग्रेस ने 122 जीती थी, जबकि भाजपा ने 40 और जेडीएस ने 40 सीटों पर कब्जा किया था। भाजपा से बगावत कर अलग चुनाव लड़ने वाले बीएस येदियुरप्पा की केजेपी महज 6 सीटें जीत पाई थी। इसके अलावा अन्य को 16 सीटें मिली थी। हालांकि, बाद में येदियुरप्पा दोबारा भाजपा के साथ आ गए।

 

9 साल बाद कांग्रेस ने की थी वापसी

कांग्रेस 2013 में 9 साल बाद अपने दम पर राज्य की सत्ता में आई। इससे पहले आखिरी बार 1999 में सत्ता में आई थी और तब एसएम कृष्णा मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद कांग्रेस ने सत्ता में अपने दम पर 2013 में वापसी की। सिद्धारमैया मुख्‍यमंत्री बने। पांच साल के कार्यकाल के बाद कांग्रेस एक बार फिर उन्हीं के नेतृत्व में मैदान में उतरी है।

 

 

येदियुरप्पा की बेरुखी से भाजपा को नुकसान

2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को येदियुरप्‍पा की बेरुखी की वजह से बड़ा नुकसान हुआ। कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2008 की तुलना में 2013 में भाजपा को 70 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा, जबकि राज्य की सभी पार्टियों को फायदा मिला था। सबसे ज्‍यादा लाभ कांग्रेस को 42 सीटों का, जेडीएस को 12 और अन्य उम्मीदवारों को 10 सीटों पर लाभ हासिल हुआ था।

 

2004 से 2013 तक कर्नाटक की सियासत

कर्नाटक में 2004 के विधानसभा चुनाव से गठबंधन का दौर चला। पहले कांग्रेस ने जेडीएस के साथ मिलकर सरकार चलाई, लेकिन वो सफल नहीं रही। इसके बाद जेडीएस ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। मुख्यमंत्री जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी बने। कुमारस्वामी ने 20 महीने तक गठबंधन सरकार चलाने के बाद वादे के मुताबिक भाजपा को सत्ता नहीं सौंपी। इसके बाद सियासी उठापटक जारी रही और 2008 में चुनाव हुए, जिसके बाद भाजपा सत्ता में आई। मगर पांच साल में कई उठापटक देखने को मिली। मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को अपनी कुर्सी गवांनी पड़ी, जिसके बाद वे पार्टी से अलग हो गए। 2013 में भाजपा की हार का कारण येदियुरप्पा बने थे। अब एक बार फिर येदियुरप्पा भाजपा का दामन थामकर कर्नाटक जीतने के लिए ताकत झोके हुए हैं…Next

 

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