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इस्‍तीफा जेब में लेकर क्‍यों चलते थे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री, पाकिस्‍तान को घुटने टेकने पर विवश किया

Posted On: 11 Jan, 2020 Politics में

Rizwan Noor Khan

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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देश के सबसे चहेते और दूसरे प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्‍त्री अपनी ईमानदारी, कर्मठता, दृढ़ इच्‍छाशक्ति और मजबूत इरादों के लिए जाना जाता है। देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले कई मंत्रालयों समेत विशिष्‍ट पदों पर रहने वाले शास्‍त्री जी हमेशा अपना इस्‍तीफा जेब में रखते थे। ताशकंद समझौते के दौरान उजबेकिस्‍तान में 11 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री अकस्‍मात इस दुनिया को हमेशा लिए अलविदा कह गए।

 

 

 

 

 

बचपन के नन्‍हें बड़े होकर बने प्रधानमंत्री
मुगलसराय में 2 अक्‍टूबर 1904 को शारदा प्रसाद श्रीवास्‍तव और रामदुलारी देवी के घर देश का सबसे चहेते लीडर लाल बाहदुर शास्‍त्री ने जन्‍म लिया। घर में सबसे छोटे होने के कारण उन्‍हें लाल और नन्‍हें कहकर पुकारा जाता था। बाद में उनका नाम लाल बहादुर शास्‍त्री रख दिया गया। बड़े होकर लाल बहादुर शास्‍त्री ने काशी विद्यापीठ से शिक्षा लेकर देश के लिए स्‍वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के खिलाफ वैचारिक जंग लड़ी।

 

 

 

लाल बहादुर शास्‍त्री को काम में दखलंदाजी पसंद नहीं थी
पंडित जवाहर लाल नेहरू, पंडित गोविंद बल्‍लभ पंत से प्रेरित लाल बहादुर शास्‍त्री 1929 में इलाहाबाद में गठित भारत सेवक संघ के सचिव बनाए गए और यहां से उनके राजीनतिक जीवन की शुरुआत हो गई। इसके बाद लाल बहादुर शास्‍त्री उत्‍तर प्रदेश सरकार के महत्‍वपूर्ण पदों पर रहते हुए केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों के प्रमुख बने। अपने उसूलों और आदर्शों पर चलने वाले लाल बहादुर शास्‍त्री निर्भीक और बिना किसी दबाव के काम करने वाले मुखर वक्‍ता के तौर पर जाने जाते थे। वह अपने कामों में बिना वजह किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं करते थे। कई लोग मानते हैं कि यही वजह थी कि वह हमेशा अपना इस्‍तीफा जेब में लेकर चलते थे।

 

 

 

 

पाकिस्‍तान को नाकों चने चबवा दिए
इमानदारी, कर्मठता और लोकप्रियता के चलते 1964 में लाल बहादुर शास्‍त्री को प्रधानमंत्री बनाया गया। इसके अगले साल ही 1965 में पाकिस्‍तान ने अचानक भारत पर हमला कर दिया। आपात बैठक में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री ने तीन सेनाओं के प्रमुखों को देश की रक्षा के लिए जान कुर्बान करने के लिए तैयार रहने के आदेश दिए और दोनों ओर युद्ध छिड़ गया। इस दरमयान शास्‍त्री जी ने जय जवान जय किसान का नारा देकर देश की जनता को एकजुट कर दिया। इसका नतीजा रहा कि पाकिस्‍तान को मुंह की खानी पड़ी। भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान के लाहौर तक कब्‍जा कर लिया।

 

 

 

 

 

ताशकंद में बुझ गया भारत का चमकदार सितारा
भारत ने जब पाकिस्‍तान के लाहौर एयरपोर्ट को घेर लिया। अमेरिका और संयुक्‍त राष्‍ट्र रूस ने युद्ध विराम को लेकर समझौते के लिए लाल बहादुर शास्‍त्री और पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अयूब खान को उजबेकिस्‍तान के ताशकंद में बुलाया गया। यहां पर पाकिस्‍तान और भारत के बीच युद्ध विराम और सीमा संयोजन के लिए समझौता होना था। समझौते पर हस्‍ताक्षर के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री का 11 जनवरी 1966 की रात को अकस्‍मात मृत्‍यु हो गई। शास्‍त्रीजी की मृत्‍यु आज तक रहस्‍य बनी हुई है। कुछ लोग उनकी मौत की वजह ह्रदयाघात को मानते हैं तो कुछ लोग उन्‍हें जहर देकर साजिशन हत्‍या करने की बात कहते हैं।…NEXT

 

 

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