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राजनीति की टेढ़ी चाल और पितामह का अंत

Posted On: 8 Nov, 2013 Politics में

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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advani-45_101111025829अपनी बनाई रियासत किसी और को सौंपकर बेसाख्ता किसी और गली रुखसत हो जाने की परंपरा नहीं होती, जबरदस्ती थोपी जाने वाली बात बन जाती है. लाल किशनचंद आडवाणी आज भाजपा की धुरी से बाहर निकलते नजर आते हैं लेकिन उनका निकलना उनकी खुशी नहीं, मजबूरी है. किसी के जोर पर अपने ही बनाए रास्तों पर किसी और को चलने देने का अधिकार देने को मजबूर भाजपा के इस ‘भीष्म पितामह’ के इन मजबूर हालातों के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?


बाहर कुछ भी दिखे लेकिन भाजपा आज वस्तुत: दो खेमो में बंट गई है और इसमें कोई दो राय नहीं. एक खेमा जो नरेंद्र मोदी का समर्थक है और दूसरा आज भी दादा (लाल कृष्ण आडवाणी) के नक्शे कदम पर चलने को ही भाजपा के भविष्य़ के लिए सही मानता है. हालांकि नरेंद्र मोदी के भाजपा का पीएम उम्मीदवार बनने से अब तक के हालात में काफी बदलाव आया है और आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी भरसक प्रयास करती है कि ऐसा कोई विवाद पार्टी से बाहर मुद्दा न बनने पाए, लेकिन कहीं न कहीं पितामह (लाल कृष्ण आडवाणी) का दर्द मीडिया की नजर में आकर विवादित बन ही जाता है.


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) में एक आम स्वयं सेवक की तरह अपना राजनीतिक करियर शुरु करने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने कभी इतना आगे बढ़ने का सोचा था या नहीं यह तो नहीं कह सकते लेकिन ‘किंतु-परंतु’ के जोड़-तोड़ के साथ जनता पार्टी से अलग होकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी. विपक्ष के सशक्त नेता बनकर लालकृष्ण आडवाणी की वाणी भाजपा में हमेशा सशक्त भूमिका में रही. पार्टी के इस कर्णधार के विरोध का दम कभी किसी ने नहीं दिखाया. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने से लेकर अटल बिहारी के प्रधानमंत्री बनने तक हर जगह आडवाणी की राय और इसमें सभी पार्टी सदस्यों की सहमति शामिल थी. राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाना हो या भाजपा की रथ यात्रा रैली का निर्णय, हर जगह आडवाणी पितामह की सशक्त भूमिका में नजर आए.

विकास पुरुषों की राजनीति विकास पर भारी न पड़ जाए


भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी के कद को लेकर कभी कोई विवाद नहीं रहा. लेकिन हां, प्रधानमंत्री बनने की लालसा हमेशा आडवाणी के लिए लालसा ही रही. 2009 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में में वे उपप्रधानमंत्री जरूर रहे. शायद आडवाणी को यह उम्मीद थी कि अटल बिहारी की रिटायरमेंट के बाद वे जब तक चाहें भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ बने रह सकते हैं और शायद आडवाणी ने यहीं चूक कर दी. राजनीति के इस पुराने परिचित ने शायद राजनीति के नए रुख को समझने में भूल कर दी. यह कहना गलत नहीं होगा कि जिन्ना की प्रशंसा के साथ ही इनके लिए शुरु हुई मुश्किलें आज चरम पर पहुंच चुकी हैं. जिस पितामह की मुख्य भूमिका भाजपा के लिए हमेशा प्राथमिकता होती है, जिनकी नीतियां पार्टी की नीतियां होती थीं उनकी भूमिका आज पार्टी में नगण्य है और जगह लेनेवाला चेहरा भी वह है जो आडवाणी की नीतियों से एकदम बाहर है.


advani-46_1011110258292009 के लोकसभा चुनावों के दौरान इसी मौसम लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के हर प्रोमोशन में शामिल थे. पार्टी के नारों में हर तरफ आडवाणी की गूंज थी. इस बार 2014 के चुनावों से पहले आज आडवाणी का कहीं कोई नाम नहीं. हर तरफ बस मोदी ही मोदी नजर आ रहे हैं. नरेंद्र मोदी की रैली, नरेंद्र मोदी के भाषण, नरेंद्र मोदी के प्रचार तरीके, नरेंद्र मोदी के विकास के मुद्दे, आदि-आदि और ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी हाशिए पर दिखते हैं. आज आडवाणी के जन्मदिन के दिन नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपनी रैली को अंजाम दिया. एक समय पार्टी के धुरी माने जाने वाले इस पितामह को वे उनके जन्मदिन पर अपने भाषण में कितना मह्त्व देते हैं वह तो रैली के बाद ही पता चलेगा लेकिन पूर्व की घटनाएं नरेंद्र मोदी द्वारा इस इस विस्थापित नेता के लिए कोई खास तवज्जो नजर नहीं आती. पार्टी के ‘पीएम इन वेटिंग’ घोषित किए जाने के कुछ ही दिनों बाद एक मीटिंग के दौरान लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी समेत अन्य पार्टियों के कई कद्दावर नेता भी मौजूद थे, वहां न नरेंद्र मोदी ने आडवाणी के लिए, न आडवाणी ने नरेंद्र मोदी के लिए कोई उष्णता दिखाई. यहां तक कि आडवाणी नीतीश जो नरेंद्र मोदी के चिर विरोधी समझे जाते हैं, से बड़े आदर और सम्मान से मिलते नजर आए.


भाजपा के लौह पुरुष और पितामह कहे जाने वाले आडवाणी आज पार्टी में अपनी पुरानी गरिमा को कहीं ढूंढ़ रहे हैं. पार्टी के जन्म से इसके विकास तक आडवाणी केवल इसके गवाह नहीं बल्कि इसमें अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में रहे. जिन्ना की प्रशंसा को लेकर जब पार्टी के ही कुछ नेताओं से विरोधाभास हुआ, इन्होंने अपनी पसंद से राजनाथ सिंह को कार्यभार सौंपा. यह सब लेकिन आडवाणी की राजनीति का एक हिस्सा ही मानी गई क्योंकि इससे उनकी नीति परकता और भाजपा के लिए नीति-निर्माण की उनकी दशा में किसी भी प्रकार के बदलाव की कोई आशंका किसी को नहीं थी. लेकिन अचानक उल्टी हुई अपनी पारी को किसी भी तरह फिर से समेट पाने में इस लौह पुरुष की लौहता काम नहीं आ रही. आडावाणी के लाख विरोधों के बावजूद नरेंद्र मोदी भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ बनाए गए. शायद आडवाणी के लिए सबसे दुख की बात यही होगी कि उनके ही बनाए राजनाथ सिंह ने उनकी रजामंदी के लिए बहुत अधिक धीरज नहीं रखा या शायद आडवाणी संघ के आदेशों के आगे अपनी लौहता गंवाता महसूस कर रहे हैं. जो भी है लेकिन भाजपा के राजनीतिक काल में पितामह की भूमिका भी महाभारत के भीष्म पितामह की तरह काल के गर्भ में जाएगी ऐसी सोच कभी कल्पित भी नहीं हुई. हालांकि इस पितामह का अंत भी कुछ उसी प्रकार हो रहा है.

अखंड भारत ‘अविभाज्य पटेल’

एक झूठ को सौ बार बोलो तो सच बन जाता है

आडवाणी के पतन की दास्तां

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