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वह मुख्‍यमंत्री जो झोपड़ी में रहता था और रिक्‍शे से चलता था

Posted On: 18 Feb, 2020 Politics में

Rizwan Noor Khan

Political Blogराजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व-कृतीत्व सहित उनकी उपलब्धियों को दर्शाता ब्लॉग

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बिहार के मुख्‍यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर को लोग उनकी सादगी भरे जीवन के लिए याद करते हैं। बिहार की राजनीति में गरीबों की आवाज बनकर उभरे कर्पूरी ठाकुर को लोग जननायक के नाम से पुकारते थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि वह एक झटके में सरकार बदल सकते थे। आईए जानते हैं उनसे जुड़े रोचक किस्‍से।

 

 

 

 

जवान खून ने अंग्रेजों को चने चबवाए
बिहार में समस्‍तीपुर जिले के पितौंझिया गांव में गोकुल ठाकुर और रामदुलारी के घर 24 जनवरी 1924 को कर्पूरी ठाकुर का जन्‍म हुआ। क्रांतिकारी विचारों वाले कपूरी ठाकुर के अंदर बचपन से नेतृत्‍व क्षमता ने जन्‍म लेना शुरू कर दिया था। छात्र जीवन के दौरान युवाओं के बीच लोकप्रियता हासिल कर चुके कर्पूरी ठाकुर ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

 

 

 

खिसियाए अंग्रेजों ने दो साल जेल में रखा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्‍सा लेने के लिए कर्पूरी ठाकुर ग्रेजुएशन बीच में ही छोड़ दी। आंदोलन में जबरदस्‍त तरीके से हिस्‍सा लेने और अंग्रेजी सरकार की चूलें हिलाने वाले कर्पूरी ठाकुर को दो साल से ज्‍यादा समय तक जेल में गुजारना पड़ा। जेल से जब वह बाहर निकले तो और मुखर होकर समाजसेवा और गरीबों की उन्‍नति के लिए काम करने लगे। इस दौरान उन्‍होंने गरीबों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया और शिक्षक बन गए।

 

 

 

 

पहले चुनाव में ही जीत हासिल की
1952 में कर्पूरी ठाकुर बिहार विधानसभा के सदस्‍य चुने गए। सोशलिस्‍ट पार्टी के टिकट पर ताजपुर विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ने वाले कर्पूरी ठाकुर विधायक बने। इसके बाद कर्पूरी ठाकुर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार राजनीतिक करियर की सीढि़यां चढ़ते चले गए। इस दौरान वह बिहार सरकार में मंत्री रहे बाद में वह उपमुख्‍यमंत्री और दो बार मुख्‍यमंत्री बने।

 

 

 

बड़ी हस्‍ती बने पर सादगीभरा जीवन जिया
खबरों के मुताबिक बिहार की राजनीति में हनक रखने वाले कर्पूरी ठाकुर सादगी भरा जीवन जीना पसंद करते थे। विधायक रहते हुए भी वह झोपड़ीनुमा मकान में ही रहते थे। किसानों के लिए तमाम तरह की सुविधाएं देने वाले कर्पूरी ठाकुर गाड़ी खराब होने पर पैदल ही चल दिया करते थे। कहा जाता है कि एक कार्यक्रम में जाते हुए रास्‍ते में उनकी गाड़ी खराब हो गई तो उन्‍होंने ट्रक में लिफ्ट ले ली।

 

 

 

 

गरीब, किसान और युवाओं को दी सौगात
कर्पूरी ठाकुर ने किसानों को राहत देने के लिए मालगुजारी टैक्‍स को बंद कर दिया। सचिवालय में चतुर्थ श्रेणीकर्मियों के लिए वर्जित लिफ्ट को उनके लिए खोल दिया। गरीबों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए मुंगेरीलाल कमीशन लागू करने पर कर्पूरी ठाकुर को सवर्णों का विरोध झेलना पड़ा। उन्‍होंने राज्‍य कर्मचारियों के बीच कम ज्‍यादा वेतन और हीनभावना को खत्‍म करने के लिए समान वेतन आयोग लागू कर दिया।

 

 

 

 

इमानदारी के किस्‍से आज भी गूंज रहे
बिहार के सबसे ताकतवर व्‍यक्ति होते हुए भी कर्पूरी ठाकुर के पास धन दौलत नहीं थी। उनकी मौत के बाद विरासत में परिवार के लिए वह कुछ भी छोड़कर नहीं गए थे। यहां तक कि एक भी मकान और अन्‍य जायदाद भी नहीं। कपूरी ठाकुर की इमानदारी के किस्‍से आज भी बिहार में सुने जा सकते हैं। गरीबों के मसीहा और राजनीतिक योद्धा कर्पूरी ठाकुर का 17 फरवरी 1988 को 64 वर्ष की आयु में निधन हो गया।…NEXT

 

 

 

 

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