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बच्चे और हमारी उम्मीदें

Posted On: 2 Sep, 2012 Others में

शब्दों की दुनियाचलो जलाए दीप वहां, जहाँ अभी अँधेरा है.

प्रभुजी

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कल एक अच्छी बात हुई .लक्ष्य ने अपने विद्यालय में पहली बार कविता पाठ किया . पांच वर्ष की आयु होने को है .और कविता के प्रति लगाव … उसकी मैडम जी भी उसकी तारीफ कर रही थी .
तारे कितने प्यारे लगते
और रात भर सारे जगते …..
इस कविता को मैं उसे काफी समय से सुना रहा हूँ . जब भी वह रोता था या हम फुर्सत में होते थे तो यह कविता हमारे मध्य साथी की तरह होती थी .चंदा मामा दूर के …. या मेरी बगिया प्यारी प्यारी … जैसी कितनी ही कविताओं के माध्यम से हम एक दूसरे को प्रसन्न करने का काम किया करते. आज जब वह कविता सुना कर घर आया तो उसने बताया कि पापाजी, कविता पाठ में मैं प्रथम आया हूँ . बड़ा अच्छा लगा . ऐसा लगा जैसे उसने अपना पहला शब्द बोला हो . ऐसा लगा जैसे उसने मुझे पहली बार पापाजी कहा हो . ऐसा लगा जैसे उसने पहली बार जमीन पर पैर जमा कर चलना सीखा हो .
हम कहाँ देख पाते हैं कि हमारा बच्चा क्या नया कर रहा है .उसने कौन सी नई बात सीखी है . उसके दोस्त कौन कौन हैं . आज उसे कौन सी बात अच्छी लगी है ,कौन सी बात ने उसे दुखी किया है . हमारी तथाकथित व्यस्तता ने इन छोटी छोटी खुशियों को , इन मील के पत्थरों को ,लगाव के इन सूत्रों को हम से दूर कर दिया है . कितने पिता होंगे जो अपने बच्चों के साथ बच्चा बन कर खेलते होंगे ,उनको कहानियाँ सुनाते होंगे ,उनके साथ पतंग उड़ाते होंगे , कंचे खेलते होंगे . और तो और कम्प्यूटर पर भी पर गेम खेलते होंगे .
जिस बच्चे को हमने लगाव सिखाया ही नही , अपने पहलू में जगह देने की बजाय हमने उसे होस्टल में डाल दिया . उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज देने की सनक के चलते दरबदर कर दिया . अपने हाथ से कभी उसका माथा सहलाने की फुर्सत ही नही निकाल पाए . उसके मन में उमड़ते गुड्डा गुडिया को कभी हमने विकसित नही होने दिया . आधुनिक से आधुनिकतम होने की अंधी दौड़ ने हमे यन्त्र मानव बना दिया और हमारे बच्चों को उनकी जड़ों से, उनके प्राकृतिक खेल खिलौनों से, माँ-बाप की गोद से , दादी दादा की कहानियों से बहुत बहुत अलग कर दिया . अब हम उनसे उम्मीद रखते हैं कि वह हमारी सेवा करेगा , हमारे कष्ट हरेगा ,अपने पुत्र होने का फर्ज पूरा करेगा . वह क्यों हमारी उम्मीदों पर खरा उतरे ? क्या हमने उसे यह सिखाया कि पिता पुत्र का रिश्ता सामाजिक ही नही, भावनात्मक भी होता है .क्या हम उसे यह सिखा पाए कि भावनाओं का आदान प्रदान ही रिश्तों का आधार है, रिश्ते खून के हों या कि पसीने के भावनाओं से सींचे जाते हैं , रूपये – पैसे से नही .
कहीं न कहीं तो गलती हो रही है , कहीं न कहीं तो दिशाएं भटकी हैं.दयनीय दशा के लिए भटकी हुई दिशाएं ही उत्तरदायी हैं . हमे फिर से सोचना होगा कि हमे चाहिए क्या और करना क्या है . उम्मीदें पालने से पहले अपनी भूमिका तय करनी ही पड़ेगी . अपना काम तो करना ही पड़ेगा .
– प्रभु दयाल हंस

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