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जब शर्म लगे बोलने में तो सम्मान की मैं हकदार नही "मैं हिंदी" "Contest"

Posted On: 11 Sep, 2013 Others में

मेरी कलम से !!कहते हैं जो गिरने से डरा नहीं करते, अक्सर वही आसमान को छु लिया करते हैं.........

Pradeep Kesarwani

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इस तथ्य से मे भी सहमत हूँ की हिन्दी बाजार कि भाषा हो गई हैं और दिन प्रतिदिन हिन्दी भाषा का दायरा संकुचित होता जा रहा हैं। और अंग्रेज़ी दिन प्रतिदिन पंख फैलाकर अपना दायरा बढ़ाती जा रही हैं और हमारे ऊपर हावी होती चली जा रही है, आज हम हिन्दी से ज्यादा अँग्रेजी भाषा बोलने मे फक्र महसूस करने लगे हैं । और मुछों पे ताव देते हैं की हमे अग्रेज़ी भाषा आती हैं। आज भले ही पूरे देश मे ४२ करोड़ से ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हो पर मन मे हिन्दी के प्रतीय वो इज्ज़त, वो समान्न खोता सा जा रहा हैं। कारण तो बहुत हैं पर मुख्य रूप से एक ही कारण जो मुझे लग रहा हैं वो हम हैं हमारे पूर्वज  थे जब हिन्दी भाषा का दमन हो रहा था तब कोई क्रांति क्यो नही आई, और आज जब हिन्दी भाषा खत्म होने के कगार पे आ खड़ी हुए हैं तो हम चुप क्यो हैं? आंदोलन तो हमेसा से होते आए हैं और होते भी रहेगे पर नतीजा आज भी दो राहे पर खड़ा हैं। शायद इसलिए की अँग्रेजी भाषा से होने वाले प्रतिबद्ध व्यवसाय या नौकरी की चाहत हमे कोई भी क्रांति लाने से रोक रही हैं अब तो बस इस जगह पे हम आके खड़े हो गए हैं कि आँख बंद करके चुपचाप हिन्दी भाषा के हो रहे अंतिम संस्कार को देखे और घर पर आकर सो जाएँ। अँग्रेजी भाषा का पाव इस कदर आगे कि ओर बढ़ता जा रहा हैं कि उसे रोकना मानो लोहे के चने चबाना जैसा हो गया हैं पहले तो सिर्फ प्राइवेट सैक्टर ही पूरी तरह से अंग्रेज़ी भाषा की गिरफ्त मे था पर अब ये पब्लिक सैक्टर पे भी हावी हो रहा हैं, अब तो साक्षत्कार मे पहले ही लिखा रहता हैं अग्रेज़ी भाषा अनिवार्य मतलब जो अग्रेज़ी भाषा बोलता हैं उसकी तो नौकरी पक्की नहीं तो बेरोजगारी भत्ते लेने के लिए लाइन लगाइए। अब इस परिस्थिति मे हिन्दी भाषा पनपे भी तो कैसे आज पूरे हिंदुस्तान मे साढ़े बारह करोड़ से भी ज्यादा लोग अग्रेज़ी बोलते हैं जो की पिछले दशको से बढ़ता ही चला आ रहा हैं कारण सिर्फ इतना की आय की स्रोत के लिए अँग्रेजी आना अनिवार्य हो गया हैं अब तो ये कहना गलत भी नही होगा कि हिन्दी भाषा गरीबो और अनपढों कि भाषा बन कर रह गई हैं। एक घटना याद आ रही हैं जब मैं विश्वविध्यालया मैं हमारे सभी सहपाठी गाव मैं पुनः सर्वेशण के लिए गए थे तभी एक गाँव के ही रहने वाला सज्जन नागरिक अपनी मोटर साइकल से आयें और आते ही हिन्दी के बजाए अँग्रेजी मे बात करने लगे और अपने घर ले गए और बताने लगे कि हमारे पास ये हैं – ये हैं और हम गाँव के काफी प्रबल लोगो मे से एक हैं । मैं उस समय समझ नही पाया इन सब का मतलब आज जाकर ये साफ हुआ कि वो आखिर मे कहना क्या चाहते थे यही कि मे अँग्रेजी भाषा जनता हूँ, इसलिए गरीब नही हूँ अनपढ़ नही हूँ। इस बात के साथ मे एक प्रोत्साहन हेतु कविता पेश कर रहा हूँ, उम्मीद हैं एक दिन हम इस तथ्य को झुठला देंगे की हिन्दी गरीबो की भाषा हैं।

“दमन चमन हुआ अंधकार

हिन्दी से अब किसको प्यार

उजड़ रहा हैं घरौंदा अपना

हम खड़े हैं पल्ला झाड़।

कुछ करना हैं कुछ बनाना हैं

तो ये सबको बतला दो

जो भटके हैं इस भवर मे,

हिन्दी उनको सिखलादों।

क्या है इज्ज़त क्या हैं सोहरत

जब भाषा का मोल नही

मत भूलो अपनी मात्र भाषा

क्योकि हिन्दी जैसा कोई बोल नही।

मत रूठो तुम मत टूटो तुम

अभी तो आगे बढ़ना हैं।

आपके इन हाथो से हमे,

अभी तो एक नया युग गढ़ना हैं”

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