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फिर फ़ेसबूक

Posted On: 9 Sep, 2013 Others में

मेरी कलम से !!कहते हैं जो गिरने से डरा नहीं करते, अक्सर वही आसमान को छु लिया करते हैं.........

Pradeep Kesarwani

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वैसे तो इस मुद्दे पर कई बार चर्चाए हो चुकी होंगी मगर साक्षरता दिवस के मौके पुनः ये चर्चा का विषय बन कर बैठ गया हैं आज लगभग पूरे हिंदुस्तान मे 7 करोड़ 10 लाख (आकड़ा विकिपीडिया से प्राप्त) लोग फेसबूक मे खाता खोले हुए हैं जो नियमित रूप से इस खाते को चलाते हैं और अपना मनोरंजन करते हैं अगर थोड़ा हट कर सोचे तो हर खाता धारक अगर एक दिन मे 1 मीनट भी अगर फेसबूक का उपयोग करता हैं तो लगभग 7 करोड़ 10 लाख मिनट  प्रति दिन मतलब 7 करोड़ 10 लाख भागे 60 मिनट (1 घंटा ) = 1183333.34 घंटा मतलब 1183333 घंटा भागे 24 घंटे = 49305.5 दिन मतलब  49305.5 दिन भागे 365 दिन = 135 साल से ज्यादा प्रति दिन हम लोग सिर्फ मनोरंजन करके खराब कर देते हैं, जब कुछ करने का समय हैं तो हम 135 साल प्रति दिन बिना किसी लज्जा के गर्व के साथ फेसबूक को दान कर देते हैं, और क्यो न करें हर नागरिक हो ये अधिकार हैं की वो अपनी मर्ज़ी से जी सकता हैं। मे हिंदुस्तानी हूँ और मुझे ये अधिकार हैं की मैं अपने हिंदुस्तानी भाइयो और बहनो को कुछ कह सकता हूँ, दूसरे देश के लोग क्या करते हैं ये मुझे मालूम नही हैं और मैंने प्रयत्न भी नही किया जानने को….. चलिये ये तो चलता ही रहेगा पर अगर हम हिंदुस्तानी यही सिर्फ एक मिनट श्रम दान कर दे तो 135 साल प्रति दिन हिंदुस्तान को मिल जाएंगे तो जरा सोचिए कौन सी ताकत है जो रोक सकती हैं भारत को डेवेलप्ड होने से फिर भी मैं जनता हूँ की ये सब युही ही चलता रहेगा क्योकि हमारे पास शायद वो मंच नही हैं जहां पर हम श्रम दान कर सके, और बनाना भी एक बहुत मुसकिल काम हैं और अगर बन भी गया तो कोई गारंटी नहीं हैं की कोई श्रम दान करें और अगर श्रम दान होने भी लगा तो यहा पर भी राजनीति छा जाएगी और फिर वही कचरा और वही गंदगी……….!!!!!!

अब जरा फ़ेसबूक के अंदर की बात करें तो ये सब जानते हैं कि फेसबूक  लड़कियो के शोषण को लेकर भी काफी चर्चित हुआ।  न जाने कितनी लड़कियों ने अपनी जान भी गवा दी और ना जाने कितनी लड़कियां शर्म की वजह से बातों को दबा भी दिया। आज कल फेसबूक पर काफी चर्चित विषय बना हुआ हिन्दू मुस्लिम जातिवाद अभी पिछले दिनो आजतक का पोस्ट पढ़ रहा था तो उसमे किसी मुस्लिम लड़के ने श्री हनुमान जी की चालीसा को गालियों से लिखा था जिसको हर मुस्लिम लड़का पसंद कर रहा था, फिर नीचे पढ़ा तो किसी हिन्दू लड़के ने अल्लाह के बारे मे गालियों से कुछ लिखा था जिसको हर हिन्दू लड़का पसंद कर रहा था पढ़ कर बढ़ा दुख हुआ जब मैंने थोड़ा और नीचे किया तो किसी हिन्दू लड़के ने एक फोटो कमेंट की थी जिसमे ये शब्द लिखे हुए थे “ ना हिन्दू है कोई, ना मुस्लिम है कोई, गर्व से कहो हम हिंदुस्तानी है “ यकीन नहीं मानेगे उसको रिप्लाइ मे काफी गालियां खाने को मिली जो हिन्दू भी दे रहा थे, और मुस्लिम भी तभी वो तंग आकार उस कमेंट को डिलीट कर दिया। मैंने जब सोचा तो ये समझ मे आया 135 साल प्रति दिन खराब करते हैं क्या इसके लिए की हिन्दू मुस्लिम को गाली दे सके और मुस्लिम हिन्दू को गाली दे सके क्या इसीलिए फेसबूक उपयोग करते हैं की अपने ही हिंदुस्तान मे हिन्दू मुस्लिम की दीवार खड़ी कर सकें? खैर ये तो रोज का ड्रामा हो गया हैं फिर भी अब अगर जरा गौर करें तो फ़ेसबूक ने फरवरी 2004 मे इंडिया मे कदम रखा (आकड़ा याहू से प्राप्त) तो सोच लीजिये तब से अगर यही 1 मिनट सही खबरों को आदान प्रदान करने मे लगाते तो सायद देश कहा से कहा पहुँच चुका होता। हम खुद ही जिम्मेदार हैं अपनी हर बरबादी के, जिसके कारण धीरे धीरे करके हमारा देश और भी पिछड़ा होता चला जा रहा हैं। मेरा तो सिर्फ इतना मानना हैं की “अपने घर की कचरे को स्वम साफ करिए देश खुद ब खुद साफ हो जाएगा”  चलिये ये भी चलता ही रहेगा अब थोड़ा फेसबूक को गहराई से समझा जाएँ

फेसबूक आज बहू चर्चित सार्वजनिक पन्ना बना हुआ हैं जो लगभग पूरी तरह से अँग्रेजी मे हैं हाँ ये अलग बात हैं फेसबूक मे आप हिन्दी भाषा का उपयोग खुल कर सकते हो, पर हिन्दी को यह पन्ना बढ़ावा नहीं देता बस कुछ ही जो इस पन्ने पर हिन्दी का दिया जलाते हैं नहीं तो लगभग 70 प्रतिशत से ज्यादा पोस्ट इंग्लिश मे होते हैं बाकी कुछ पोस्ट  दूसरी भाषाओं मे भी होते हैं, मतलब बिलकुल साफ हैं 135 साल (मतलब प्रति दिन) की मेहनत से निकला प्रताप प्रति दिन हम इंग्लिश माता के दर्शन करके प्रसाद के रूप मे ग्रहण करते हैं अब आप ही बताइये अगर सिर्फ फेसबूक से हम इंग्लिश के इतने करीब जा रहे हैं ये तो सिर्फ एक सुरुवात हैं हमारी मात्र भाषा का अस्तित्व मिटाने के लिए यहा तो और भी पीछे खड़े हैं जो हिन्दी को जर्जर और खोखली करते जा रहे हैं अब अगर एक उदाहरण ले तो सबसे पहले मैं हिंदुस्तान को ही दोषी मानूँगा आप सब जानते हैं की हिंदुस्तान ने पहले खोज इंजन (सर्च इंजिन इंडिया डॉट कॉम बनया लेकिन वो हिन्दी मे नही बल्कि इंग्लिश मे हैं यहा तक की उसमे कोई विकल्प भी नही हैं की भाषा को तुरंत हिन्दी मे कर सके। मतलब साफ हैं जब देश की पहली उपलब्धि इंग्लिश मे बनी हैं तो हिन्दी भाषा से कितना प्यार करते हैं साफ हो जाता हैं । लेकिन फिर भी ये सब चलता रहेगा क्या करें हमको आदत हो गई हैं इन सब की, कोई उपाए नही हैं सिर्फ ये मनाने के अलावा हम नए युग के चमक मे अंधे हो गए हैं और अब कुछ नही दिखता।

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