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हिन्दी समान्न्जनक भाषा पहले भी थी, अब भी हैं, और आगे भी रहेगी... "Contest"

Posted On: 15 Sep, 2013 Others में

मेरी कलम से !!कहते हैं जो गिरने से डरा नहीं करते, अक्सर वही आसमान को छु लिया करते हैं.........

Pradeep Kesarwani

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क्या हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्य धारा में लाई जा सकती है? अगर हां, तो किस प्रकार? अगर नहीं, तो क्यों नहीं?

हिन्दी समान्न्जनक भाषा पहले भी थी अब भी हैं और आगे भी रहेगी, अगर बात करें क्या हिन्दी-भाषा  मुख्य धारा मे लाई जा सकती है? तो अभी तक के अनुभव से यही सीख मिलती हैं की हिन्दी-भाषा को मुख्य धारा मे लाना आज के संदर्भ मे असंभव सा लग रहा हैं जब भाषा बोलने मे शर्म आने लगे तब उसपर कुछ भी टिप्पड़ी करना भाषा की बेज्जती करना होगा। हाँ ये मैं जरूर कहूँगा की समय समय पर भाषा को प्रोत्शाहन  देने हेतु प्रतियोगिताएं व  आंदोलन भी होते रहे  हैं। अगर आज से संदर्भ मे देखे तो हिन्दी ब्लॉगिंग बहुत ही चर्चित विषय बन गया हैं, पूर्ण हिन्दी मे वार्ता, सूचनाओ का आदान प्रदान व प्रतिकृया पूर्णा रूप से हिन्दी मे होने लगी हैं बल्कि अब तो सोसियल साइट भी हिन्दी-भाषा को बढ़ावा दे रहे हैं, गाँव-2 मे इंटरनेट की व्यवस्था भी हो रही हैं, ई-चौपाल इसका मुख्य उदाहरण हैं जिसके जरिये हम  किसान भाइयो की बात को सुन सकते हैं। इंटरनेट के जरिये हम किसी भी भाषा को अपनी मात्र-भाषा मे बदल कर पढ़ भी सकते हैं, काफी कुछ बदलाओ आया हैं, परंतु इसका मतलब ये नहीं है की हिन्दी-भाषा मुख्य धारा मे बहने के लिए तैयार खड़ी हैं, मेरी समझ से ये सिर्फ हिन्दी को प्रोत्शाहन देना मात्र हैं।

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अगर मुख्य धारा की बात करे तो मेरी समझ से पूर्ण रूप से उसी भाषा का उपयोग हो, चाहे वो पढ़ाई के क्षेत्र मे हो, व्यवसाय के क्षेत्र मे हो, नौकरी पाने के लिए हो या अन्य। जैसा की चीन और जापान मे होता हैं…………..

सन 1991 मे औद्योगिक नीति का आगमन  तथा 1992 मे SEBI के बाद हिंदुस्तान मे पूर्णा रूप से सभी व्यवसाय अँग्रेजी-भाषा मे होने लगे, आज देश मे लगभग लाखो इंजीनियर, एमबीए, एमसीए, एमएससी, पीडीएच, डॉक्टर, सीए  इत्यादि अपनी शिक्षा अँग्रेजी-भाषा मे प्राप्त करते हैं, लाखो लोग प्रति वर्ष नौकरी के लिए प्रस्तावित होते हैं जिनका साक्षात्कार और कार्य अँग्रेजी-भाषा माध्यम से करते  हैं। अगर हिन्दी-भाषा को मुख्य धारा मे लाने के लिए सोचे तो सबसे पहले हिंदुस्तान मे हिन्दी माध्यम से शिक्षा होनी चाहिए, फिर व्यापार पूर्ण रूप से हिन्दी माध्यम से होना चाहिए, और फिर नौकरी मे साक्षात्कार और उनके कार्य पूर्ण रूप से हिन्दी-भाषा मे होने चाहिए, इसका मतलब हिंदुस्तान को एक नए सिस्टम की शुरवात, नए स्तर से करनी होगी……. कुछ सवाल मैं पूछना चाहूँगा सभी पाठको से

  1. क्या ये संभव हैं ????
  2. हिंदुस्तान मे 1000 से ज्यादा कंपनिया विदेशी हैं क्या वो हिन्दी-भाषा मे कार्य कर पाएँगी ????
  3. क्या जो बच्चे विदेश से पढ़ने आते हैं वो हिन्दी-भाषा मे पढ़ाई कर सकेंगे?? अगर नहीं? तो क्या उनके लिए उनकी भाषा मे पढ़ाई का मध्यम बनाना होगा???
  4. आज हिंदुस्तान मे एक बलात्कारी को सज़ा मिलने मे 9 महिना लग जाता हैं, वहाँ क्या ऐसे नए सिस्टम की उम्मीद की जा सकती हैं ????
  5. क्या नई पीढ़ी इस माध्यम को स्वीकार कर पाएगी???

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अग्रेज़ी-भाषा ने तो आज़ादी से पहले ही अपना दबदबा बना लिया था, उसी समय जिसको अँग्रेजी आती थी वो अच्छी नौकरी अंग्रेज़ो के काफिलो मे पा जाया करता था, उस समय भी वही बात थी की अच्छी आय का स्रोत केवल अग्रेज़ी-भाषा से मिलता हैं और आज भी वही युग है की अगर अँग्रेजी-भाषा आती हैं तो आप पैसे कमा सकते हैं। नहीं तो हिन्दी-भाषा मे तो भिखारी भी भीख मांगता हैं…. माफ करिएगा मैं भाषा का अपमान नहीं कर रहा हूँ, बस जो सच है वो कह करा हूँ। क्योकि हिन्दी-भाषा से अपने ही देश मे कोई आय का स्रोत का माध्यम नहीं दिया गया  हैं तो हम क्या करें। भीख मांगे या अंगेजी शीखे??

हिन्दी प्रोतशाहन हेतु एक कविता लिखी हैं, उम्मीद हैं “हम होंगे कामयाब एक दिन”

माँ की लोरी मे हूँ।

दूध की कटोरी मे हूँ।

पहले चले कदम मे हूँ।

पैजनियों की छमछम मे हूँ।

विध्यालय की पहली कक्षा मे हूँ।

परीक्षा फल की प्रतीक्षा मे हूँ।

खेल कूद हर उमंग मे हूँ।

प्यार करने वालों के संग मे हूँ।

शादी मे सज़े, हर रंगोली मे हूँ।

संग जो जा रही दुल्हन, उसकी डोली मे हूँ।

कामयाबी के हर चरण मे हूँ ।

जिंदगी से मिले हर स्मरण मे हूँ।

तेरे नए घर की, हर ईंटों मे हूँ।

तेरी हर हार, और जीतो मे हूँ।

तेरी बुढ़ापे की लाठी मे हूँ।

तेरी कंधो की झुकी, काठी मे हूँ।

तेरी काँपती उंगली मे हूँ।

मोह माया से दूर, तेरे दिल मे हूँ।

मरने पे तेरे मुह से निकले, उस राम मे हूँ।

तिथ्थि पे लिटाकर तुझे देते, आखिरी सलाम मे हूँ।

जलती तेरी उस चिता मे हूँ।

तेरे शोक मे निकले, हर आह मे हूँ।

तेरी तेरवी मे किए हर रीति रिवाज मे हूँ।

मैं कल भी थी, मैं आज भी हूँ।

मैं हिन्दी हूँ तेरी माँ !!!!!

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