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प्राथमिक विद्यालयों के नौनिहाल और कोरोना महामारी

Posted On: 3 May, 2020 Common Man Issues में

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कोरोना वॉरियर्स बनने की मुहिम में उत्तराखंड के 6.45 लाख लोगों का ऑनलाइन पंजीकरण करवाना काबिल ए तारीफ है। केंद्र, राज्य और जनता के संयुक्त प्रयास से आज उत्तराखंड बहुत अच्छी स्थिति में है, यहां मात्र 1 ही जिला रेड जोन में है। उत्तराखंड में कोरोना संक्रमण दर घटकर 0.98% और रिकवरी रेट बढ़कर 65.45% पहुंच गया है।

 

 

 

अपने जन्म से ही उत्तराखंड पलायन से परेशान रहा है तथा रोजगार और शिक्षा दो ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर पलायन अधिकांशतः निर्भर करता है । 1.10 करोड़ से अधिक राज्य की जनसंख्या, कोरोना के चलते उत्तराखंड में लगभग 1 लाख से अधिक लोग रिवर्स पलायन करके वापस आये हैं और लांकडाउन में मिल रही छूट के साथ-साथ भारी संख्या में लोगों का वापस आना शुरू हो चुका है। वापस आए अधिकांश लोग अब राज्य में ही रुकने के लिए मजबूर हैं, उनके गुजर-बसर के लिए सरकार द्वारा टास्क फोर्स बनाकर स्वरोजगार उपलब्ध कराने की मुहिम सराहनीय है परन्तु फिर भी वापस आए मजबूर लोग, राज्य की ग्रामीण पृष्ठभूमि और कोरोना की मार से आने वाले समय में आर्थिक रूप से इतनेेेे सक्षम नहीं पाएंगे कि निजी विद्यालयों के तमाम खर्चे वहन कर सकें, परिवार के भरण-पोषण के साथ-साथ आनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन और रिचार्ज का खर्चा वहन कर सकें, ऐसे में गरीबों की प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी विद्यालयों का ही एकमात्र विकल्प रहता है जबकि संपन्न वर्गों के लिए सरकारी एवं निजी दोनों विद्यालयों के रास्तेे हमेशा खुले रहते हैं।

 

 

राज्य के 14 हजार सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में गरीब तबके के लगभग 4.50 लाख नौनिहाल पिछले 3 सालों से शिक्षकों की राह देख रहे हैं, पर्याप्त मात्रा में शिक्षक ना होने की वजह से शिक्षा से समझौता कर रहे हैं, जनता कोरोना की मार से आर्थिक रूप से घायल है और वर्तमान परिस्थितियां सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन संख्या बढ़ने की ओर इशारा कर रही हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21(क) जो 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था के लिए भी कहते हैं।

 

राज्य में लॉकडाउन के दौरान भी रिटायरमेंट और पदोन्नति जैसे अन्य कार्य तेजी से हो रहे हैं, अब तो सरकार ने लाकडाउन से छूट भी बढ़ा दी है। जुलाई 2017 से अब तक, पिछले लगभग 3 वर्षों में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी, रिटायरमेंट और प्रमोशन से कुल मिलाकर 3000 से अधिक प्राथमिक शिक्षक के पद रिक्त हो चुके हैं, ऐसे में विशिष्ट राज्य उत्तराखंड के गरीब बच्चे सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी के कारण प्राथमिक शिक्षा से वंचित हो रहे हैं ।

 

 

यदि प्राथमिक विद्यालयों के खुलने से पहले-पहले शिक्षकों की अच्छी-खासी संख्या में नियुक्ति होती है, तो पलायन रोकना सही मायनों में न्यायसंगत होगा, सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की घटती छात्र संख्या में वृद्धि होगी, लंबे समय से चला आ रहा सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में ताला लगने का सिलसिला भी रुकेगा और प्राथमिक विद्यालयों के गरीब बच्चे भी शिक्षकों की सहायता से खुशहाल भारत के सपने को साकार करने के लिए देश और अपने भविष्य का निर्माण कर सकेंगे।

मदन सिंह फर्त्याल
अल्मोड़ा,उत्तराखंड

 

 

 

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

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