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योजनाओं के प्रभाव और मुद्दों के अभाव में लड़ रही कांग्रेस, म.प्र.चुनाव

Posted On: 21 Nov, 2013 Others में

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praveengugnani

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योजनाओं के प्रभाव और मुद्दों के अभाव में लड़ रही कांग्रेस, म.प्र.चुनाव

लोकतंत्र में सरकार के कार्यकाल के पांच वर्षों में किये करणीय और अकरणीय कार्य ही आनें वाले चुनाव में मुद्दों का निर्माण करते हैं. किसी भी सरकार का पांच वर्षों का रिपोर्ट कार्ड ही तय करता है कि आनें वाले चुनाव में जनता के सामनें मुद्दें क्या और कैसे होंगे? देश के पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में एक महत्वपूर्ण प्रदेश मध्यप्रदेश है जहां से पुरे देश की राजनीति में सन्देश अन्तर्प्रवाहित होते हैं. अनेकों समस्याओं जैसे निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी और उद्योग धंधों के अभावों में पल रहा या म.प्र. पिछले दस वर्षों से भाजपा शासित रहा है. छत्तीसगढ़ के गठन के बाद कहा जानें लगा था कि म.प्र. के अधिकाँश प्राकृतिक संसाधन, खदानें, उद्योग और विशाल परियोजनाओं के बिना म.प्र. अब एक बीमारू और पिछड़ा प्रदेश कहलानें लगेगा. प्रारम्भ के पांच सात वर्षों में यह सोच चरितार्थ भी होती दिख रही थी. किन्तु बाद के एक दशक में पिछड़ेपन की ओर बढ़ते म.प्र. के कदम संयोग वश विकास की ओर तेजी से दौड़ने लगे, और कथित तौर पर चुनावी मुद्दों में सरकार विरोधी मुद्दों का अभाव हो गया.

वर्तमान में जबकि म.प्र. में चुनाव अभियान अपनें चरमोत्कर्ष पर है यह स्पष्ट लगनें लगा है कि म.प्र. में प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका एक दशक से निभा रहे दल कांग्रेस के पास मुद्दों का अभाव हो गया है. एक दशक से विपक्ष में बैठी कांग्रेस चुनाव पूर्व के कुछ महीनों में बड़ा दम भर रही थी व प्रदेश की जनता सहित अपनें छोटे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भी गुमराह करती रही थी कि विधानसभा चुनाव के समय वह भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह व उनकें सहयोगी मंत्रियों के विरूद्ध बड़े रहस्योद्घाटन करेगी और भ्रष्टाचार के बड़े बड़े किस्से जनता को सुनाएंगी किन्तु ऐसा कुछ नहीं हो पा रहा है. जनता को तो जैसे कांग्रेस के इस बड़बोले पन पर यकीन ही नहीं था और वह प्रदेश में नई नई जनहितकारी योजनाओं के वाहक शिवराज सिंह पर पूर्ण भरोसा बनाए हुए थी किन्तु कांग्रेस के छोटे कार्यकर्ताओं को ऐसा नहीं लग रहा था. कांग्रेस को छोटा और मझोला कार्यकर्ता अपनें प्रदेश और केन्द्रीय नेताओं की बात पर विश्वासजमायें बैठा था कि चुनाव के समय कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा के म.प्र. के मंत्रिमंडल और शिवराज सिंह के विरूद्ध आरोपों का भानुमती पिटारा खोल देंगे; अब उसका भरोसा और धेर्य टूट रहा है. कांग्रेस के बड़े नेता इस विषय में एक रणनीतिक चुक कर गएँ हैं और उनके मझोले और छोटे स्तर के नेता और कार्यकर्ता दोनों ही अब प्रतीक्षा करते करते कोमा में आ गए लगते हैं. म.प्र. के राजनैतिक परिदृश्य में जिलों और उसके नीचे स्तर पर कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास का स्तर निरंतर नीचें गिरता नजर आ रहा है और कांग्रेस के बड़े नेता उसे संभाल पानें की विचार-योजना भी नहीं बना पा रहे हैं. इस परिस्थिति का एक बड़ा राजनैतिक लाभ सत्तारूढ़ भाजपा को इस रूप में मिल रहा है कि प्रत्येक विधानसभा में सेकड़ों की संख्या में छोटे बड़े कांग्रेसी नेता कांग्रेस से निराश होकर भाजपा की ओर रूख करनें लगें हैं और भाजपा में प्रवेश लेनें लगें हैं. एन चुनाव की पूर्वसंध्या पर इस प्रकार के पलायन से कांग्रेस के पूर्व में ही कमजोर चुनाव अभियान को बड़ा झटका लग रहा है. मालवा, विन्ध्याचल, महाकौशल, चम्बल, निमाड़, नर्मदापुरम सभी अंचलों में कांग्रेस से पलायन का यह सिलसिला थमता नहीं नजर आ रहा है. वस्तुतः म.प्र. में यह एक स्थापित तथ्य हो चला है कि शिवराज सिंह चौहान एक ब्रांड है जो चल रहा है और जिसके विषय में जनता केवल अच्छा ही सुनना बोलना चाहती है. शिवराज के शासन काल में लाइ गई योजनायें और इन योजनाओं का क्रियान्वयन, प्रचार और सफलता के ईमानदार प्रयास म.प्र. में राजनीति को मुद्दा विहीन बना चुकें हैं. अब हाल यह है कि विधानसभा चुनावों के समय बड़े बड़े घोटालों का पर्दाफ़ाश करनें का वादा करके अपनें कार्यकर्ताओं और दल में झूठा आत्मविश्वास उत्पन्न करनें वालें कांग्रेसी नेता व्यर्थ के मुद्दों को हवा देकर अपनी भद्द पिटवा रहे हैं. हाल ही में भाजपा के प्रचार साहित्य पर प्रिंटेड कुछ फोटोग्राफ्स की आलोचना करके कांग्रेस की हालत सांप छछूंदर जैसी हो गई जब भाजपा के नेताओं ने यह स्पष्ट कह दिया कि यह हमारी योजनाओं के प्रोजेक्शन का चित्र है.

इस प्रकार की निरर्थक आलोचनाएँ असर नहीं कर पा रही हैं क्योकि देश की कई विधिमान्य विधायी संस्थाएं, प्रशासनिक अकादमियां और न्यायिक संस्थान भी म.प्र. की भाजपा सरकार की प्रशंसा कर चुकें हैं. विधानसभा चुनावों में नेतृत्व कर रहे शिवराज सिंह की योजनाओं को एक बड़ी स्वीकार्यता तब मिली थी जब स्वयं मान. उच्चतम न्यायालय यानि सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी, 2012 में म.प्र. में जनहितकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर एक दायर एक वाद में राज्य के शिवराज सिंह चौहान की सरकार की प्रशंसा की थी. भारत कि सर्वोच्च अदालत ने राज्य में सर्दी में बेसहारा लोगों के लिये रैन-बसेरों की व्यवस्था के मामले में राज्य सरकार के काम को सराहा था. इसके पूर्व भी सुप्रीम कोर्ट ने ने राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करने पर मध्यप्रदेश सरकार को सराहा था.  कोर्ट ने राज्य सरकार के काम की सराहना करते हुए कहा कि दूसरे राज्यों को इससे नसीहत लेनी चाहिये और न्यायिक आदेशों पर अमल की पुष्टि के लिये म.प्र. की शिवराज सिंह सरकार के कार्यों को एक उदाहरण के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए.  केवल देश में ही नहीं विदेशों में भी और पाकिस्तान जैसे परम्परागत आलोचक राष्ट्र पाकिस्तान में भी शिवराज की योजनाओं को उदाहरण के रूप में लिया जा रहा है. पाकिस्तान के जाने-माने मीडिया समूह डान से जुड़ी पत्रकार सोफिया जमाल ने चौहान के नेतृत्व में बेटी बचाओ अभियान को एक बेहद महत्वाकांक्षी अभियान कहते हुए इसे महिला अधिकारों की दिशा में मील का पत्थर की संज्ञा दी थी. इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्था यूनिसेफ ने भी इस “बेटी बचाओ” योजना के विषय में प्रशंसा व्यक्त की है. इस अभियान के विषय में यूनिसेफ के स्टेट हेड श्री एडवर्ड बिडर ने इसे सम्पूर्ण विश्व के लिए सीख लेनें और महिला अधिकारों की स्थापना के अभियान का अनिवार्य भाग बताया था. भाजपा के नेता अपनें चुनावी अभियान में इन बातों के साथ इस बात का जिक्र करना भी नहीं भूलतें हैं कि केन्द्रीय योजना आयोग के सदस्य डा. नरेन्द्र जाधव ने मध्यप्रदेश में रोजगारोन्मुखी शिक्षा और प्रशिक्षण सुविधाओं के विस्तार के साथ ही परम्परागत कारीगरों के कौशल उन्नयन की दिशा में किये जा रहे प्रयासों की भूरी भूरी प्रशंसा की थी, वे यह भी बतातें हैं कि केन्द्रीय स्वास्थ्य सचिव सुश्री सुजाता राव ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में किये जा रहे म.प्र. सरकार के दृढ़ संकल्पित कार्यों से पुरे राष्ट्र के स्वास्थ्य सूचकांक में आशाजनक सुधार आनें की बात स्वीकारी थी.

सब मिलाकर म.प्र. विधानसभा का यह चुनाव अभियान अपनें अंतिम तीन दिनों में भाजपाई उत्साह और आत्मविश्वास को और कांग्रेसी निराशा और दिशाहीनता को प्रदर्शित कर रहा है, हाँ कांग्रेस अब भी नए नए मुद्दें तो ला ही रही है किन्तु जनता इन तथ्यहीन आरोपों और विषयों को सुननें और समझनें को तैयार होनें की मानसिकता में आती नहीं दिख रही है.

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