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राजनाथ की माफ़ी और उदितराज का रामराज की ओर बढ़ना

Posted On: 27 Feb, 2014 Others में

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राजनाथ की माफ़ी और उदितराज का रामराज की ओर बढ़ना

राजनाथ की माफ़ी और उदितराज का रामराज की ओर बढ़ना

पिछले दिनों की राजनीति को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ जी के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो दो उल्लेखनीय घटनाएं घटी न. १- राजनाथ सिंग का देश के मुस्लिम समाज से माफ़ी मांगनें की चर्चा करके बर्र के छत्ते में हाथ डालनें का प्रयत्न. घटना क्र.२- दलित चिन्तक और विचारक उदितराज का उनकी उपस्थिति में भाजपा प्रवेश.

पिछले दिनों जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुस्लिम समुदाय से शीश झुकाकर क्षमा मांगनें को प्रस्तुत हुए तब लगा कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व वैचारिक धुंध का ही नहीं बल्कि वैचारिक अंधत्व का शिकार हो चूका हैं. प्रश्न यह नहीं है कि वे मुस्लिम समुदाय से गुजरात के मुद्दे पर क्षमा मांगना चाह रहें हैं या अन्य मुद्दों पर – प्रश्न यह है की इस देश में तुष्टिकरण की राजनीति पर क्या भाजपा में  चरित्रगत परिवर्तन आ चुका है या भाजपा के डी एन ए में कांग्रेसी राजनीति के जीन्स आ चुकें हैं? राजनाथ सिंग का यह कहना कि “यदि हमसें कोई गलती हुई है तो वे क्षमा हेतु प्रस्तुत है” केवल एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को क्षमा हेतु प्रस्तुत नहीं कर रहा है, ना ही भाजपा नेतृत्व का यह कथन केवल भाजपा को ही क्षमा हेतु प्रस्तुत नहीं कर रहा है बल्कि यहाँ तो उन्होंने एक पुरे के पुरे राष्ट्रवादी विचार को ही सांगोपांग रूप में क्षमा हेतु प्रस्तुत कर दिया है!! यह देश आज पूछना चाहता है की राजनाथ सिंग की भाजपा आखिर आज किस बात की माफ़ी मांगनें को झुक झुक कर अपनी पीठ गोल करती जा रही है? देश में तेजी से विकसित होता राष्ट्रवादी लोगों का एक बड़ा वर्ग राजनाथ सिंग से पूछना चाहता है कि माफ़ी मांगनें से प्रारम्भ हुआ तुष्टिकरण का यह अभियान भाजपा की राजनीति को फिसलन की किस हद तक लेकर जाएगा?? राजनाथ सिंग आज बताएं कि इस देश में हिन्दुओं के आचार-विचार-विहार और धर्म-आस्था-मान्यता-प्रतीक चिन्हों के साथ जो लक्षाधिक खिलवाड़ और अपराध हुयें हैं उनके सम्बन्ध में माफ़ी मांगनें के लिए वे किसके समक्ष मांग करेंगे और किसके ऊपर दबाव बनाना चाहेंगे??? दीवार फिल्म की तर्ज पर ही सही किन्तु यह तो कहना ही होगा कि जाओ पहले साबरमती एक्सप्रेस के हत्यारों से माफ़ी मंगवा आओ!!

आज जब राजनाथ सिंग केवल दिल्ली की गद्दी हेतु माफ़ी मांगनें को उद्दृत हो गएँ हैं तो उन्हें और उनके इस माफ़ी वाले विचार के पीछे खड़े भाजपा के लोगों को स्मरण रखना चाहिए की किस प्रकार एक समय में यह भाजपा राम मंदिर निर्माण को लेकर पुरे देश में रथ लेकर वोटों की भिक्षा मांगती घूमी थी और जनमत ने उन्हें राम मंदिर के विचार पर ही अपने सर आँखों पर बैठा लिया था! माफ़ी मांगनें को उद्धृत भाजपा को माफ़ी मांगनें के लिए वह क्षण स्मरण में आना चाहिए जब इसी भाजपा के कर्ण धारों ने सम्पूर्ण भारत में गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध को अपना लक्ष्य माना था!! माफ़ी मांगनें को उद्धृत भाजपा सर्वप्रथम अयोध्या में टाट-तिरपाल के नीचें विराजे रामलला से क्षमा मांग ले और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम उसे क्षमा कर दे, तभी वह किसी अन्य से क्षमा दान ले पाएगी!!!

पूरा देश आश्चर्य चकित है कि आज जब सम्पूर्ण राष्ट्र नरेन्द्र मोदी के पीछे खड़ा है और उनके राष्ट्रवादी विचार को अपनी भाग्य रेखा माननें को तैयार है तब कभी भाजपा का कोई धड़ा, कभी स्वयं नरेन्द्र मोदी और अब राजनाथ सिंग दिशा भ्रम का शिकार क्यों हो रहें हैं? उन्हें समझ लेना चाहिए की धारा ३७० का उन्मूलन, समान नागरिक संहिता जैसे विचार ही उसके ईंधन स्त्रोत रहें हैं, बाकी तो सभी स्खलन-छलावा और ऊर्जा का अपव्यय मात्र ही हैं. संक्षेप में यह कि- दृष्टि, दिशा और मति भ्रम की शिकार हो चली भाजपा को यह कब समझ में आयेगा की “परंवैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रं”  निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित कार्य-शक्ति का विचार और महामङ्गले पुण्यभूमे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते का भाव अर्थात  हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन हजार- का विचार ही उसे सत्ता शिखर पर आसीन करा पायेगा??

घटना क्र.२- प्रसिद्द और संवेदनशील दलित चिन्तक उदितराज का भाजपा प्रवेश-

भारतीय समाज और राजनीति में में दलित-आरक्षण-मनुवादी-जयभीम-नवबौद्ध- ऐसे शब्द हैं जिन पर गहन-समग्र-व्यापक चिंतन मनन के साथ एक नए प्रयोग की आवश्यकता हो गई है. प्रसिद्द दलित चिन्तक-विचारक डा. उदितराज के भाजपा प्रवेश से एक अनूठा प्रयोग प्रारम्भ हो रहा है. इस अनूठे प्रयोग को शुभ-मंगल कामनाएं और दलित चिंतन के समग्र राष्ट्रवादी हो जानें हेतु – जय श्री राम – जय भीम तो कहा ही जाना चाहिए. देश की दलित वर्गीय राजनीति और इसके समाजविज्ञान को यदि हम दो भागो में बांटे तो वह लगभग इस प्रकार होगा की भगवान् बुद्ध, संत कबीर, महात्मा फुले, महासंत पेरियार तथा युगदृष्टा अम्बेडकर से प्रारम्भ हुआ भारतीय दलित चिंतन कई बार एतिहासिक रूप से दुर्घटनाओं से बचा और स्वातंत्र्योत्तर समय में बाबा साहेब आंबेडकर के विराट चिंतन के कारण अपनें सनातनी स्वरुप में (विरोधाभासों के बाद भी) बना रहा या यूं कहें कि उसके मूल में हिंदुत्व का सूक्ष्म वास अक्षुण्ण रहा. दूसरे भाग की दलित राजनीति की बात करें तो इसमें मायावती हो दया पंवार हो या नामदेव ढसाल, संघप्रिय गौतम, बुद्धप्रिय मौर्य अथवा अब रामदास अठावले, जगजीवन राम, रामविलास पासवान एंड फेमिली तथा उदित राज जैसे नेता आते हैं. ये सभी अपनी दलित समाज केन्द्रित राजनीति को अपनी अपनी सुविधा के अनुसार ही शब्दावली भी देते रहे और परिभाषाएं भी और रणनीति भी. इस क्रम में भाजपा का दलित चिंतन सदैव राष्ट्रवादी होकर समग्र और समता मूलक समाज की राजनीति में रुचि लेता रहा है. प्रसिद्द दलित चिन्तक और बाद में इस चिंतन को इन्डियन जस्टिस पार्टी नामक राजनैतिक ईकाई के रूप में ढाल चुके उदितराज का नाम इस देश में कोई नया नाम नहीं है. किन्तु यह नाम “उदितराज” जब उल्लेख और चर्चा में आता है तो एक चर्चा अवश्य ही इनकें नाम के साथ ही होनें लगती है कि इनका नाम इनके माता पिता ने रामराज रखा था किन्तु सुविधाजनक दलित चिंतन के चलते इन्होनें अपने नाम “रामराज” में राम शब्द को आपत्तिजनक और हिन्दुबोधक मानते हुए अपना सर मुंडवाया और स्वयं का नाम बदलकर उदितराज रख लिया. राम नाम के सहारे ही दिल्ली की ओर बढ़ते भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंग ने जब उदितराज का भाजपा में यज्ञोपवीत संस्कार कराया तब एकाएक ही इस देश के कई राजनीतिज्ञों और समाज विज्ञानियों के मष्तिष्क में कई नए पुरानें किस्से-बयान और घटनाएं घुमड़ने लगी थी. खैर अब जब भाजपा दिल्ली की ओर बढ़ चली है और देश में दलित चिंतन और राजनीति भी नई करवटें ले रही है तब इस प्रयोग को सामयिक ही माना जाना चाहिए. नव बोद्धों और बामसेफ के कार्यकर्ताओं में जिस प्रकार का साहित्य प्रचलन में है वह इस देश की सामाजिक समरसता और इस देश के सनातनी डी एन ए से भिन्न ध्रुव का साहित्य ही माना जा सकता है. इसी प्रकार स्वार्थी उद्देश्यों वाला और उत्तेजित भर कर देनें वाला दलित चिंतन और राजनीति देश के दलित समाज के युवाओं की मानसिकता को जिस प्रतिकूल दिशा में ले जा रही थी उस स्थिति में भाजपा और उदितराज का यह नया किन्तु अनूठा प्रयोग शुभ सकेंत देनें वाला ही है और इसके परिणाम भी सुखद-समृद्ध और सम्पन्नता से लबालब आयेंगे ऐसी शुभ-मंगल कामना करनें में ही लेखकीय दायित्व पूर्ण होता दिखता है. उदितराज भी अपनें इस नए रूप में अपनें इतिहास से इतर एक एतिहासिक भूमिका निभाकर देश के सांस्कृतिक भविष्य को दलित समाज के साथ समग्रता से साध पायेंगे और इस प्रयोग को सफल बनायेंगे यही आशा है.

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