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संघ के शिविरों में राष्ट्रवाद के साथ विकास का ब्लूप्रिंट तैयार होता है

Posted On: 21 Jan, 2013 Others में

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aप्रवीण गुगनानी,47,टैगोर वार्ड,गंज बैतूल.म.प्र.09425002270guni_pra@rediffmail.com प्रधान सम्पादक दैनिक मत समाचार पत्र    

संघ शिविरों में बनता है राष्ट्रवाद के साथ विकास का ब्लूप्रिंट

संघ के विषय में गांधी-नेहरु के विचार पढना चाहिए शिंदे को

जयपुर में संपन्न कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन में जब कांग्रेस नेता सुशिल शिंदे ने व्यक्तव्य दिया कि आर एस एस और भाजपा के शिविरों में आतंकवादी प्रशिक्षण दिया जा रहा है तो लगा कि वे अपनें आलाकमान को प्रसन्न करनें और बड़ी लाइन खीचनें बोलनें मात्र के चक्कर में यह भूल गएँ हैं कि वे (दुर्योग से)भारत के केन्द्रीय गृह मंत्री भी है और उन्हें कोई ऐसा बचकाना किन्तु संवेदनशील बयान नहीं देना चाहिए जिसकी असंतुलित प्रतिक्रया हो जानें की आशंका हो. तथाकथित छदम धर्मनिरपेक्षता वादी नेताओं का संघ परिवार को कोसना कोई नया चलन नहीं है, अक्सर ही कोई भी नेता अपनें आपको सुर्ख़ियों में लानें और समाचारपत्रों में स्थान पा लेनें के मोह भर के कारण ऐसे उल जुलूल, भ्रामक, जहरीले किन्तु मुर्खतापूर्ण बयान देकर वितंडा खड़ा करता  रहता है निस्संदेह शिंदे का यह व्यक्तव्य उसी श्रंखला का एक थोथा और खोखला भाग भर है. इस प्रकार के व्यक्तव्य देनें वालें नेताओं और मंत्रियों को संघ के विषय में जान पढ़ लेना चाहिए और व्यर्थ का वितंडावाद खड़ा करनें के स्थान पर समाज में अपनी भूमिका को संघ की ही भांति संपुष्ट करनें में ध्यान लगाना चाहिए. भगवा आतंकवाद का नया प्रपंचकारी शब्द गढ़नें वाले कांग्रेसियों और तथाकथित छदम(सूडो) धर्मनिरपेक्षतावादी नेताओं को जो सतत अकबरुद्दीन ओवेसियों को जन्म देनें के सिवा कुछ नहीं कर पा रहें हैं; इस राष्ट्र को जवाब देना होगा कि भगवा या हिन्दू आतंकवाद है कहाँ? आयातित मानसिकता के इन नेताओं को अब संघ विचार से परिचित हो जाना चाहिए..

आर एस एस के विषय में अनर्गल प्रलाप करनें और छाती पीटने वालों को पता होना चाहिए कि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्‍थापना सन् 27 सितंबर 1925 को  विजय दशमी के दिन  नागपुर में डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार ने पांच स्वयंसेवकों के साथ की थी वह आज 50 हजार से अधिक शाखाओ के माध्यम से राष्ट्र जागरण का अद्भुत काम खड़ा कर चुका है उसके करोडो स्वयंसेवक समाज को अपनें कृतित्व से सम्पूर्ण भारतीय समाज को चमत्कृत और झंकृत कर रहें हैं. संघ की विचार धारा में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, राम जन्मभूमि, अखंड भारत, गौ-रक्षा, गंगा रक्षा, जम्मू-काश्मीर, पूर्वोत्तर के राज्य, समान नागरिक संहिता जैसे विषय है जिन पर वह लगातार चिंतन मनन और अध्ययन के माध्यम से काम कर रहा है और ये काम संघ के उन शिविरों में ही हो रहा है जिनकें विषय में सुशिल शिंदें ने नाग की भांति जहर उगला है. संघ ने कई आयाम स्थापित किये हैं और राष्ट्रीय आपदा के समय संघ कभी यह नही देखता‍ कि किसकी आपदा मे फसा हुआ व्‍यक्ति किस धर्म का है! आपदा के समय संघ केवल और केवल राष्ट्र धर्म का पालन करता है!! संघ यह कभी नहीं देखता कि आपत्ति या संकट में फंसा व्यक्ति किस समाज और धर्मं का है. गुजरात में आये भूकम्प और सुनामी जैसी घटनाओ के समय सबसे आगे अगर किसी ने राहत कार्य किया तो वह संघ का स्‍वयंसेवक था!!! संघ के प्रकल्पो ने देश को नई गति दी है, और इसकी बड़ी लम्बी गाथा है.

संघ परिवार की ही संस्था दीन दयाल शोध संस्थान ने गांवों को स्वावलंबी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई और इस पर सतत कार्य करते हुए इसनें अपनी योजना के अंतगत करीब 80 ग्रामों में यह लक्ष्य पूर्ण कर लिया और करीब 500 ग्रामों का लक्ष्य पूर्ण करनें की ओर अग्रसर है. दीन दयाल शोध संस्थान के इस प्रकल्प में संघ के हजारों स्‍वयंसेवक बिना कोई वेतन लिए मिशन मानकर अपने अभियान मे लगे है. सम्‍पूर्ण राष्‍ट्र में संघ के विभिन्‍न अनुसांगिक संगठनो राष्ट्रीय सेविका समिति, विश्व हिंदू परिषद, हिन्दू हेल्पलाइन, भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, भारतीय मजदूर संघ, शिक्षक संघ, हिंदू स्वयंसेवक संघ, हिन्दू विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, बालगोकुलम, विद्या भारती, भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम सहित ऐसे संगठन कार्यरत है जो करीब 1 लाख प्रकल्‍पो को गति देकर राष्ट्र जागरण और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में कार्य करते हुए इस राष्ट्र को अद्भुत शक्ति दे रहें हैं.

भारत के वनों व पर्वतों में रहने वाले हिन्दुओं को अंग्रेजों ने आदिवासी कहकर शेष हिन्दू समाज से अलग करने का षड्यन्त्र किया था दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी यही गलत शब्द प्रयोग जारी है. ये वही वीर लोग हैं, जिन्होंने विदेशी मुगलों तथा अंग्रेजों से टक्कर ली है; पर वन-पर्वतों में रहने के कारण वे विकास की धारा से दूर रहे गये थे. संघ इनके बीच स्वयंसेवक ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ नामक संस्था बनाकर काम करता है. इसकी 29 प्रान्तों में 214 से अधिक इकाइयां हैं. इनके द्वारा शिक्षा, चिकित्सा, खेलकूद और हस्तशिल्प प्रशिक्षण आदि के काम चलाये जाते हैं. उल्लेखनीय है कि दिल्ली में अभी हाल में ही संपन्न हुए कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में  ट्रैक फील्ड में पहला पदक और एशियन गेम्स में. 10000 मीटर  में सिल्वर पदक 5000 मीटर में कांस्य पदक  जीतने वाली कविता राऊत वनवासी कल्याण आश्रम संस्था से ही निकली हैं.

1975 के बाद से संघ प्रेरित संगठनों ने सेवा कार्य को प्रमुखता से अपनाया है. राष्ट्रीय सेवा भारती नाम से इस समय लगभग 400 से अधिक  संस्थाएं सेवा क्व क्षेत्र में काम कर रही हैं. विकलांगों में कार्यरत “सक्षम” नामक संस्था की 102 से अधिक नगरों में कार्यरत है. नेत्र दान के क्षेत्र में इसका कार्य उल्लेखनीय है.

आयुर्वेद तथा अन्य विधाओं के चिकित्सकों को ‘आरोग्य भारती’ के माध्यम से संगठित किया  गया है. ‘नैशनल मैडिकोज आर्गनाइजेशन’ द्वारा ऐसे ही प्रयास एलोपैथी चिकित्सकों को संगठित कर किये जा रहे हैं.

आर एस एस के आनुषांगिक संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ का देश के सभी राज्यों के 550 जिलों में काम है. अब धीरे-धीरे असंगठित मजदूरों के क्षेत्र में भी कदम बढ़ रहे हैं. ‘भारतीय किसान संघ’ ने बी.टी बैंगन के विरुद्ध हुई लड़ाई में सफलता पाई.  ‘स्वदेशी जागरण मंच’ का विचार केवल भारत में ही नहीं, तो विश्व भर में स्वीकार्य होने से विश्व व्यापार संगठन मृत्यु की ओर अग्रसर है. मंच के प्रयास से खुदरा व्यापार में एक अमरीकी कंपनी का प्रवेश को रोका गया तथा जगन्नाथ मंदिर की भूमि वेदांता वि.वि.को देने का षड्यन्त्र विफल किया गया. ग्राहक जागरण को समर्पित ‘ग्राहक पंचायत’ का काम भी 135 से अधिक जिलों में पहुंच गया है. इसके द्वारा  24 दिसम्बर को ग्राहक दिवस तथा 15 मार्च को क्रय निषेध दिवस के रूप मनाया जाता है. ‘सहकार भारती’ के 680 से अधिक तहसीलों में 20 लाख से ज्यादा सदस्य हैं. इसके माध्यम से मांस उद्योग को 30 प्रतिशत सरकारी सहायता बंद करायी गयी. अब सहकारी क्षेत्र को करमुक्त कराने के प्रयास जारी हैं. ‘लघु उद्योग भारती’ मध्यम श्रेणी के उद्योगों का संगठन है, इसकी 26 प्रांतों में 100 से ज्यादा इकाइयां हैं.

शिक्षा क्षेत्र में ‘विद्या भारती’ द्वारा 15,000 से अधिक विद्यालय चलाये जा रहे हैं, जिनमें लाखों आचार्य करोड़ों शिक्षार्थियों को पढ़ा रहे हैं. शिक्षा बचाओ आंदोलन द्वारा पाठ्य पुस्तकों में से वे अंश निकलवाये गये, जिनमें देश एवं धर्म के लिए बलिदान हुए हुतात्माओं के लिए अभद्र विशेषण प्रयोग किये गये थे. ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ का 5,604 से अधिक  महाविद्यालयों में सक्रीय है. इसके माध्यम से शिक्षा के व्यापारीकरण के विरुद्ध व्यापक जागरण किया जाता है. ‘भारतीय शिक्षण मंडल’शिक्षा में भारतीयता संबंधी विषयों को लाने के लिए प्रयासरत है. सभी स्तर के 7.5 लाख से अधिक अध्यापकों की सदस्यता वाले‘शैक्षिक महासंघ’ में लगभग सभी  राज्यों के विश्वविद्यालयों के शिक्षक व प्रोफ़ेसर जुड़े हैं.

आर एस एस का ही पारिवारिक संगठन  विश्व हिन्दू परिषद जहां एक ओर श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से देश में हिन्दू जागरण की लहर उत्पन्न करने में सफल हुआ है, वहां 36,609 से अधिक सेवा कार्यों के माध्यम से निर्धन एवं निर्बल वर्ग के बीच भी पहुंचा है.  इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वालम्बन तथा सामाजिक समरसता की वृद्धि के कार्य प्रमुख रूप से चलाये जाते हैं. “एकल विद्यालय” योजना द्वारा साक्षरता के लिए हो रहे प्रयास उल्लेखनीय हैं. बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, गोसेवा, धर्म प्रसार, संस्कृत प्रचार, सत्संग, वेद शिक्षा, मठ-मंदिर सुरक्षा आदि विविध आयामों के माध्यम से परिषद विश्व में हिन्दुओं का अग्रणी और प्रिय संगठन बन गया है.

पूर्व सैनिकों की क्षमता का समाज की सेवा में उपयोग हो, इसके लिए ‘पूर्व सैनिक सेवा परिषद’ तथा सीमाओं के निकटवर्ती क्षेत्रों में सजगता बढ़ाने के लिए ‘सीमा जागरण मंच’ सक्रिय है. कलाकारों को संगठित करने वाली ‘संस्कार भारती’ का 50 प्रतिशत से अधिक जिलों में सक्रिय है. अपने गौरवशाली इतिहास को सम्मुख लाने का प्रयास ‘भारतीय इतिहास संकलन समिति’ कर रही है. विज्ञान भारती, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, अधिवक्ता परिषद, प्रज्ञा प्रवाह आदि अनेक संगठन अपने-अपने क्षेत्र में राष्ट्रीयता के भाव को पोषित करने में लगे हैं.

इस प्रकार स्वयंसेवकों द्वारा चलाये जा रहे सैकड़ों छोटे-बड़े संगठन और संस्थाओं द्वारा देश के नागरिको को देशभक्ति का पाठ पढाया जा रहा है परिणामतः देश भर में लोग सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते है जिससे सरकार की किरकिरी होती है; इसलिए सरकार के मंत्री और कांग्रेसी  नेता  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा देशभक्त संगठन को बदनाम करने की नाकाम कोशिश मात्र अपनी  राजनैतिक रोटी सेंकते है इससे ज्यादा कुछ नहीं. 1925 में डा0 केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा संघ रूपी जो बीज बोया गया था, वह अब एक विराट वृक्ष बन चुका है. अब न उसकी उपेक्षा संभव है और न दमन अतः अनावश्यक वितंडा उत्पन्न करनें वालें इन छातीपीटू नेताओं के चाहिए कि वे संघ के राष्ट्रवादी चरित्र को पहचान इस रंग में स्वयं भी रंगनें का प्रयास करें तो अधिक श्रेयस्कर भी होगा

और रचनात्मक भी.

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