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दिल्ली इंद्रप्रस्थ का प्रथम शासक कौन था एक विवेचनात्मक तथ्य

Posted On: 25 Apr, 2016 Others में

भरद्वाज विमानजरा हट के निकट सरल सच के

Pravin Dixit

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हस्तिनापुर के महान कुरु वंशीय महाराज धृतराष्ट्र के सारथी
(अधिरथ अंग वंश में उत्पन्न सत्कर्मा के पुत्र थे और रथी कारीगरों के मुखिया थे सत्कर्मा, जबकि अंग प्रदेश हस्तिनापुर के अधीन था तथा यहाँ के कार्यभार हेतु राजपाल नियुक्त थे)
अधिरथ और राधा का दत्तक पुत्र कर्ण तेरह वर्ष की आयु पूरी कर चूका था वैसे अधिरथ और राधा को एक और पुत्र शॉन भी था जो कर्ण से आयु में छोटा था किन्तु कर्ण ही दोनों का सबसे प्रिय था
और कर्ण बचपन में ही अपने बाल मित्रों से ज्यादा बुद्धिमान तथा शक्तिशाली था । उसे धनुष-बाण अत्यंत प्रिय थे । धनुर्विद्या में वह अपने बाल मित्रों से कहीं ज्यादा निपुण था । उसकी प्रतिभा देखकर अधिरथ कर्ण की उच्च शिक्षा के लिए हस्तिनापुर ले गए और महाराज धृतराष्ट्र से अनुरोध किया की उसके दोनों पुत्रों की अस्त्र शस्त्र शास्त्र वेद विद्या का प्रबंध किया जाये
सो महाराज धृतराष्ट्र ने विदुर के जिम्मे यह कार्य सौंप दिया
विदुर कर्ण और शॉन को द्रोणाचार्य के पास ले गए किन्तु द्रोणाचार्य ने यह कह कर मना कर दिया भीष्म पितामह को दिए वचन के अनुपालन में वे केवल इन एक सौ पांच कुमारों को अस्त्र शस्त्र शिक्षा दे सकते है
जबकि द्रोणाचार्य के साले व् हस्तिनापुर के कुल गुरु कृपाचार्य कर्ण और शॉन को शास्त्र वेद विद्या प्रदान करने को सहमत हो गए
कर्ण सभी कुमारो को विभिन्न युद्ध कलाओं का अभ्यास करते देखते रहता और सदैव दुखी रहता
उसे इस अवस्था में देख द्रोण पुत्र अश्वस्थामा को उससे सहानुभूति हो गई और प्रतिदिन अभ्यास ख़त्म होने के बाद अश्वस्थामा कर्ण को आकर सभी कार्यकलापों को बताता और तब कर्ण अपने छोटे भाई शॉन को लेकर रात्रि में अश्वस्थामा के बताये हुए विधि से अभ्यास करता इस प्रकार अश्वस्थामा कर्ण का प्रथम मित्र व् गुरु हुआ
किन्तु अस्त्र शस्त्र के निर्माण व् मन्त्र आदि की सिद्धि के लिए योग्य गुरु का सानिध्य आवश्यक था अश्वस्थामा के अनुसार ऐसे योग्य आचार्य केवल परशुराम ही है
अतः कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो कि उनदिनों केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया और अस्त्र शस्त्र के निर्माण व् मन्त्र आदि की शिक्षा परशुराम से प्राप्त किया। यद्यपि कर्ण पर संदेह होने पर क्रोधवश श्राप देने पर परशुराम को ग्लानि हुई पर वे अपना श्राप वापस नहीं ले सकते थे। तब उन्होनें कर्ण को अपना विजय नामक धनुष प्रदान किया और उसे ये आशीर्वाद दिया कि उसे हर वह वस्तु मिलेगी जिसे वह सर्वाधिक चाहता है कर्ण केवल प्रसिद्धि व् सम्मान को सर्वाधिक चाहता था
कर्ण अपनी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत अपने पालक माता पिता से मिलने अंग प्रदेश गया जहाँ पर पिता अधिरथ से यह जानकारी होने पर की हस्तिनापुर में राजकुमारों के युद्ध कौशल की प्रतियोगिता हो रही तो कर्ण बिना निमंत्रण के भाग लेने को चल पड़ता है
कर्ण अधिरथ पुत्र शॉन को भी ले जाता है शॉन चंपा नगर से निकलने पर रस्ते में पड़ने वाले त्रिवेणी संगम प्रयाग की सुंदरता और महात्म्य का वर्णन करता है सो कर्ण प्रयाग संगम तट पर रुकता है गंगा के स्वेत जल यमुना के कृष्ण जल और सरस्वती के लाल भगवा जल को देख अभिभूत हो जाता है और कर्ण को आश्चर्य यह होता है की तीनो नदियां को आपस में मिलने के पश्चात फिर से जल निर्मल श्वेत हो जाता है अंततः प्रयाग की पवन भूमि को प्रणाम कर निकल पड़ता है
कर्ण और शॉन प्रयाग से हस्तिनापुर के लिए निकलते है तो शॉन के अश्व से एक युवती जो की घड़े में जल लेकर जा रही होती है टकरा जाने से घड़ा गिर कर टूट जाता है
कर्ण अपने भाई शॉन की गलती के लिए उस युवती से क्षमा मांगता है किन्तु युवती स्वयं को सूत कन्या रुशाली प्रयाग की निवासिनी बताते हुए कर्ण को महाराज सम्बोधित करते हुए स्वयं की गलती बताती है और कर्ण से क्षमा मांगती है
जबकि कर्ण यह बताता है की वह किसी राज्य का महाराज नहीं है एक साधारण नागरिक है तो रुशाली कहती है की यदि महाराज नहीं है महाराज तो हो जायेंगे
तब कर्ण यह वचन देता की हे रुशाली तुम्हारे वचन यदि सत्य हुए यदि मैं राजा बना तो तुम ही मेरी पत्नी होगी रुशाली दुर्योधन के सारथी सत्यासेन की बहन थी। रुशाली भी साधारण नहीं थी, वह भी कर्ण के समान उच्च चरित्रवान युवती थी और तब रुशाली ने कर्ण को गंगा तट पर ही अपने वचन के सत्य होने तक प्रतीक्षारत रहने प्रण किया।
गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों की शिक्षा पूरी होने पर हस्तिनापुर में रंगभूमि में युद्ध कौशल की प्रतियोगिता आयोजन करवाया हुआ था उस रंगभूमि में अर्जुन धनुर्विद्या के उत्तम प्रयोग प्रदर्शन कर सभी जनमानस का ह्रदय जीत लिया और कौरवों में भय, किन्तु तभी कर्ण रंगभूमी में आया और अर्जुन द्वारा किए गए धनुर्विद्या से भी अति उत्तम प्रदर्शन किया साथ ही उसे द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारा। तब कुलगुरु कृपाचार्य ने कर्ण से उसके वंश और साम्राज्य के विषय में पूछा – क्योंकि द्वन्द्वयुद्ध के नियमों के अनुसार केवल कोई अन्य राजवंश का राजकुमार ही अर्जुन को द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकार सकता था। कर्ण के सूतपुत्र या सारथि पुत्र होने के कारन योगयता नहीं थी , किन्तु दुर्योधन कर्ण के सहस व् योगयता से प्रभावित हुआ उसी समय मामा शकुनि के कहने पर दुर्योधन ने कर्ण को अंग प्रदेश का राजा घोषित कर कर्ण को अपना मित्र बना लिया।
रंगभूमि में युद्ध कौशल की प्रतियोगिता में पुकेया की राजकुमारी उरुवी ने कर्ण को पहली बार देखा, वह पुकेया के शक्तिशाली राजा की एकलौती पुत्री थी और कुरु पांडव वंश के किसी एक राजकुमार का चयन करने के लिए उसके पिता रंगभूमि में की प्रतियोगिता में लए थे ताकि उसका विवाह कर सके किन्तु उरुवी कर्ण के मुख का दिव्य तेज, शक्तिशाली शरीर, सुनहरे कवच और कुंडल, आदि पर पहली ही नज़र में मोहित हो गई और कर्ण से प्रेम करने लगी, यह जानते हुए भी कि कर्ण एक सूतपुत्र है, उरुवी ने निर्णय किया कि वह अपने स्वयं के वरण में कर्ण को ही जीवन साथी बनाएगी अन्यथा कुंवारी ही रहेगी
राजकुमारी उरुवी के विवाह प्रस्ताव को कर्ण ने रूशाली को दिए वचन के कारण प्रथमतः अस्वीकार कर कर दिया किन्तु रुशाली ने राजकुमारी उरुवी के उच्च कुल की होने बाद भी प्रेम और कर्ण के प्रति निष्ठां देख, कर्ण को विवाह करने की अनुमति प्रदान कर दी
इन दोनों विवाह से कर्ण की पत्नी रुशाली से पुत्र वृषसेन, सुषेण, वृषकेतु और उरुवी से पुत्र चित्रसेन, सुशर्मा, प्रसेन, भानुसेन हुए
महाभारत के युद्ध में इन सभी पुत्रों ने भाग लिया किन्तु वृशकेतु एकमात्र ऐसा पुत्र था जो जीवित रहा। महाभारत के युद्ध के पश्चात जब पांडवों को यह बात पता चली कि कर्ण उन्हीं का ज्येष्ठ था, तब उन्होंने कर्ण का अन्त्येष्टी संस्कार करने हेतु अपना दवा प्रस्तुत किया किन्तु दुर्योधन का कहना था की पांडव कभी भी कर्ण के साथ भ्रातृवत् व्यवहार नहीं किये अतः अंत्योष्ठि का अधिकार नहीं है। श्रीकृष्ण ने भी दुर्योधन कर्ण की मित्रता को देखते हुए समर्थन किया और दुर्योधन को ही कर्ण का अन्तिम संस्कार करने दिया हालाँकि अपुस्ट कथाओं के अनुसार कर्ण की मृत्यु के पश्चात पत्नी रुषाली उसकी चिता में सती हो गई थी। भातृ हन्ता के शोक से प्रायश्चित स्वरुप युधिष्ठिर ने कर्ण के एकमात्र जीवित पुत्र वृशकेतु को इन्द्रप्रस्थ का सिंहासन सौंप दिया, अर्जुन के संरक्षण में वृशकेतु ने कई युद्ध भी लड़े ऐसा माना जाता है
इस प्रकार इंद्रप्रस्थ वर्तमान में दिल्ली का प्रथम पूर्ण कालिक शासक कर्ण पुत्र वृषकेतु ही हुआ।

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