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ऐसी ये कैसी तमन्ना है ....

Posted On: 11 May, 2012 Others में

namaste!वन्दे मातरम........!!

pritish1

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ऐसी ये कैसी तमन्ना है ….

जून का महिना था दोपहर का समय और धूप कड़ी थी, विद्यालय में मास्टर साहब शारीरिक करवा रहे थे, मास्टर साहब ने विद्यार्थियों को डबल मार्च करने का आर्डर दिया लड़कों की लाइन ने एक चक्कर ही पूरा किया था की अनंतराम गिर पड़ा.. imgad_2
मास्टर साहब ने लड़कों को लाइन से जाने को कहा, दो लड़कों के साथ अनंतराम को उठाया और बरामदे
पर ले गए, मास्टर साहब ने एक लड़के को दौंड कर पानी लेन का हुक्म दिया दो- तीन लड़के स्कूल की
कापियां लेकर अनंतराम को हवा करने लगे, उसके मुंह पर पानी की बुँदे छिड़क दी गयी अनंतराम के
ठीक होते होते हेडमास्टर साहब भी आ गए और सके सर पर हाथ फेर कर तस्सली देने लगे एक
चपरासी टेम्पो ले आया और मास्टर साहब उसके घर जाने की व्यवस्था करने लगे स्कूल भर में अनंतराम
के बेहोस होने की खबर फैल गयी सब लोग उसे जान गए………
विद्यार्थियों के धूप में मार्च करते समय गुरुदास अनंतराम से दो लड़कों के बाद था यह घटना और यह घटना और कांड हो जाने के बाद वह पूरा दिन सोचता रहा यदि अनंतराम की जगह वह बेहोस होकर गिर पड़ता, वैसे ही उसे चोट आ जाती तो कितना अच्छा होता आह भरकर उसने सोचा सबलोग उसे जान जाते और उसकी खातिर होती ………….
श्रेणी में भी गुरुदास की कुछ ऐसी ही हालत थी गणित में गुरुदास बड़े यत्न से अपनी कापी पर दिमाग गड़ा देता, गुना या भगा कर उत्तर तक पहुँच ही रहा होता की बनवारी या रामू सवाल पूरा कर खड़ा हो जाता., गुरुदास का उत्साह भंग हो जाता मास्टर साहब शाबासी देते तो रामू और बनवारी को,…….. वहीँ रामलाल और लाला न तो सवाल पूरा करने की इच्छा रखते और न ही मास्टर साहब के डांटने पर लज्जित होते डांट मिलती तो रामलाल और लाला को….नाम जब भी लिया जाता तो रामू, बनवारी, रामलाल और लाला का.. गुरुदास बेचारे का कभी नहीं….
‘कुछ अच्छी शिक्षा के लिए पुरस्कार पाते तो कुछ अपनी बदमासी के लिए सबके आगे बेंच पर खड़े कर दिए जाते बेचारा गुरुदास इन दोनों के बीच लटका रह जाता’…………..
इतिहास में गुरुदास की विशेस रूचि थी, शेरसाह सूरी और अशोक का शोर्य, और अकबर के शासन का वर्णन उसके मस्तिस्क में चक्कर काटते रहते …..कभी शिवाजी का किला विजय उसके सच्चित्र होकर सामने आ जाता…. वह अपने आप को अपनी कल्पना में शिवाजी की तरह ऊँची नोकदार पगड़ी पहने, छोटी दाढ़ी और वैसा ही चोगा पहने ,तलवार लिए सेना के पहले घोड़े पर दोंड़ता चला जाता देखता……………………………………………….
इतिहास को मनस्थ कर लेने या स्वयं समां जाने के बाद भी गुरुदास को इनके तारीख याद नहीं रहते…. परिणाम यह होता की गुरुदास को इतिहास के क्लास में भी शाबासी मिलने या उसका नाम पुकारे जाने का समय न आता सबके सामने अपना नाम सुनने की गुरुदास के छोटे से ह्रदय की आकांशा इतिहास के उन पन्नो के बीच रोंती, सिसकती, घुटती नज़र आती.. पुन: इतिहास के मास्टर साहब का यह कहते रहना की दुनिया में लाखों लोग मरते जाते हैं, किन्तु जीवन उन्ही लोगों का होता है ,जो मर कर भी अपना नाम जिन्दा छोड़ जाते हैं……..गुरुदास के सिसकते ह्रदय को एक और चोट पहुंचा देता……………………

क्या गुरुदास अपने जीवन में कुछ कर पाता है क्या उसके अपने नाम सब के सामने आने की महत्वाकान्षा पूरी होती है……. ?
जानने के लिए देखें अगला अंक…….ऐसी ये कैसी तमन्ना-२……..

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