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इतिहास के झरोखे में पंडित नेहरू

Posted On: 14 Nov, 2014 Others में

http://puneetbisaria.wordpress.com/सोच पुनीत की

डॉ पुनीत बिसारिया

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आज देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 125 वीं जयंती है। उनकी मृत्यु को भी लगभग 50 वर्ष बीत गए हैं। अब समय आ गया है कि इतिहास में उनके योगदान का सम्यक मूल्यांकन हो। मुझे लगता है कि उनकी दस सफलताओं एवं दस असफलताओं पर बात की जाए, जो मेरे ख्याल से ये हो सकती हैं-

सफलताएँ-

1- वैज्ञानिक सोच एवं वैज्ञानिक संस्थाओं की स्थापना द्वारा देश की वैज्ञानिक प्रगति की आधारशिला रखना।

2- पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश की आर्थिक प्रगति को आकार देना।

3- गुटनिरपेक्ष आन्दोलन खड़ा करते हुए दुनिया के सभी कमजोर और विकासशील देशों का नेतृत्व करना। पुर्तगालियों से गोवा की मुक्ति, स्वेज नहर, कांगो समस्या, कोरिया युद्ध, पश्चिम बर्लिन, ऑस्ट्रिया और लाओस की समस्याओं को सुलझाकर विश्वनेता के तौर पर उभरना।

4- भारत की शैक्षिक प्रगति के लिए आई आई टी जैसी उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करना।

5- देश को संप्रभुता संपन्न संवैधानिक राष्ट्र की दिशा में अग्रसर करना।

6- सामाजिक समरसता तथा सर्वधर्म समभाव पर बल देना।

7- बांधों तथा विद्युत् परियोजनाओं की स्थापना करते हुए देश की ऊर्जा सम्बन्धी ज़रूरतों को पूरा करना।

8- गांधीवादी आदर्शवादी मॉडल की जगह विकासवादी व्यावहारिक मॉडल लागू करते हुए देश को आगे जाने का प्रयास करना।

9- कल्याणकारी योजनाओं की शुरूआत करते हुए देश की निर्धन जनता की मूलभूत ज़रूरतों को पूरी करना।

10- डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया लिखकर देश के इतिहास को नए सिरे से लिखना।

असफलताएँ

1- 1947 में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर किए गए कबायली हमले के बाद कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाकर युद्ध विराम पर सहमत हो जाने से उस समय तक भारत के कब्ज़े से बाहर एक तिहाई कश्मीर को पाकिस्तान के हाथों गँवा देना।

2- हिन्दी चीनी भाई भाई और पंचशील की आड़ में चीन द्वारा किये जा रहे धोखे की पृष्ठभूमि को पढ़ पाने में असफल रहना।

3- तिब्बत पर चीन की प्रभुसत्ता को स्वीकार करना और संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन की स्थाई सदस्यता का समर्थन करना।

4- अक्साईचिन पर संसद में विवादास्पद ब्यान देना।

5- सन 1951 में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री लियाकत अली से गैर ज़रूरी समझौता करना।

6- कश्मीर में धारा 370 लागू करने पर जोर देना और शेख अब्दुल्ला की नाजायज़ मांगों को स्वीकार करना।

7-डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा डॉ भीमराव अम्बेडकर जैसे सुयोग्य राजनेताओं की उपेक्षा करना।

8- लोकतंत्र की आड़ में राजतन्त्र चलाते हुए विपक्ष को न उभरने देना।

9- राष्ट्रहित पर नोबल शांति पुरस्कार पाने को तरजीह देना और भारत के हितों की उपेक्षा करते हुए अनेक घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर आदर्शवादी रवैया अख्तियार करना।

10- देश के स्वाधीनता इतिहास से गाँधी और खुद के अलावा अन्य नेताओं जैसे- भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल आदि के योगदान को हाशिए पर रखना।

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