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हिन्दी साहित्याकाश के ‘सूर्य’ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की 117 वाँ जन्मदिवस

Posted On: 15 Feb, 2013 Others में

http://puneetbisaria.wordpress.com/सोच पुनीत की

डॉ पुनीत बिसारिया

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बसंतोत्सव, वीणापाणिपूजन के साथ ही आज हिन्दी साहित्याकाश के ‘सूर्य’ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की 117 वाँ जन्मदिवस भी है। निराला हिन्दी साहित्य के ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं,जिनके प्रकाश की आभा में आज भी हिन्दी साहित्याकाश दैदीप्यमान हो रहा है।
‘निराला’ का जन्म बंगाल की रियासत महिषादल (जिला मेदिनीपुर) में माघ शुक्ल एकादशी संवत १९५५ तदनुसार २१ फरवरी सन १८९९ में हुआ था। उनकी कहानी संग्रह लिली में उनकी जन्मतिथि २१ फरवरी १८९९ अंकित की गई है।वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा १९३० में प्रारंभ हुई।उनका जन्म रविवार को हुआ था इसलिए सुर्जकुमार कहलाए। उनके पिता पंण्डित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का गढ़कोला नामक गाँव के निवासी थे।
निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। बाद में हिन्दी संस्कृत और बांग्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया। पिता की छोटी-सी नौकरी की असुविधाओं और मान-अपमान का परिचय निराला को आरम्भ में ही प्राप्त हुआ। उन्होंने दलित-शोषित किसान के साथ हमदर्दी का संस्कार अपने अबोध मन से ही अर्जित किया। तीन वर्ष की अवस्था में माता का और बीस वर्ष का होते-होते पिता का देहांत हो गया। अपने बच्चों के अलावा संयुक्त परिवार का भी बोझ निराला पर पड़ा। पहले महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। शेष कुनबे का बोझ उठाने में महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में बीता। निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गंवाया। जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता। वहीं दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में १५ अक्तूबर १९६१ को उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की।
निराला की ख्याति उनकी लम्बी कविताओं राम की शक्तिपूजा, सरोजस्मृति तथा तुलसीदास के कारण विशेषकर है। इन कविताओं के माध्यम से निराला ने कविता के शिल्प को बदला और नए प्रयोगों के माध्यम से कविताओं में प्रभविष्णुता उत्पन्न की। जुही की कली से लेकर अर्चना तक सर्वत्र वे एक नवोन्मेषी कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं। उनका रूयक्तित्व रोमन देवता हर्क्युलिस जैसा था। डॉ. नगेंद्र ने उनके व्यक्तित्व को कामायनी के मनु के रूप में कल्पित निम्नांकित शब्दों का मूर्त स्वरूप माना है-
अवयव की दृढ़ मांसपेशियां ऊर्जस्वित था वीर्य अपार
स्फीत शिराएँ स्वस्थ रक्त का होता था जिनमें संचार।
डनके जन्मदिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन स्वरूप प््रस्तुत है माँ शारदे की स्तुति में रचित निराला की कविता वर दे वीणावादिनि वर दे –

वर दे, वीणावादिनि वर दे !
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे !

काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे !

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
वर दे, वीणावादिनि वर दे।

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