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खाद्य सुरक्षा से सत्ता सुरक्षा तक

Posted On: 27 Aug, 2013 Others में

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pushyamitra

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बहुचर्चित और “सोनिया गाँधी सरकार” की महत्वाकांक्षी योजना| जितना लुभावना नाम उतने बड़े झमेलों के साथ ये बिल कागजों पर आधाअधूरा मगर इरादों में पूरी तरह तैयार है भारत की अर्थव्यवस्था और चुनाव दोनों में खलबली मचाने को| बिल के आवरण पृष्ठ पर गरीबों को सस्ता भोजन उपलब्ध होगा, और अंदरूनी पृष्ठों में कांग्रेस को वोट| जिस प्रकार सत्ताधीश इस बिल को पारित करवाने के लिए तत्पर दिख रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि देश की सत्ता समाज कल्याण की मंशा वाले लोग संभाले हुए हैं| किन्तु यदि गौर किया जाए तो ये वही अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह जी हैं जो पिछले कई वर्षों से आर्थिक सुधारों की “कडवी दवा महंगाई” भारतीय जनता को घोंट घोंट कर पिलाते आ रहे हैं| मगर चुनावी वर्ष के करीब आते ही वो “कडवी दवा” मीठी गोली में कैसे बदल गयी यह वाकई आश्चर्य का विषय है| वह भी उस समय जब देश की अर्थव्यवस्था गंभीर बीमारी की चपेट में है|
योजनानुसार 50% गरीब वर्ग इससे लाभान्वित होगा| शायद ये आंकडा कई वर्षों से ही चला आ रहा है| जबकि हर वर्ष गरीबी घटाने की बात डाक्टर साहब करते रहते हैं,, इसी वर्ष देश से १७ लाख गरीब रातों रात कम कर भी दिए गये हैं| गरीबी हट रही है कैसे घट रही है ये मत पूछिए| खैर मुद्दे पर आते हैं, इस योजना के अनुसार अधिकतम ३५ किलो सस्ता अनाज एक गरीब परिवार को प्रति माह उपलब्ध होगा| ३५ किलो के हिसाब से साल भर में ४ क्विंटल अनाज बिना मेहनत किये एक परिवार पा सकता है| ध्यान देने वाली बात है कि ४ क्विंटल अनाज बिना मेहनत किये यदि एक किसान को मिल जाएगा तो वह अपने खेतों में अनाज उत्पादन के लिए अधिक समय क्यों खपायेगा, वह क्यों नहीं अन्य विकल्पों के बारे में सोचेगा? सभी जानते हैं कि बड़े किसान पहले ही खेती से हाथ खींच कर अन्य काम धंधों की ओर अग्रसर हो चुके हैं| ऐसे में छोटे किसानों का भी खेतों से हट जाना, देश के अन्न उत्पादन पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है| छोटे किसान मात्र अनाज के लिए खेती करते हैं, जो खपत से बाहर होता है उसे वे बेच देते हैं| अपने लायक अन्न मिल जाने के बाद वे खेती क्यों करेंगे? वे भी औरों की तरह शहर पलायन की ओर अग्रसर होने लगेंगे|
ऐसा ही उदाहरण हम मनरेगा योजना में भी देख चुके हैं, मनरेगा के कारण ही मजदूरी में अप्रत्याशित इजाफा हुआ, जिसका असर निर्माण के हद से ज्यादा महंगे होने में दिखा| अब बारी खेतिहर मजदूरों के महंगे होने की है, जो निश्चित रूप से अनाज की कीमतों को प्रभावित करेगी| ऐसे में सरकार सस्ता भोजन पचास करोड़ से अधिक लोगों को कहाँ से उपलब्ध कराएगी ये सोचने की बात है, जाहिर है कि बोझ फिर से मध्यम वर्ग पर डाल दिया जाएगा और करों में बार बार अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिलती रहेगी| इस योजना में जो भोजन का प्रवाह है वह “मध्यम वर्गीय थाली से उठाकर गरीब की थाली में डालने” का है| साफ़ शब्दों में कहें तो सरकार मध्यम वर्ग को अघोषित गरीब और गरीब को निठल्ला बनाने की पूरी तैयारी में है|
यह सब उस समय किया जा रहा है, जब रूपया रसातल में हैं, विदेशी क़र्ज़ पहाड़ सा होता जा रहा है और देश गरीबी की ओर अग्रसर है| अगर सरकार की मंशा वाकई गरीब कल्याण से जुडी होती तो ये बिल पिछले कुछ वर्षों में भी लाया जा सकता था जब हमारी अर्थव्यवस्था इसे झेलने लायक थी| प्रधानमंत्री जी ने वही समय क्यों चुना जब समय है कि समाज कल्याण को परे रखकर कड़े आर्थिक फैसले लिए जाते| मगर असल बात सिर्फ २०१४ के चुनावों की है| कांग्रेस जानती है कि मध्यम वर्ग पहले ही महंगाई वाली ‘कडवी दवा’ से रूठा हुआ है; खासकर घरेलू बाज़ारों से जुडा हुआ व्यापारी वर्ग! ऐसे में वह नहीं चाहती कि आधी आबादी से अधिक गरीब वोट किसी भी सूरत में हाथ से फिसल जाए|
गरीबी हटाने का कांग्रेसी फार्मूला सीधे आम आदमी की जेब में छेद करता हुआ जाता है| एक ओर ना तो किसानों को फसल की सही कीमत ही मिलती है, और ना ही दूसरी ओर आम आदमी को वाजिब दाम में रोटी| ऐसी योजनाओं से गरीबी नहीं घटती ये सभी जानते हैं| राज्यों के पास अन्न का रोना पहले से ही है| अन्न की आपूर्ति कम होने के साथ साथ ये योजनायें भी कुछ समय बाद बेअसर घोषित कर दी जायेंगी| जैसे पिछले कुछ वर्षों से पर्यावरण के नाम पर कई जन कल्याणकारी योजनायें केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने बंद करवा दीं| मात्र चुनावी फायदे के लिए इतना बड़ी सब्सिडी का बोझ अर्थव्यवस्था पर डालने का जोखिम लिया जा रहा है| खुद प्रधानमंत्री ने १९९१ में वित्त मंत्री रहते हुए आर्थिक सुधारों के नाम पर कल्याणकारी योजनाओं से तौबा कर ली थी ऐसे में मात्र सत्ता सुरक्षा के लिए देश को कंगाली की तरफ धकेलने का जोखिम वे कैसे ले सकते हैं? यह काफी गंभीर है|
भोजन गारंटी जैसी योजनायें निश्चित ही जरूरी हैं, किन्तु उस समय नहीं जब देश की अर्थव्यवस्था औंधे मुंह पड़ी हो| महंगाई और बेरोज़गारी की वृद्धि निरंकुश हो| विदेशी क़र्ज़ बढ़ रहा हो और वैश्विक संकट का दौर हो|
वहीँ प्रमुख विपक्षी पार्टी भी इस बिल पर प्रत्यक्ष आपत्ति दिखाने की हिम्मत नहीं कर पा रही है! क्यों कि मुद्दा गरीबों के हितों से जुडा हुआ है| वह बिल को सिर्फ इस मंशा से रोकना चाहती है कि कांग्रेस इसका फायदा चुनाव में न उठा सके! किन्तु सही बात तो यह है कि चुनावी फायदे के लिए देश की अर्थव्यवस्था को इतने बड़े संकट में डालना क्या उचित है?
जिस तरीके से अनाज का बन्दर बाँट होगा उससे साफ़ है कि आने वाले समय में हम कम पैदावार की समस्या से भी जूझेंगे और महंगाई डायन पूरे ताव पर होगी! किसानो को फसल का सही मूल्य मिलना जरुरी है ना कि मुफ्त की रोटी| हाँ गरीबों को खाना मिलना जरुरी है मगर उन्हें निठल्ला बनाने की कीमत पर बिलकुल नहीं!

-पुष्यमित्र उपाध्याय
एटा

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