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अन्नदाता दुःखी या करदाता दुःखी

Posted On: 23 Apr, 2015 Others में

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अन्नदाता दुःखी या करदाता दुःखी
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नेताओं को यदि अब नरभक्षी भी कह दिया जाय तो कोई अतिशयोक्ति न होगी क्योंकि नेताओं को अपने निजी स्वार्थ और निजी कामना पूर्ती के लिए यदि कुछ मनुष्यों की बलि चढ़ानी भी पड़े तो नेता पीछे नही हटेंगे और इसका सबसे ताजा उदहारण अभी आम आदमी पार्टी की रैली में देखने को मिला जहाँ राजस्थान से आया एक युवक राजनीतिक महत्वकांक्षाओं की पूर्ति की भेंट चढ़ गया या स्पष्ट शब्दों में यही कहा जा सकता है कि एक नेता ने अपनी राजनीतिक मनोकामना पूर्ति हेतु एक युवक की आहुति लेली / केंद्रीय मानवसंसाधन मंत्रालय ने बहुत चतुराई से एक नियम बना दिया है कि स्कूलों के टूर ट्रिप या पिकनिक में जाने से पहले सम्मिलित होने वाले बच्चों का बीमा होना अनिवार्य है लेकिन यह स्पष्ट नही है कि बीमा की प्रीमियम कौन भरेगा ?यानि प्रीमियम बच्चे के अभिभावक भरेंगे या फिर स्कूल मैनेजमेंट भरेगा लेकिन इतना तो तय हुआ कि बीमा अवश्य होगा अर्थात यदि कोई अनहोनी घट जाय तो बीमा कंपनी मुआवजा देगी लेकिन यह नियम नेताओं की राजनीतिक रैलियों में लागू क्यों नही है ?आप पार्टी की चलती रैली में और आप पार्टी के सारे नेताओं और खुद सीएम की उपस्थति में एक व्यक्ति आप के चुनाव चिन्ह झाड़ू को हाथ में पकडे हुए फांसी लगा लेता है तो इस आत्महत्या का दोषी कौन है ?दिल्ली सरकार और राजस्थान सरकार ने मौत के मुआवजे का एलान तो कर दिया लेकिन इस मुआवजे का दंड तो करदाताओं पर पड़ा जबकि रैली में आमंत्रित व्यक्ति की मौत की जिम्मेदारी पार्टी अध्यक्ष की और मृत्यु उपरांत मुआवजे देने की जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टी के अपने फंड से सुनिश्चित होनी चाहिए थी / अपने व्यतिगत राजनीतिक लाभ के लिए नेताओं की रैलियों में गरीब बेबस बेरोजगार युवकों को दो वक्त की रोटी और दो ढाई सौ रूपया का लालच देकर बसों ट्रेक्टरों जुगाड़ों और ट्रकों में ठूस ठूसकर ढोया जाता है और यह सुनियोजित प्रायोजित भीड़ नेताओं की लोकप्रियता का मानक बनती है जिसमे लाखों रूपया काले धन का प्रयोग होता है /सत्ताधारी पार्टी की रैली की बोझ जिले के कई महकमे या मंत्री के महकमे के बजट पर पड़ता है लेकिन उसी रैली में मरने या घायल होने पर मुआवजे का दंड करदाताओं को भुगतना पड़ता है/ पुलिस कर्मचारी अनुशासन और कानून व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए यदि कुछ असामाजिक तत्वों की धुनाई करदें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार और सुप्रीम कोर्ट तक तुरंत संज्ञान लेकर स्थानीय प्रशासन से रिपोर्ट मांगता है लेकिन यहाँ तो एक मनुष्य राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति हेतु नरभक्षी नेताओं की भेंट चढ़ गया उसके बाबजूद नातो सुप्रीम कोर्ट और नाहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कान में ही उस व्यक्ति की हत्या की चीख पड़ी / वैसे तो एनकाउंटरों तो नाना प्रकार के प्रश्न उठते हैं लेकिन रैली में आये एक व्यक्ति की हत्या या आत्महत्या क्या एनकाउंटर नही है ?अन्नदाताओं की आत्महत्यों पर कोहराम मचाने वालों को वे चीखें क्यों सुनाई देती जब पूर्व पीएम विश्व नाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन लागू किया था और उसके विरोध में हजारों युवकों ने अात्मदाह किया था लेकिन भ्रष्ट लोकतंत्र में आरक्षण का दायरा इतना बढ़ता गया कि आज स्थिति यह है कि भारत की प्रतिभा योग्यता और दक्षता आत्मदाह आत्महत्या कर रही है / इस भयंकर स्थिति का जनक कौन है ?अन्नदाता का कर्ज तो सबको दीखता है और मीडिया में यह गाना चौबीसों घंटों गाया जाता है कि अन्न दाता सबका पेट भरता है लेकिन इसी अन्न दाता को सस्ता मिला कर्ज और सब्सिडी का बोझ तो भारत का करदाता उठाता है /अन्नदाता को सस्ती बिजली ,डीजल पर सब्सिडी ,ट्रेक्टर खरीद पर सब्सिडी किसके पैसे से मिलती है ?क्या कोई नेता या कोई पॉलिटिकल पार्टी इस सब्सिडी का भार उठाती है / यूपी के नेत्री ने हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि मात्र एक पार्क बनवाने के लिए अधिग्रहित कर ली तब कोई नही बोला और मुलायम सिंह ने किसानों की जमीन छीनकर अम्बानी को दादरी में बिजली संयंत्र बनाने को अधिग्रहित करके दान में दी थी और आजतक भी वह संयंत्र नही लगा तो मुलायम सिंह आज कैसे अपने को अन्नदाता का भाग्यविधाता घोषित कर रहे हैं ? यूपी में अपने वोटबैंक को खुश रखने के लिए सीएम में हजारों करोड़ों रुपये बर्बाद कर दिए तो उसपर कोई पीआईएल दाखिल नही होती कि वह पैसा उसकी राजनीतिक पार्टी का था या फिर करदाता का था जिसे राजनीतिक निजी स्वार्थ पूर्ति में बर्बाद कर दिया गया / राजनेता अपने को जनता का सेवक कहते हैं और खुद इसी सेवा के बदले मेवा खाते हैं और इस मेवा का मूल्य करदाता भुगतता है / नेताओं को शर्म नही आती कि संसद और विधान सभाओँ की केन्टीन में लक्जरी व्यंजन सब्सिडी पर खाते हैं और करदाता को चोर कहते हैं जो इन कैंटीनों की सब्सिडी का भार वहन करता है / नेताओं पर लाखों करोड़ों रुपये के बिजली पानी गृहकर टेलीफोन और कोठियों के किराये के बिल लंबित हैं कुछ नेता तो बिना बिल चुकता किये मर भी गये लेकिन बेशर्मी की हद देखिये कि उन डिफॉल्टर नेताओं के नाम से स्मारक बनवाए जा रहे हैं और राजकीय अवकाश घोषित किये जा रहे हैं /यूपी में एक वर्ष में 156 दिन तो राजकीय अवकाश हैं लेकिन इन 156 दिनों का वेतन तो सभी सरकारी एवं अर्ध सरकारी कर्मचारियों को मिलता और शेष बचे 209 दिनों में काम रिश्वत से होता है तो विचार करें कि देश का करदाता सुखी है या दुखी क्योंकि सरकारी वेतन भत्तों सुख सुविधा मौज मस्ती का अंतिम वास्तविक स्त्रोत्र तो बेचारा मध्यम वर्गीय करदाता ही है /अन्नदाता ने कर्ज लिया तो सबने देखा लेकिन अन्नदाता ने जमीन खेत बंटाई पर दिया हुआ था यह किसी को दिखाई नही दिया /मुआवजे का चेक भूमि स्वामी को मिलेगा जबकि नुकसान खेत को बंटाई पर लेने वाले का हुआ जिसको कुछ नही मिलता /अन्नदाता ने कर्ज खेती के ऊपर नही बल्कि खेत की कीमत पर लिया और उस कर्ज का प्रयोग खाद बीज पानी में नही बल्कि किसी और मद में किया जिसकी सच्चाई कोई जानना ही चाहता / बड़े बड़े बिल्डर किसानों से जमीन खरीदकर उपजायु भूमि पर भव्य भव्य आलीशान इमारतें बना रहे हैं लेकिन यहाँ कोई अन्नदाता आत्महत्या क्यों नही करता ?पूरे भारत के प्रत्येक शहर की बाहरी सीमा पर बानी आवासीय कॉलोनियां प्रमाण हैं लेकिन यह सांसदों विधायकों और मीडिया को दिखाई नही देता / मध्यम सामान्य श्रेणी के मातापिता अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेते हैं और बच्चे का भविष्य आरक्षण का राक्षस निगल जाता तो कर्ज चूका न पाने के कारण आत्महत्या कर लेते और इनकी वार्षिक संख्या आत्महत्या करने वाले अन्नदाताओं से कहीं अधिक होती है लेकिन इनके लिए रोने रोने वाला कोई नही है /
रचना रस्तोगी

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