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अहल्या - पीड़िता या दुराचारिणी

Posted On: 31 Mar, 2016 Others में

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rajanidurgesh

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मिथिला की नारी अहल्या तपस्विनी थी . सुंदरता की प्रतिमूर्ति थीं . पतिभक्त थीं . पतिमनोनुकूला थीं . पति जब समिधा लेन जाते थे तो पूजा की सामग्री तैयार करती थीं . हर क्षण पति के आदेश का पालन करती रहती थीं . रामायण के प्रमुख पात्रों में एक हैं अहल्या .
राम जब मिथिला पहुंचे तो वहां की शोभा देखकर ,रमणीयता देखकर मुग्ध हो गए थे . उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों सम्पूर्ण धरा का प्राकृतिक सौंदर्य मिथिला में ही विराजित है . श्रीराम की दृष्टि एक मनोहर आश्रम पर पड़ी . अत्यन्त रमणीय होने के बाद भी वह आश्रम रिक्तता का आभास करा रहा था . उन्होंने विश्वामित्र से प्रश्न किया कि यह आश्रम इतना मनोरम होते हुए भी मुनियों से खाली कैसे है . मानव क्या यहाँ तो पक्षी भी नहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है .
राम की जिज्ञासा देखकर विश्वामित्र ने कहा यह गौतम मुनि का आश्रम है . कभी इस दिव्य आश्रम की देवता भी अनुशंसा किया करते थे . गौतम महर्षि अपनी पत्नी अहल्या के साथ यहाँ रहते थे . पूर्वकाल में गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी को क्रोधवश शाप दे दिया था और तभी से यह वीरान हो गया गया है .
देवताओं के राजा इंद्र अहल्या की सुंदरता पर मुग्ध थे और उन्हें प्राप्त करने की कामुक ललक थी उनमें . वह सदा प्रयासरत रहते थे कि कैसे इस अहल्या जैसे सुंदरी को भोग सकूं . एक दिन गौतम मुनि की अनुपस्थिति में देवराज इंद्र ने गौतम ऋषि का वेष धारण किया और अहल्या के पास आये. उनसे इंद्र ने समागम की इच्छा व्यक्त की . अहल्या ने उन्हें पति समझकर सहर्ष स्वीकार कर लिया . पत्नीधर्म के अनुसार पति जब भी इच्छा व्यक्त करे पत्नी को उसका साथ देना चाहिए ,अहल्या ने वही किया , पत्नीधर्म निभाया . परन्तु स्थिति तब ख़राब हो गयी जब गौतम ऋषि लौट कर अपने आश्रम पहुंचे . उन्होंने देखा कि इंद्र मेरे ही वेष में मेरे आश्रम से निकल रहा है . देवर्षि समझ गए कि अनहोनी हो चुकी है . वह जानते थे कि इंद्र कामपिपासा से ग्रस्त दुराचारी व्यक्ति है , वह छली है और यहाँ वह मेरा रूप धारण किये हुए है तो निश्चित ही इसने गलत किया है . यह भाग भी रहा है , अर्थात डर कर भाग रहा है और डर कर वही भागता है जो अपराधी है . नहीं तो इंद्र जो देवताओं के राजा थे , डर कर क्यों भागेंगे ?
स्थिति स्पष्ट थी , गौतम ऋषि समझ गए कि इंद्र ने अहल्या के संग कुकर्म किया है . क्रोध स्वाभाविक था . क्रोध से पीड़ित व्यक्ति ज्ञान से अँधा हो जाता है . और इसी से उन्होंने बिना सोचे समझे इंद्र को शाप दे दिया कि उसके अंडकोष गिर जाये . उन्हें यह तो पता था कि इस शाप से इंद्र समागम के योग्य नहीं रहेगा , लेकिन यह पता नहीं था कि प्रतिरोपण करवाने का सामर्थ्य है इंद्र में . हुआ भी यही . उसने प्रतिरोपण करवा लिया और भेड़ का अंग लगवा लिया . और तो और उस कामी बलात्कारी इंद्र ने तर्क दिया कि उसने कुकर्म इसलिए किया कि कहीं गौतम तपोवल से इंद्र का राज्य न छीन ले ! यह कुतर्क था , ऋषि किसीका राज्य नहीं छीनता .
परन्तु , इसी क्रोधवश गौतम ने पत्नी का जीना दुरूह कर दिया . वहां समाज ने भी ताने मारने शुरू कर दिए और वह पत्थर हो गयी . घर से निकलना बंद कर दिया , न ठीक से खाती न पीती, कुछ भी तो ठीक नहीं था उसके जिंदगी में . गलती हुयी ? कैसे? वह तो उस छद्म बहुरुपिया इंद्र ने उसे छला . वह तो अपना पति समझ कर ही उससे सम्बन्ध स्थापित किया था . अगर सजा मिलनी ही थी तो वह इंद्र को मिलनी थी . परन्तु वह तो देवराज थे , अतः उनके अपराध को समाज ने अनदेखा कर दिया . अपराधी तो वही था पर अहल्या के ऊपर आरोप लगाया ,लांछन लगाया गया कि वह जानबूझ कर इंद्र के साथ सोई थी . अगर वह जानबूझ कर सो सकती तो इंद्र को वेष बदलने की जरूरत क्यों होता ? यह तो बस पुरुषप्रधान समाज है जो दोष महिलाओं में ही देखता है भलेही दोषी पुरुष ही क्यों न हो .
बलात्कारी इंद्र का तो कुछ नहीं बिगड़ा , पर पीड़िता अहल्या को वर्षों तक समाजसुधारक मर्यादा पुरुषोत्तम राम की प्रतीक्षा करनी पड़ी .
जब श्री राम महातेजस्वी मुनि विश्वामित्र संग मिथिला पहुँचे तो उनकी दृष्टि अत्यन्त मनोहर आश्रम पर पड़ी . अत्यन्त मनमोहक था वह आश्रम, पर उसमें कहीं न कहीं रिक्तता का आभास करा रहा था . आश्रम देखकर श्रीराम ने मुनि विश्वामित्र से जिज्ञासा की और प्रश्न किया कि ‘यह आश्रम इतना मनोरम होते हुए भी मुनियों से रिक्त क्यों है और यह किसका आश्रम है .”
विश्वामित्र ने उनको बताया कि यह आश्रम देवर्षि गौतम का है . साथ ही उन्होंने देवराज इंद्र द्वारा किये गए अपराध के सम्बन्ध में विस्तार से बताया . रामायण में यह उल्लेख है की अहल्या को ज्ञात हो गया था कि गौतम के वेष में देवराज इंद्र हैं , पर यह इसलिए कि यहाँ भी पुरुष द्वारा लिखी गई रामायण पुरुष को दोषी नहीं दिखा सकती , वह भी देवराज इंद्र को दोषी बताना तो अत्यन्त ही कठिन कार्य ! अगर इंद्र के साथ समागम पारस्परिक विचार या आपसी सहमति से हुयी होती तो इंद्र को गौतम ऋषि का वेष बनाकर नहीं आना पड़ता , वह तो इंद्र छल से बलात्कार कर गया . पूर्व काल से ही स्त्री को अपमानित किया जाता रहा है .
अहल्या अपूर्व सुंदरी थीं , दिव्यता से पूर्ण थीं . रूपगुण , शीलस्वभाव से अद्वितीय थीं . पति परायणा ही नहीं अनुगामिनी थीं . इंद्र की कुदृष्टि थी उनपर अतः एक दिन जब अँधेरा ढलने लगता है उस समय को इंद्र ने इसलिए चुना कि कहीं अहल्या उसे पहचान न ले . उस समय बिजली की व्यवस्था नहीं होती थी और प्रणय काल में दीपक बुझा देने का चलन था . स्वाभाविक रूप से से इंद्र का वेष गौतम ऋषि जैसा होने के कारण अहल्या ने उसे पति समझ , उनकी की प्रणय याचना स्वीकार कर ली . कोई भी नारी पति की हर इच्छा पूर्ण करना अपना कर्तव्य ही नहीं धर्म भी मानती है . मिथिला की नारी तो सदा से पति की अनुगामिनी रही हैं . उनके जीवन में पति की इच्छा सर्वोपरि रही है . अनेकों ललनाएँ हुईं हैं मिथिला में जिनका जीवन पति की इच्छा पर समर्पित होता थ . मिथिला की नारी आज भी पति को ही सर्वस्व मानती है . सतत पति के ही मनन चिंतन में रहती है . उस समय की मिथिला की नारी तो और भी विशिष्ट होती थी . अहल्या अपने पति की इच्छा की पूर्ति कैसे नहीं करती और भोली – भाली सज्जनता की प्रतिमूर्ति अहल्या , छलिया इंद्र को न पहचान सकी और अनर्थ हो गया . हो सकता है उन्हे बाद में ज्ञात हुआ हो , जब तक आभास हुआ होगा तब तक तो छलिया इंद्र उनका सतीत्व भंग हो चुका होगा . जब तक संभालती तब तक गौतम ऋषि पहुँच चुके होंगे और वह निश्छल नारी बिना किसी दोष की कलंकिनी प्रमाणित हो गयी .
पति के कठोर दण्ड से आहत हुई . अबला नारी लांछित होती रही और क्रूर पति तथा समाज ने उसे पत्थर बन दिया . जिसे अपना सर्वस्व मानती थी ,पूजा करती थी वही पति अविश्वास करे इससे बड़ी बिडम्बना क्या होगी ? यह तो मानवता की हार ही हुई .वास्तव में पत्थर की नहीं होकर लोगों के तिरस्कार से पाषाण सदृश हो गयी होगी . पश्चात्ताप ,पति से लांछित ,समाज से अपमानित ,सतीत्व भंग होने का अपराध – बोध ये समस्त बातों ने उन्हें पत्थर सदृश बना दिया होगा . मैं कैसे नहीं समझ पाई अंधी हो गयी थी क्या ? अहसास क्यों मर गयी थी मेरी ? कैसे मैं विभेद नहीं कर पाई ? जिस पति के साथ जीने मरने की शपथ ली थी उनको ही नहीं पहचान पाई ! मेरी अक्ल को क्या हो गया था ? अब करूँ तो क्या करूँ? जाऊँ तो जाऊँ कहाँ ? यह सोच -सोच कर पत्थर सदृश हो गयी होंगी . किसी को भी दारुण दुःख होने पर वह पत्थर ही तो हो जाती है .
समाजसुधारक , प्रगतिशील , समाजसेवक श्रीराम को जब विश्वामित्र से सारी जानकारी मिली तो उन्होंने अहल्या से मिलकर उनको समझया और उनके मन से यह अपराधबोध को निकलने में कामयाब हुए . जब अहल्या को प्रतीत हुआकि इतने महान व्यक्ति मुझे अपराधी तथा कलंकिनी एवं दुश्चरित्रा नहीं समझते तब जाकर उनका मन हल्का हुआ . श्री राम ने वहां उपस्थित सारे लोगों को बताया अहल्या निर्दोष है. अहल्या को दुश्चरित्रा न समझा जाये , वह दोषी नहीं है. अब तक श्री राम का प्रभाव समाज में .स्थापित हो गया था उन्होंने तारका का वध करके जो लोगों का कल्याण किया था उससे उनकी ख्याति फ़ैल चुकी थी , उकनी महत्ता समाज में कायम हो चुकी थी. जब कोई महत्व्पूर्ण व्यक्ति किसी बात को कहता है तो लोगों को समझ में आता है. अतः जब राम ने अहल्या को निर्दोष घोषित किया तो समाज ने भी उन्हें अपना लिया और उनके पति गौतम ने भी उनको अपना लिया .
अब अहल्या का कष्ट दूर हो चूका था . वह अब पत्थर नहीं थी. पूर्ववत वह गौतम ऋषि की पत्नी के रूप में स्थान पा चुकी थी. उनकी इज़्ज़त होने लगी थी. और यह सब श्री राम की पहल से संभव हुआ था. अब उसे समाज पीड़िता मानने लगी थी न कि दुराचारिणी . कुकर्मी तो इंद्र था , पर वह देवताओं का राजा था, अतः समर्थ था !
परन्तु राम ने घोषित कर दिया कि अहल्या पीड़िता थी न कि दुराचारिणी.

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