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अहिंसात्मक गांधीवादी तरीका

Posted On: 8 Nov, 2015 Others में

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rajanidurgesh

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हर साहित्यकार चाहता है,साहित्य अकादमी पुरस्कार उसे मिले, और जब कोई अथक परिश्रम से इस अनमोल पुरस्कार को प्राप्त करता है, तो वह अपने को सबसे श्रेष्ठ उपलब्धि प्राप्त करने वाला समझता है.
पुरस्कृत होना सम्मान प्राप्त करना होता है. जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि या सम्मान लौटाता है तो यह स्वयं सिद्ध हो जाता है कि वह व्यक्ति अत्यंत दुःखी है और किसी कृत्य के कारण अपमानित भी अनुभव करता है .
विरोध प्रदर्शन करने के प्रजातान्त्रिक तरीकों में यह भी एक अहिंसात्मक गांधीवादी तरीका हो सकता है . पुरस्कार लौटाकर साहित्यकार सरकार को नीन्द से जगाना चाहता है, कि तुम अगर सरकार हो तो हमारी रक्षक भी हो . अतः स्वतन्त्र अभियक्ति करने वाले निडर लोगों के साथ जो कुछ कायर लोग करवाई कर रहे हैं , उन दोषियों से निर्दोष लोगों को बचाना है .
कुम्भकर्णी सरकार ! यह आपका परम कर्त्तव्य है . जन सेवक होने का दावा करने वाले, हम स्वतन्त्र अभिव्यक्ति रखनेवाले अपने लेखक अपने आप को इस परिस्थिति में असुरक्षित और अपमानित अनुभव कर रहे हैं . यथा शीघ्र हमें सुरक्षित अनुभव करावें, नहीं तो यह पुरस्कार हमारे किस काम का ?
असंख्य साहित्यकारों द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाना अनवरत जारी है .पुरस्कार लौटाने से उनके सम्मान में इज़ाफा ही हुआ है . इतने बड़े सम्मान को लौटाना उन सबके विशाल हृदय का परिचायक है . अत्यन्त कठिन परिश्रम से कोई भी साहित्यकार लेखक पुस्तक लिखता है , जिनमें दृढ़ आस्था ,मनोबल ,अथक परिश्रम ,लगन धैर्य तथा अटूट विश्वास, समर्पण ,परिवार के लोगों की त्याग निहित रहता है . तन,मन, धन सभी कुछ समर्पित कर देते हैं लेखक हों ,साहित्यकार हों या फ़िल्मकार हों . जिस तरह माँ अपने गर्भ में पल रहे शिशु की आकुलता से, बिना अपनी परवाह किये ,सन्तान की प्रतीक्षा करती है , ठीक उसी तरह रचनकार लेखक अपनी पुस्तक लिखकर उसके छपने तक करता है . परिश्रम तो सभी करते हैं लेकिन साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिलना गौरव की बात है . जिन्हें यह सम्मान मिला हो ,उनसे सौभाग्यशाली कौन होगा | इतनी दुर्लभ वस्तु को लौटाना बहुत बड़ा बलिदान है मेरी दृष्टि में . उन लेखकों की सराहना करनी चाहिए न कि विरोध प्रदर्शन. स्वप्न सदृश होती हैं उनकी पुस्तक और उस पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त करना अत्यन्त ही सम्मान की बात है , और जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि को लौटाना उनके लिए कितना कठिन हुआ होगा ,कितने आहत हुए होंगे .अतः उनका सम्मान नहीं कर सकते तो उनका उपहास भी नहीं उड़ाना चाहिए.
लेखक किसी को ठेस तो नहीं पहुँचा रहे , किसी को अपमानित तो नहीं कर रहे , बस वे अपनी निजी राय मात्र निडरता से देना चाहते है , फिर इतनी हाय-तौबा क्यों ? इतनी राजनीति किसलिए ? कुछ लोगों का कहना है आज क्यों ?, पहले क्यों नहीं ? १९८४ में क्यों नहीं आदि आदि . अगर पहले नहीं किया तो आज नहीं कर सकते यह क्या बात हुई ? ऐसा थोड़े होता है . “जब जागो तभी सबेरा.”
लेखक पुरस्कार एक मात्र उद्देश्य से लौटा रहें हैं कि सरकार स्वतंत्र अभिव्यक्ति करने वालों को उन दुष्टों से सुरक्षा दे जो लेखकों को परेशान ही नहीं करते परन्तु हत्या तक कर डालते हैं.
भारत धर्म निरपेक्ष देश है . सबको समान अधिकार है , बोलने की आज़ादी है . यदि शाहरुख़ खान जी अपना मन्तव्य व्यक्त कर ही दिए तो इतना विरोध क्यों ? वे जब चलचित्र पर अभिनय करते हैं तो हम सब भेद -भाव से रहित होकर भाव विभोर होकर उनका अभिनय देखते हैं , अपने में से एक मानते हैं , फिर उनके वक्तव्य पर आहत होना या उन्हें आहत करना अनुचित है . हम सब एक हैं . अनुपम खेरजी का विपक्ष में आवाज़ उठाना उचित है तो पक्ष में आवाज़ उठाने वालों पर इतना हंगामा क्यों ? हम सब आज़ाद देश के नागरिक हैं . लेखक भी स्वतन्त्र हैं , उनको पूर्ण अधिकार है वे अपना सम्मान पुरस्कार रखें या लौटाएँ. यह उनका निजी हक़ है .

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