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नयी सोच

Posted On: 21 Oct, 2016 Others में

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rajanidurgesh

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Maanस्टार प्लस पर धोनी ,विराट,रहाणे या अन्य लोगों को यह प्रचार करते हुए जिसमें टी शर्ट में माँ का नाम लिखा है ,किसी के पूछने पर जब पिता का नाम था तब तो आपने नहीं पूछा , फिर आज माँ का नाम देखकर क्यों ? किसीका कहना की जितना मैं कोहली हूँ उतना ही सरोज! इन सबका माँ के प्रति ऐसा सम्मान देखकर मन को अपार संतुष्टि मिली यह प्रचार हम महिलाओं के लिए सम्मान का विषय है . वास्तव में यह नयी सोच है.
माँ का नाम क्यों नहीं ? हर स्थान में पिता का नाम ,माँ का कोई अस्तित्व ही नहीं , यह परंपरा वर्षों से से चली आ रही है . महिलाओं को यह बात पसंद तो नहीं आती लेकिन पुरुषप्रधान समाज में मौन के अतिरिक्त कोई उपाय ही नहीं, अतः सदा से अपना अधिकार नहीं मिलने पर भी शांत रहना ही उचित लगा . लेकिन ह्रदय में यह यक्ष प्रश्न की तरह अनुत्तरित ही रहा .लेकिन यह अन्याय ही हुआ , वास्तव यह अनुचित है माँ का नाम क्यों नहीं ? जीवनदायिनी माँ क्यों नहीं जानी जाती , वह क्यों परोक्ष में ही रह जाती है ? जो माँ जन्म देती है , नौ महीने गर्भ में रखती है ,अपने संतान को पालित पोषित करती है, अपनी परवाह किये बिना , फिर भी उसकी पहचान नहीं ?अपना सम्पूर्ण जीवन बच्चों के परवरिश तथा उसकी प्रसन्नता में ही व्यतीत कर देती है . उस माँ का नाम कहीं नहीं ? वास्तव में यह अन्याय ही तो है . पितृसत्ता होने कारण माँ गौण ही हो गयी थी. पुरुष प्रधान समाज होने के कारण माँ का स्थान बच्चों के एड्मिसन तक में आवश्यक नहीं समझी जाती थी.

माँ इस धरा की साक्षात् जगदम्बा है अपनी संतान के लिए. सर्वोत्कृष्ट रचना है इस सृष्टि की. दया ,ममता,मधुरता विश्वास की प्रतिमूर्ति होती है. माँ मात्र संतान की ही नहीं सम्पूर्ण परिवार को अपने स्नेह से सिञ्चित करती है. हर माँ दुर्गा,लक्ष्मी ,सरस्वती के रूप अपने संतान को परिलक्षित होती है. माँ के ह्रदय में अपनी संतान के लिए प्यार ही प्यार होता है , अपनी संतान के लिए समर्पित माँ का स्थान कहीं नहीं? विद्यालय में दाखिला लेने तक में माँ का नहीं! यह कैसी विडम्बना है? जिस बच्चोंकी परवरिश में अपना जीवन व्यतीत करने वाली माँ का गौण होना यह कितना अन्याय है. माँ अपने बच्चों की प्रथम शिक्षिका होती है. अपने बच्चों के भविष्य का निर्धारण माँ ही तो कराती है. उस वृक्ष सदृश होती है जो अपनी परवाह न कर छाया देती रहती है. ऐसी माँ का नाम न होना न्यायपूर्ण नहीं है.
द्वापर और त्रेता युग में माँ का नाम पुत्र के नाम के साथ जोड़ा जाता था. यथा यशोदानंदन , कौसल्यनंदन,देवकीनंदन आदि. अर्थात पिता सदृश माँ का भी स्थान एक सदृश था. लेकिन दुर्भाग्यवश मध्यकालीन युग में नारी का रूप विकृत हो गया. पुरुष के पाप युक्त आचरण के कारण. उसकी स्थिति दयनीय होती गयी, मनमाने आचरण के कारण पुरुष के दम्भ के कारण , अत्याचारों के कारण उसे शिक्षा या अन्य वस्तुओं से वंचित होना पड़ा . पुरुष की कुदृष्टि के कारण पर्दा के पीछे रहना पड़ा.इसलिए जीवन में पीछे हो गयी, फलतः गौण होती गयी. माँ भी तो पहले नारी ही थी, इसलिए गौण हो गयी हर क्षेत्र में.
पर आज अगर नयी सोच के कारण कोई पुत्र यह कहता है की ‘जितना मैं कोहली हूँ उतना ही सरोज भी’ तो स्वाभाविक रूप से हर माँ की आँखें ख़ुशी के आंसू से छल-छला जाता है. जब कोई पुत्र यह कहता है की -‘आज मैं जो हूँ वो जितना पापा के वजह से उतना ही माँ के वजह से, तो हर माँ का दिल गौरवान्वित होना स्वाभाविक ही है.
माँ को श्रेय देने का इस से अच्छा और कोई तरीका शायद ही हो.

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