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बैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद , प्रेम बढ़ाता योगशाला

Posted On: 21 Jun, 2015 Others में

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rajanidurgesh

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भारत के लिए प्रसन्नता की झलक तो तभी मिल गयी थी जब श्री नरेंद्र मोदी जी ने ‘२१ जून’ को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में UNO से घोषणा करवाने में सफल हुए थे. और आज २१ जून को सम्पूर्ण विश्व में जो दिखा वह विश्व-विजय का अहसास दिला गया . प्रातः काल राजपथ योगियों (योग की अभ्यास करने वाले) से खचा खच भरा हुआ था. योग मेला लगा हुआ था और सिरकत करने वालों में प्रधानमंत्री भी थे. बच्चे ,बुजुर्ग ,महिला,युवा , साधु, अधिकारीगण,मंत्री,मुख्यमंत्री और जनसाधारण – न जात न पात, न धर्म की परवाह , न पक्ष न विपक्ष, न लिंग भेद, न ऊँच न नीच , न धनी न गरीब , न गोरा न काला , न कोई अन्य भेद -भाव, बस सब मिलकर और एकजुट होकर योग में लीन थे. वाह ! क्या मिलान था ! यह तो ऐसा पर्व था, जिससे हम सपूर्ण भारतवासी एकजुट हो गए. यह योग मेला से अधिक मेरे लिए एकता का पर्व था. मुझे बच्चनजी की मधुशाला की पंक्ति स्मरण हो आया – “बैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद , मेल कराती मधुशाला.” और हम आज कहें कि “बैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद , प्रेम बढ़ाता योगशाला.”
शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्व के विकास में योग का विशेष महत्व है.
योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘युज’ धातु से हुई है . युज का अर्थ जोड़ना या मिलाना होता है . अतः शरीर और मन को मिलाने की साधना को योग कहते हैं . योग के माध्यम से मानव आम जीवन से उठकर अलौकिक आचरण करता है . चञ्चलता पर नियन्त्रण करता है और मानव की शारीरिक एवं आत्मिक शक्ति में अभिवृद्धि करता है .
महर्षि पतञ्जलि के अनुसार “योगश्चित वृत्ति विरोधः ” अर्थात मन के स्वाभाव और चञ्चलता को बाह्य वस्तुओं में भटकने से रोकना या शान्त करना ही योग है . अपनी अन्तरात्मा के साथ एकाकार होने के अनुभव को योग कहते हैं .
भगवान शिवजी ने योग विद्या की खोज की थी . योग सम्बन्धी सभी आसनों को उन्होंने सर्वप्रथम अपनी प्रथम शिष्या पार्वती को सिखाया . समय काल अनुसार भगवान शंकर द्वारा खोज की गयी योग विद्या के ८४ लाख आसनों में ह्रास होते होते आज मात्र ८४ आसान की व्याख्या उपलब्ध है . आधुनिक मानव के लिए मात्र ३० आसन ही उपयोगी माने गए हैं . ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर योगी गोरखनाथ योग के प्रथम व्याख्याकार मने जाते हैं . उन्होंने अपने निकटतम शिष्यों को इसकी ज्ञान दी थी .
योग को पातञ्जलि ने १००० ई. पू. ‘योग सूत्र ‘ लिखकर सुव्यवस्थित किया था . ऋक-संहिता ‘ में कहा गया है कि विद्वान का भी कोई यज्ञ कर्म योग के बिना सिद्ध नहीं होता है .
लगभग ३००० ईसा पू . सिंधु -घाटी ‘ कि सभ्यता के समय की मुद्राओं और मूर्तियों में योग का चित्रण उपलब्ध है.
प्राचीन काल से ही यह परम्परा चली आ रही है . हमारे ऋषि मुनि तो इसे अपना कर कन्दमूल खाकर जीवन व्यतीत करते थे . उन्हें न कोई रोग होता था न औषधि की आवश्यकता होती थी . उन्हें कहाँ मधु मेह ,कहाँ ब्लड -प्रेसर या कोई अन्य बीमारियाँ होती थीं . क्योंकि वे निश्चित रूप से योग करते थे . नियमित जीवन शैली होती थी उनकी , लेकिन आज मानव त्राहि – त्राहि कर रहा है .क्योंकि न योग करना न नियत समय पर खाना न सोना न जीवन में कोई नियम अर्थात आज के मानव का जीवनशैली अस्त-व्यस्त है . जितनी जनसंख्या बढ़ती जा रही है उतनी ही बीमारियाँ भी पनप रही है . अधिकांश मानव रोग से पीड़ित है, कारण है जीवन शैली अनुशासित नहीं होना . प्राचीन काल से ही योग राम बाण औषधि के रूप में उपयोगी है. बस इसे अपनाने की आवश्यकता है . अनेक साधु संतों ने आरम्भ तो किया था जिनमे अयंगर प्रसिद्ध थे . श्री महेश योगी ने भी योग को प्रचारित किया था ,लेकिन वे इसे स्वदेश से ज्यादा विदेश में रहे. श्रीमती इंदिरा गांधी के योगगुरु श्री धीरेन्द्र ब्रह्मचारी भी प्रसिद्द थे . ये मिथिला के चानपूरा ग्राम के थे , इनकी योग पद्धति ने बहुत अधिक लोगों को लाभ दिलाया . आज भी इनके ग्रामीण जिन्होंने इनसे योग सीखा और भारत के विभिन्न शहरों में योग शिक्षक के रूप में लगों को योग सिखा रहे हैं वे सभी इस से बहुत लाभान्वित हो रहे हैं . कुछ लोगों ने योग सेंटर खोल रखी है . वे लोगों को लाभ पहुँचाने के साथ -साथ अर्थोपार्जन भी कर रहे हैं . अकस्मात् श्री ब्रह्मचारीजी की दर्दनाक मौत के कारण वे योग में अधिक लाभ नहीं पहुंचा सके . अनेकों साधु महात्माओं ने प्रयत्न तो किया लेकिन जन- जन तक इसका प्रचार नहीं कर सके . आज के समय में इसका श्रेय श्री रामदेव बाबा को ही जाता है , उनके अथक परिश्रम का ही प्रतिफल है कि योग आज हर घर हर शहर हर गाँव तक इसका विस्तार हो चूका है . आज हर मानव योग को अपना रहा है , प्रत्येक मानव इसका मह्त्व समझ रहा है . बाबा का परिश्रम एवं लगन रंग लाया. देश क्या विदेश में धूम मची हुई है . आज संपूर्ण विश्व में भारत परचम लहरा रहा है , इसका श्रेय हमारे प्रधान मंत्री जी को जाता है . उनके अलौकिक सूझ- बूझ तथा दिव्य दृष्टि के कारण ही भारत १९२ देशों में अपना परचम लहरा रहा है. ऐसा प्रतीत होता है सिकन्दर की तरह विश्व में विजय पताका लहरा रहा है . आज का दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे योग के द्वारा भारत ने अश्वमेध घोडा को विजित कर लिया हो .

डा. रजनीदुर्गेश

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