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मानव जीवन में पिता की भूमिका

Posted On: 1 Feb, 2018 Others में

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rajanidurgesh

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Papa
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मानव जीवन में पग – पग पर पिता की भूमिका अविस्मरणीय होती है . पितृविहीन मानव जीवित तो रहता है पर अस्तित्वविहीन निर्जीव सा. आँख खुलते ही दो बलिष्ठ भुजाओं में लेकर पिता अपने अंश को आश्वासन देता है कि आजीवन साथ रहूँगा. मन ही मन शपथ भी लेता है के तेरे लिए अपनी जान भी दे दूंगा. दशरथ इसके ज्वलंत उदहारण हैं, अपने पुत्र राम के लिए उन्होंने प्राणों की आहुति तक दे डाली. प्राणांत के समय भी वह राम-राम करते रहे . राम को ऐसा आशीर्वाद मिला कि हर प्राणी मृत्यु से पहले राम का स्मरण ही नहीं करता वरन राम नाम के जाप से मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है. शायद यही कारण होगा की हिन्दू समाज में लोग अपने पुत्र का नाम भगवान के नाम पर रखते हैं ; अंत समय में पुत्र प्रेम के कारण पुत्र का नाम लेने से भगवान का नाम ले लेगा और उसे मोक्ष प्राप्ति होगी.
श्रवण कुमार के माता – पिता अपने अपने प्राण न्योछावर कर दिए अपने पुत्र के वियोग में . उदारता से परिपूर्ण मानव अपने पुत्र के लिए उचित – अनुचित भी भूल जाता है. श्रवण कुमार के पिता सर्वज्ञ होते हुए भी दशरथ के पश्चाताप को देख कर भी अनदेखा करके शाप दे डाली. महान पिता वसुदेव भी यमुना की अथाह जल की प्रवाह में अपनी जान तक की परवाह न कर पुत्र की रक्षार्थ मथुरा की और प्रस्थान किये तथा पुत्र को सुरक्षित स्थान पर रख आये .
पिता अपने पुत्र के सुखार्थ न्याय – अन्याय को भी नज़र अंदाज कर देता है. पुत्र दुर्योधन के लिए धृतराष्ट्र ने पितृहीन भाई के पुत्रों को अनदेखा कर पुत्र मोह में वन-वन भटकने को मज़बूर कर दिए तथा उनके अधिकार से भी उन्हें वंचित करने का प्रयत्न किये. श्रीरामचंद्र का पुत्रमोह भी सर्व विदित ही है. इतिहास में अनेक ऐसे पिता हुए हैं जिन्होंने अपना सर्वश्व समर्पित कर दिया है. पिता इस धरा का सबसे अनमोल उपहार है. ईश्वर अपना प्रतिरूप हर घर में पिता के रूप में प्रेषित किये हैं संतान के लिए, क्योंकि वे हर जगह खुद उपस्थित नहीं रह सकते.
मैं अत्यंत भाग्यशाली हूँ कि मेरे पिता डॉ. सतीश चंद्र झा हुए. हर क्षण हमारे हितार्थ ही सोचते थे .हम सब भाई बहनों में जान बस्ती थी .सुबह से रात्रि पर्यन्त हम सबके लिए ही सोचते थे.
संस्कृत जगत के जाज्व्लयमान नक्षत्र सदृश थे . मिथिला के गौरव थे. ऐसी विलक्षण प्रतिभा ,ऐसा विद्वान , ऐसी उदारता अन्य व्यक्ति में दुर्लभ है . अंग्रेजी ,हिंदी ,भोजपुरी ,बांग्ला ,मैथिलि ,संस्कृत आदि के ज्ञाता थे . वे सदा परहित में संग्लग्न रहते थे .
बाल्यकाल से ही प्रखर बुद्धि के थे , सात साल के अल्प वयस में प्रथमा की परीक्षा उत्तीर्ण किये थे .
ये मैं अपनी दादी (बड़ी माँ) से सुनी हुई हूँ जो मैं यहाँ उद्धृत कर रही हूँ . जिस दिन पापा की परीक्षा थी , वे अन्य बच्चों के साथ खेल रहे थे , उनके काका ने जब देखा तो बोले तुम्हारी परीक्षा है और तुम खेल रहे हो ,चलो .
परीक्षा भवन में एक घंटे देर से पहुंचे थे , परीक्षक अंदर जाने नहीं दे रहा था . एक निरीक्षक ने कहा जाने दो ये छोटा बच्चा क्या लिखेगा , अंदर गए लिखने लगे , गर्मी थी शर्ट उतारकर रख दिए . तथा लिखने में तल्लीन हो गए . परीक्षक चकित होकर लिखते देखते रहे . उसी समय एक पत्रकार वहां से गुजर रहा था तो शिक्षकों ने उन्हें बुलाकर सब बातें बताई और उस पत्रकार ने उनकी फोटो खींची, शिक्षक ने गोद में लेकर फोटो खिंचवाया , फूलों से लाद दिया था उन्हें . तत्कालीन समाचार पत्रों में आया था , जब रिजल्ट आया था तो पुनः समाचार पत्रों में आया था कि वही नन्हा बालक टॉप किया है . ऐसे प्रतिभावान थे . हर वर्ग में प्रथम आते थे . बी . ए. में टॉप किये थे , बेस्ट ग्रेजुएट ,एम. ए में टॉप .१९ साल में लेक्चरर हो गए थे . देवघर में जब ज्वाइन किये थे तो उन्हें बुतरू प्रोफेसर कहते थे लोग . अद्द्भुत प्रतिभासम्पन्न थे .
परोपकार में हमेशा संग्लग्न रहते थे . उनके १०० से अधिक छात्र प्रोफेसर हैं , असंख्य लोगों को रोज़गार दिए 200 से ऊपर लोगों ने उनके मार्गदर्शन में पी.एचडी की , अनेकों ने उनके मार्गदर्शन में डी. लिट् किये. उनके द्वारा रचित किताबें भी बहुत ही प्रशंसनीय रही , अभी अनेक किताबें पूरी नहीं हुई है अधूरी ही रह गयी , संस्कृत में अनेक कविताओं की रचना की है उन्होंने.
विद्यादानी मेरे पापा जितने बड़े विद्वान थे उतने अच्छे वक्ता भी थे . हमारे जीवन में अनेकों ऐसा क्षण आया है जब मैं पापा के विलक्षण प्रतिभा से अभिभूत हुई हूँ , कुछ अमूल्य अविस्मरणीय क्षण को मैं उद्धृत कर रही हूँ . उनको जब बी . राघवन पुरस्कार मिला था उनके विशिष्ट लेख के लिए , उस समय वहां उपस्थित लोगों का वह उत्साह देखने लायक था. सारे लोग एकत्रित हो उन्हें बधाईयां दे रहा था और मैं मंत्रमुग्ध थी.
अहमदाबाद में संगोष्ठी थी, मेघदूत पर भाषण था ,उनके ओजस्वी एवं तथ्यपूर्ण भाषण को सुनकर लोगों का अपलक देखना ,सुनना ,उपस्थित लोगों का उनके प्रति सम्मान की झलक मेरे मानस पटल पर सदैव अंकित रहेगा . रिटायरमेंट के बाद प्रोफेसर एमरेटस बनना , एक प्रोफेसर के लिए गर्व की बात होती है . और यह गर्व उन्हें प्राप्त था.
सीनेट सिंडिकेट के जब मेंबर थे तब अनेकों कॉलेज का उद्धार किये , अनेकों को रोज़गार मिला .
प्रति – कुलपति हुए तब सालों से सुषुप्त पड़ी फाइल को निकालने से , और उनके हस्ताक्षर से असंख्य लोगों को रोटी मिली . परीक्षा में चोरी , धांधली बंद करवाए . उनके कारण वहां के लोगों को बहुत लाभ मिला
उन्होंने किसी से कुछ लिया नहीं दिया ही . हर सम्बन्ध को बहुत महत्व देते थे , मातृ – पितृ भक्त उनके जैसा विरले ही होगा . परिवार के लिए समर्पित रहते थे , गुरु के प्रति उत्कट स्नेह , छात्रों में जान बसती थी , हम भाई – बहन ही नहीं वे अनेकों के पिता थे .
अपने गांव के प्रति अपार स्नेह था . जान बसती थी वहां के लोगों में . कैसे सभी प्रसन्न रहें यही उनका मुख्य विषय था . एक अविस्मरणीय घटना याद आ रही है , उनके गावं की सड़क टूट गयी थी , राहगीरों को परेशानी होती थी , इतने कोमल होते हुए भी वे सर पर मिटटी उठाकर सड़क भरने लगे . उनको देख अन्य लोग भी जुड़ गए सड़क निर्माण जैसे कठिन कार्य में . उनका रंग काला हो गया था , शरीर पर जनेऊ का छाप बन गया था. महीनो लग गया अपने स्वरुप में आने में . गरीब विद्यार्थी को घर में रखकर विद्या दान किया करते थे , ऐसा प्रतीत होता है परोपकार के लिए ही भगवान उन्हें इस धरा पर भेजे थे . ‘द’ अक्षर ही जानते थे .
वह सदी के महामानव थे .
“सात समुंद की मसि करौं ,
लेखनी सब बनराइ,
धरती सब कागद करौं ,
पापा गुण लिखा न जाइ !”
हमारी माँ के साथ हम सभी भाई -बहन , उनके सभी दामाद ,दोनों बहू ,दौहित्र , दौहित्री , पौत्र पौत्री और परिवार के सभी सदस्यों के वर्षों से संचित पुण्य के प्रभाव के कारण वे हमारे मध्य अवतरित हुए .
” पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता ही परमं तपः .
पितरि प्रीतिमापन्ने ,सर्वे तुष्यन्ति देवताः ” I
वास्तव में पिता स्वर्ग है ,पिता धर्म है और पिता ही सर्वश्रेष्ठ तपस्या है . पिता के संतुष्ट होने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं .
मेरे पापा सदा हम सबसे प्रसन्न ही रहते थे ,इसलिए उनके जीवन काल में ईश्वर प्रसन्न रहते थे .
भगवान से एक बात के लिए सदा शिकायत रहेगी कि असमय हमसे हमारे पिता को छीन लिए . हमारी विनती भी नहीं सुने . हम सबके ऊपर से पिता की छाया से हमें वञ्चित कर दिए . हम सब पितृविहीन हो गए . हमारे ऊपर से पापा का हाथ सदा सर्वदा के बंद हो गया ,हम अपने पापा को खो दिए .
आज एक महीना हो गया उनसे विलग हुए . हर पल हर क्षण उनकी स्मृति साथ रहती है .
शतशः नमन . Papa1

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