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सुंदरता और सौंदर्यप्रसाधन

Posted On: 27 Aug, 2016 Others में

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rajanidurgesh

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Beauty productsजिस तरह काव्य -सौन्दर्य की परख करने वाले शास्त्र को काव्य शास्त्र कहा जाता है उसी तरह मन दर्पण सा स्वच्छ निर्मल एवं ईर्ष्यारहित मन को सुंदरता की उपाधि से बिभूषित किया गया है. स्वस्थ शरीर, आँखों और बालों में चमक और बेदाग त्वचा ही सौन्दर्य है. स्थान और समयकाल के हिसाब से सौन्दर्य की परिभाषा भिन्न -भिन्न होता है. अलग-अलग देशों और संस्कृतियों में सुंदरता के मापदंड भी अलग है.
मशहूर फैशन डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी के अनुसार “सुंदरता खुद को स्वीकार करने और सहजता में है.जब आप सहज होते हैं , आप सुन्दर महसूस करते हैं. स्टाइल वह है जब एक पांच फुट एक इंच की महिला किसी पार्टी में हील न पहन कर फ्लैट सैंडल पहने. ” जब आप स्वयं को स्वीकार करते हैं , तो आपका आत्मविश्वास दूसरे लोगों को आपकी ओर आकृष्ट करता है, सम्भवतः वास्तविक सुन्दरता यही है. सुंदरता वह है जिसे देख कर आनन्द और संतोष की अनुभूति हो.
लोग आपको सुन्दर कहे , इसके लिए यह आवश्यक है कि आप पहले अपने आप को सुन्दर समझें.
ईश्वर से या विरासत में जो ज्यामितीय आकार आपको मिला है वह विश्व में अकेला है ,नायब है , दूसरा ऐसा हो ही नहीं सकता , इसको जब हम समझ लेते हैं तो हम अपने को सुन्दर समझने लगते हैं. इस समझ से हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है और हम सहज होते है. जैसे ही हम सहज हो जाते हैं ; हमारा हीन भावना समाप्त हो जाता है और हम सुन्दर हो जाते हैं.
सुन्दर विचार,मधुर व्यव्हार ,स्वस्थ शरीर ,आत्मविश्वास तथा हीन भावना से मुक्त व्यक्ति सुन्दर दिखता है. इन सबसे पूर्ण व्यक्ति स्वभावतः सर्वप्रिय होता है. और जब कोई लेखक या कवि तथा टिप्पणीकार उस व्यक्ति के चेहरा या शरीर का ज्यामितीय विवरण अपने रचनाओं में समाहित करता है तो वह सुंदरता तत्कालीन और उस समाज या स्थान में सुंदरता का परिभाषा बन जाता है.
विश्व के विभिन्न क्षेत्र में विभिन्न समुदाय में सौंदर्य की विभिन्न परिभाषा है . बंगाल में सौन्दर्य और मेघालय, मणिपुर में सौंदर्य ; कश्मीर में सुंदरता तथा तमिलनाडु में सौंदर्य अलग-अलग परिभाषित है. भारत में सौंदर्य और चीन में सुंदरता अलग रूप में देखे जाते हैं. कहीं बड़ी-बड़ी आँखें सौंदर्य है तो कहीं छोटी-छोटी . सुंतवा नाक को किसी क्षेत्र में असुंदर भी माना जाता है. गलों में उभरी हड्डी कहीं सुन्दर तो कहीं असुंदर माना जाता है. एक ही वस्तु को कोई सुन्दर कहता है और कोई असुंदर. इससे प्रमाणित होता है कि सुन्दर या कुरूप कुछ है ही नहीं, वरन यह देखने वाले की दृष्टि ही है जो सुन्दर और असुंदर उस पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर जो की समय,समाज ,स्थान और परिस्थिति द्वारा परिभषित परिभाषा उसे प्रेरित करता है वह व्यक्त हो जाता है.
सभ्यता के प्रादुर्भाव से ही मनुष्य स्वभावतः तत्कालीन परिभाषा से अनुभूत हो कर अपने को सुन्दर रखने हेतु प्रयत्नशील रहता है. शारीरिक स्वास्थ्य और सौंदर्य मनुष्य के आतंरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वस्थता पर निर्भर है पर भर भी वाह्य सुंदरता को निखारने हेतु मनुष्य परापूर्व कल से ही सौंदर्य प्रसाधन का उपयोग करते आ रहे हैं. वैदिक साहित्य ,कौटिल्य अर्थशास्त्र ,शारंगधर पद्धति ,वात्सायन कामसूत्र,ललित विस्तार ,भारत नाट्यशास्त्र,अमरकोश सभी में सौंदर्य प्रसाधन का प्रयोगात्मक एवं रचनात्मक वर्णन उपलब्ध है. गंगाधरकृत गन्धसार नामक ग्रन्थ में सौंदर्य प्रसाधन के निर्माण के छह प्रकार के विधियों का उल्लेख है. रघुवंश ,ऋतुसंहार , मालतीमाधव ,कुमारसंभम,कादंबरी,हर्षचरित और पाली ग्रंथों में भी सौंदर्य प्रसाधन हेतु विविध द्रव्यों के प्रयोग का विवरण पाया जाता है.
पूर्व काल में इन सौंदर्य प्रसाधनों का निर्माण प्राकृतिक एवं वानस्पतिक संसाधनों के उपयोग से किया जाता रहा है. पर आज सौंदर्य प्रसाधन का निर्माण रासायनिक एवं पशु चर्बी के उपयोग से होने लगा है. अन्धाधुन्ध अर्थ लोभ के कारण पाश्चात्य निर्मातक सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण में सहज सुलभ रासायनिक वस्तुओं का उपयोग करने लगे और लुभावने विज्ञापनों द्वारा उनके दुष्प्रचार से आकर्षित हो लोग इनका प्रयोग करने लगे हैं.
सुंदरता मनुष्य के मस्तिष्क में है. सुन्दर विचार ,निश्छलता , ईर्ष्या और अहंकार रहित , पांच विकारों से दूर परोपकार की प्रवृति वाले मानव तो सदा से दिव्य होते हैं. उन्हें सौंदर्य प्रसाधन की आवश्यकता नहीं होती है. सुंदरता मानव के मन मंदिर में है , न कि बाजार में बिकने वाले सौंदर्य प्रसाधन में. सौंदर्य में निखार श्रृंगार से नहीं सदाचार से आते हैं.
बाजार में विभिन्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधन उपलब्ध होते हैं जैसे लिपिस्टिक , नाख़ून पालिश,पावडर , सेंट, काजल,बिंदी,मैनीक्योर एवं पेडिक्योर सेट आदि. ये सभी सामग्री घातक है. प्रकृति ने जो सुंदरता दी है उससे संतुष्ट रहें न कि आधुनिक श्रृंगार सामग्रियों से. Beauty products1
नेल पॉलिश अत्यंत घातक है .इसमे मिले रसायन त्वचा ही नहीं परिवार वालों के लिए भी हानिकारक है. इसके परिणाम न केवल लगाने वाले को भुगतने पड़ते है वरन घर-परिवार वाले भी इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं. यदि आंटा गूंथने, सब्जी या बनाने वक्त नेल-पॉलिश की परत गिर जाये तो भोजन दूषित हो जायेगा और दूषित भोजन का असर विष सदृश होगा . इसलिए खूबसूरती के चक्कर में अपने साथ अपने परिवार वालों के स्वास्थ्य पर खतरा आ जायेगा.
लिपस्टिक भी स्वास्थ्य के लिए अति घातक है .कितने ही पशुओं को इसके निर्माण के लिए काल के गाल में समाना पड़ता है. लिपस्टिक न लगाकर होठों को प्राकृतिक रूप में रखने से सौंदर्य में निखार रहता है. रसायन युक्त होने से लिपस्टिक हानिकारक है. अतः ईश्वर प्रदत्त होंठ की सुंदरता पर ध्यान दें न कि लीपा पोती करके.
पावडर आदि भी हानिकारक है. व्यर्थ पावडर लगाने से सुंदरता की जगह कुरूपता स्थान ले लेता है. फाउंडेशन कहने को तो रंग निखारता है.लेकिन इसका दुष्प्रभाव अति भयानक होता है. कितने महिलाओं के चहरे इस के प्रयोग से काले-काले धब्बे युक्त हो गए हैं.समाज में अनेक महिलाएं दृष्टिगत होती हैं जो गोरी होती हैं लेकिन चेहरे पर काले धब्बे सुंदरता की जगह कुरूपता में परिवर्तित हो गया रहता है. अतः इन घातक श्रृंगार सामग्रियों से दूर रहना चाहिए .सेंट,लिपस्टिक,नेल पोलिश ,हेयर डाई, स्प्रे, ब्लीच,वैक्स,पाउडर आदि सभी सामग्रियों में पशुओं की चर्बी रहता है.
सौंदर्य प्रसाधन के पीछे लोग पैसे बर्बाद कर रहे हैं. सुन्दर दिखने के लालच में मानव न अर्थ की परवाह करता है न अपनी त्वचा की. लुभावनी उत्पाद के लुभावनी विज्ञापन के चक्कर में फंस कर धन तथा त्वचा संबंधी रोग की परवाह नहीं करता. अपने अमूल्य समय जो कभी लौट कर नहीं आने वाला ऐसे अनुपम धन की मनुष्य परवाह नहीं करता है और सौन्दर्य प्रसाधन के पीछे स्वर्ण मृग के लालच में अपने को झोंक देता है. घंटों लोग पार्लर में व्यतीत करते हैं ,यहाँ तक कि घर आया के भरोसे छोड़ कर सुंदरता की ललक में पार्लरों में समय गंवाते है. विलखते बच्चों की भी चिंता नहीं होती उन्हें . आज हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर के एमएनसी की कम्पनियाँ २०० का समान २००० में बेचकर मालामाल हो रही है .हम क्षणिक सुख अर्थात थोड़ी देर की वाह्य सुंदरता के लिए मेहनत से अर्जित धन और अमूल्य समय बर्बाद कर रहे हैं. आज होड़ लगी हुई है इस क्षणिक सौंदर्य के लिए , अपने को आकर्षक बनाने के चक्कर में जोकर बनाने के लिए. पाश्चात्य सौंदर्य का परिभाषा हमारे अनुकूल नहीं है. पर हम तो अंग्रेजों के सभी परिभाषा को ही सही समझने की भूल कर रहे हैं. उनके लिए तो सबकुछ तिजारत है व्यापर है और वो इस तरह अपना व्यपार फ़ैलाने हेतु हमें वेवकूफ बनाकर पैसा कमा रहे हैं. हमारी नीति या नियति हो गयी है हम कमाएं और इन विदेशी कंपनियों को लुटाएं. हम मृगमरीचिका के पीछे भाग रहे हैं .
हम सबको इन सब से सावधान होना चाहिए , तन मन से स्वच्छ रहकर इस भ्रम से निकलना होगा जिससे लाभ के स्थान पर हानि ही होता है , अपने साथ अपने समाज की रक्षा करना होगा, इन लुभावनी सामग्रियों से . सब को एकत्र होकर इन समस्या की ओर ध्यान देना होगा .यदि हम सब जागरूक होंगे तो यह समस्या जो गुप्त है , सबकी दृष्टि इस समस्या की ओर जायेगा ,सब जागरित होकर इस गूढ़ समस्या को समूल नष्ट करने का प्रयत्न करना होगा जिससे मानव मुक्त होकर स्वास्थ्य के साथ धन की भी संरक्षण कर पायेगा .
मैं पुनः कहती हूँ कि गम्भीरता से सोचें और सुन्दरता के भारतीय परिभाषा को समझ कर इन रासायनिक सौंदर्य प्रसाधनों के दुष्प्रयोग से अपने और अपनी आगामी पीढ़ियों को बचाएं.

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