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तुम्हारे लिए

Posted On: 14 Feb, 2011 Others में

लोकतंत्र© Rajeev Dubey (All rights reserved)

rajeevdubey

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मैंने तो बहुत चाहा था
कि तुम्हें रोक लेता उस शाम
पर मन की बात
होठों तक आ न सकी |

 

काश कि  तुमने देखा होता
मेरी आँखों में
ठहर कर दो पल
बस दो पल |

 

मैंने चाहा था
उस दोपहरी
जब सड़कें भी बिलकुल सुनीं थीं
की खटकाओ तुम द्वार मेरा |

 

और आकर बैठो
चुप-चाप
कुछ पल
मेरे आँगन में |

 

मेरे ये सपने रखे हैं
अभी भी वैसे ही
अनछुए…
तुम्हारे लिए – बस तुम्हारे लिए |

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